सेंट्रल हाल से संदेश क्या पांच साल के लिए है?
NDA Meeting: पुराने संसद भवन का नया नाम अब संविधान सभा है| जहां संविधान सभा की बैठक हुआ करती थीं, उसे हम पिछले 75 साल से सेंट्रल हाल के रूप में जानते हैं| यह सेंट्रल हाल 75 साल से लोकतंत्र के हर उतार चढाव का गवाह रहा है| इस सेंट्रल हाल में ही सरकारों के बनने और गिरने की पटकथा लिखी जाती रही है|
जब देश में कांग्रेस का बोलबाला था, तब चुनाव के बाद कांग्रेस संसदीय दल की बैठक यहीं पर होती थी, यहीं पर नए प्रधानमंत्री के नाम पर मोहर लगती थी| अब एनडीए का बोलबाला है, तो इसी सेंट्रल हाल में एनडीए ने नरेंद्र मोदी को चुनने की प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया| कांग्रेस के जमाने और मौजूदा दौर में फर्क सिर्फ इतना है कि कांग्रेस संसदीय दल की बैठक में पत्रकारों को आने की इजाजत होती थी, जो अब बंद हो चुकी है|

सेंट्रल हाल क्योंकि लोकतंत्र का सबसे बड़ा मन्दिर था, इसलिए मीडिया इस सेंट्रल हाल की रोजमर्रा की गतिविधियों का साक्षी हुआ करता था, जो अब नहीं है| इस सेंट्रल हाल में कुछ बदला है तो सिर्फ यही बदला है कि लोकतंत्र का खुलापन सिकुड़ गया है, अठारहवीं लोकसभा के चुनाव नतीजों के बाद जिसके खुलने की उम्मीद की जा सकती है|
2004 में इसी सेंट्रल हाल में कांग्रेस संसदीय दल की बैठक में सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री बनने से इनकार कर दिया था| हालांकि यह फैसला सोनिया गांधी के घर पर हुई यूपीए के घटक दलों की बैठक में ही हो चुका था, लेकिन कांग्रेस में जो परिवार भक्ति और मान-मनोव्वल की परंपरा रही है, उसका सबके सामने प्रदर्शन हुआ| उसके विपरीत सात जून 2024 को एनडीए ने तीसरी बार नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में अपना नेता चुनने की प्रक्रिया पूरी की|

पिछली दो सरकारों के विपरीत इस बार भाजपा के बहुमत वाली सरकार नहीं बन रही| इसलिए चंद्रबाबू नायडू , नीतीश कुमार, एकनाथ शिंदे और चिराग पासवान को ज्यादा अहमियत मिली| यहाँ तक कि कुछ पार्टियों के अकेले सांसद जीतन राम मांझी, अनुप्रिय पटेल और अजीत पवार को भी उतनी ही अहमियत दी गई, ताकि कोई एक बड़ा दल खिसक जाए, तब डूबते को तिनके का ही सहारा होता है| नतीजे आने के तुरंत बाद से ही मीडिया का एक वर्ग चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार को शक की निगाह से देख रहा था|
भाजपा नेताओं राजनाथ सिंह और नितिन गडकरी की ओर से मोदी को नेता चुनने का प्रस्ताव रखे जाने के बाद सबसे पहले लोकसभा की 16 सीटें जीतने वाले टीडीपी अध्यक्ष चंद्रबाबू नायडू और 12 सीटें जीत कर लाने वाले जेडीयू के अध्यक्ष नीतीश कुमार से अनुमोदन करवाया गया, यह जरूरी भी था| क्योंकि ये दोनों ही पहले नरेंद्र मोदी से नाराज हो कर एनडीए छोड़ कर चले गए थे, और दोनों ही यूपीए का हिस्सा भी रह चुके हैं|
चंद्रबाबू नायडू ने 2019 के लोकसभा और आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनावों से ठीक पहले एनडीए छोड़ दिया था, और एनडीए सरकार के खिलाफ दिल्ली के आंध्र भवन में एक दिन का धरना दिया था| धरने पर सोनिया गांधी, सीताराम येचुरी और डी. राजा भी शामिल हुए थे| लेकिन एनडीए का साथ छोड़कर वह आंध्र प्रदेश विधान सभा का चुनाव तो बुरी तरह हारे ही, लोकसभा में भी उनका कद घट गया था| पिछले दो साल से वह दुबारा एनडीए में आने की कोशिश कर रहे थे, चुनावों से ठीक पहले उन्हें एनडीए में एंट्री मिली थी, और एनडीए में आते ही उनकी किस्मत का दरवाजा भी खुल गया| वह भारी बहुमत के साथ फिर से मुख्यमंत्री बन गए हैं, और नरेंद्र मोदी सरकार भी उनपर निर्भर हो गई है|
वह चित्र लोगों के जहन में अभी भी होगा, जब नीतीश कुमार ने चुनावों में एक रैली के दौरान मंच पर नरेंद्र मोदी के पाँव छूने की कोशिश की थी| यह उनका एनडीए छोड़कर जाने का पछतावा था, जो उन्हें झुका रहा था| वह दो बार एनडीए छोड़कर लालू यादव और कांग्रेस के साथ गए थे| दोनों ही बार उन्हें कड़वा अनुभव हुआ, तो उन्हें लौट कर एनडीए में आना पड़ा| चुनावों के दौरान ही एक बार उन्होंने मंच पर सार्वजनिक तौर पर अपनी गलती को स्वीकार किया और मोदी से वायदा किया कि अब वह कभी छोड़कर नहीं जाएंगे| लगभग वैसा ही आश्वासन नीतीश कुमार ने सेंट्रल हाल में भी दिया है|
लेकिन क्योंकि इन दोनों का पलटू राम का इतिहास रहा है| दोनों के अपने एजेंडे भी हैं, इसलिए मीडिया के एक वर्ग को यह खबर चलाने में आसानी रहती है कि दोनों ने समर्थन के लिए कड़ी शर्तें लगा दी हैं, दोनों ने मोलभाव शुरू कर दिया है| चंद्रबाबू नायडू ने स्पीकर पद मांग लिया है, नीतीश कुमार ने रेलवे मंत्रालय मांग लिया है, आदि आदि| इन खबरों का आधार क्या है? इन अटकलबाजियों का आधार सिर्फ यह है कि अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में चंद्रबाबू नायडू ने 1998 में समर्थन के बदले अपनी पार्टी के जीएमसी बालयोगी को स्पीकर बनवाया था और नीतीश कुमार वाजपेयी सरकार में रेलमंत्री थे| लेकिन इस बार ये दोनों ही कड़वे अनुभव के बाद एनडीए में लौटे हैं, और इन दोनों के एजेंडे पर इस बार अपने सांसदों को महत्वपूर्ण पद या मंत्रालय दिलाना नहीं, अपने अपने राज्य हैं|
दोनों ही अपने अपने राज्यों के लिए विशेष आर्थिक पैकेज की मांग जरुर करेंगे और मोदी सरकार को इसका रास्ता निकालना ही होगा| संविधान का अनुच्छेद 370 और 371 कुछ राज्यों को विशेष राज्य का दर्जा देता है, 5 अगस्त 2019 को जम्मू कश्मीर को मिलने वाला विशेष राज्य का दर्जा समाप्त कर दिया था| लेकिन अनुच्छेद 371 के तहत पूर्वोत्तर और कुछ अन्य पहाडी राज्यों को विशेष राज्य का दर्जा है, जिसमें उनको केंद्र से विशेष आर्थिक मदद मिलती है|
नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू अपने अपने राज्यों के लिए विशेष राज्य के दर्जे की मांग करते रहे हैं| कोई भी केंद्र सरकार नहीं चाहेगी कि दो राज्यों को विशेष राज्य का दर्जा देकर बाकी राज्यों को भड़काने का काम किया जाए, लेकिन बात आर्थिक पैकेज पर आ कर टिकेगी और मोदी को अपने इन दोनों सहयोगियों के राज्यों को परियोजनाओं के नाम पर आर्थिक पैकेज देने में कोई दिक्कत नहीं आएगी|
सवाल चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार की ओर से पांच साल की गारंटी का है| राजनीति में कब क्या हो जाए, इसकी भविष्यवाणी कोई नहीं कर सकता, लेकिन सेंट्रल हाल में इन दोनों की बॉडी लेंग्वेज पांच साल की गारंटी वाली थी| दोनों कड़वे अनुभव लेकर एनडीए में लौटे हैं, इसलिए भी भारतीय जनता पार्टी थोड़ा आश्वस्त हो सकती है। लेकिन इस बार भाजपा की बहुमत वाली सरकार नहीं है, एनडीए की सरकार है, इसलिए भाजपा को कई तरह के समझौते करने ही पड़ेंगे, कोई भी बिल बिना एनडीए में सहमति के केबिनेट में नहीं रखा जाएगा| पिछले दस साल से संसद भवन में बंद पड़ा एनडीए का दफ्तर मोदी को दुबारा खोलना पड़ेगा, जो 2019 के बाद तब से नहीं खुला, जब से लाल कृष्ण आडवानी ने संसद आना छोड़ दिया था|
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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