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MSME: सरकारी अनदेखी का दंश झेल रहे हैं छोटे उद्योग

MSME:ब्रिटिश उपनिवेशवाद की समाप्ति के बाद भारत के समक्ष दो ही प्रमुख मुद्दे थे। पहला, राष्ट्र निर्माण और दूसरा, आर्थिक प्रगति। इसी पृष्ठभूमि में जहां बड़े औद्योगिक यूनिटों का जन्म हुआ, वहीं देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों यानी एम एस एम ई (माइक्रो, स्मॉल, मीडियम एंटरप्राइजेज) को आवश्यक खाद पानी मुहैया कराने के लिए प्रतिबद्धता जताई गई।

इसमें कोई दो राय नहीं कि जब भी दुनिया भर में विपरीत आर्थिक हालात पैदा हुए भारत के छोटे उद्योगों ने हमें संकट से उबारा, भारत की आर्थिक स्थिति कमोबेश नियंत्रण में रही। लेकिन उदारीकरण की हवा में आ रहे प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के साथ हमने अपने छोटे उद्योगों को उनके हाल पर छोड़ दिया। सरकारी नीतियों की बेरुखी का ही नतीजा है कि पिछले तीन सालों में देश में लगभग 20 हजार सूक्ष्म, लघु और मध्यम दर्जे के उद्यम बंद हो गए या उन्होंने काम करना बंद कर दिया। इस आशय की जानकारी खुद केंद्र सरकार ने लोकसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में दी है।

MSME: Small industries are facing the brunt of government neglect

एमएसएमई विभाग के राज्यमंत्री भानु प्रताप सिंह वर्मा ने स्वीकार किया है कि एक अप्रैल 2022 से मार्च 2023 तक 13290 एमएसएमई बंद हुए हैं।

महज एक साल की कम अवधि में इतने बड़े पैमाने पर छोटी औद्योगिक इकाइयों के बंद होने का तथ्य निश्चित रूप से परेशान करने वाला है। खास तौर पर इसलिए भी कि सरकार ने इस क्षेत्र को मजबूत करने पर जोर दिया है और समय-समय पर इसे मजबूत बनाने के लिए आर्थिक सहायता की व्यवस्था करने की भी बात कही है।

लाल किले की प्राचीर से अमृत काल में नए भारत के लिए पांच प्रण लेने का आह्वान करते हुए प्रधानमंत्री ने स्वदेश निर्मित ब्रह्मोस मिसाइल और होवित्जर तोपों का जिक्र किया था। एमएसएमई को ठोस आर्थिक आधार प्रदान करते हुए देश को आत्म निर्भर बनाने की बात प्रमुखता से कही थी। सरकार ने इस पर अमल करते हुए देश में एमएसएमई को मजबूत करने के लिए पांच लाख रुपए की आकस्मिक ऋण सुविधा गारंटी योजना, एमएसएमई आत्मनिर्भर भारत निधि के माध्यम से 50 हजार रुपए का इक्विटी समावेशन, व्यवसाय की सुगमता के लिए एमएसएमई हेतु 'उद्यम पंजीकरण' तथा एमएसएमई के वर्गीकरण का नया संशोधित मानदंड आदि लागू किया है। लेकिन जमीनी हकीकत यही है कि विपरीत आर्थिक परिस्थितियों के चलते लोगों के छोटे-छोटे उद्योग धंधे लगातार बंद हो रहे हैं अथवा परेशान लोग खुद ही बंद कर रहे हैं।

वर्ल्ड मैन्युफैक्चरिंग में आज भारत का अंश मात्र 3% है। वही वर्ल्ड मैन्युफैक्चरिंग में जापान का हिस्सा 10% है जबकि चीन की भागीदारी 21.5% और अमेरिका की 17.5% है। जापान की जनता में उच्च आर्थिक राष्ट्र निष्ठा होने के कारण 96% स्वदेशी या मेड बाय जापान कारें ही बिकती हैं। जबकि हमारे देश में केवल 13% कारें ही स्वदेशी बिकती हैं, भारत में 87% लोगों की पसंद विदेशी कारें हैं। इसी तरह सिंगापुर की तुलना में भारत का क्षेत्रफल 52 गुना और जनसंख्या 234 गुना ज्यादा होने पर भी सिंगापुर का हाई टेक्नोलॉजी एक्सपोर्ट्स भारत की तुलना में साढ़े सात गुना ज्यादा हैं। वर्ल्ड मैन्युफैक्चरिंग में भारत का हिस्सा 3% होने के बावजूद हमारे देश के संगठित क्षेत्र के दो तिहाई से अधिक उत्पादन तंत्र पर विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का स्वामित्व है।

विदेशी कंपनियां मेक इन इंडिया की आड़ में अपने हिस्से पुर्जे या अर्धनिर्मित सामग्री बाहर से लाकर अपने उत्पादों को जोड़ने मात्र का काम अपनी असेंबली लाइन में करके उन पर मेक इन इंडिया लिख देती हैं। विदेशी निवेशक भारत के विशाल भूभाग पर लगातार आ रहे हैं और हमारी तकनीकी प्रतिभा संपन्न जन शक्ति के माध्यम से अपना उत्पादन बढ़ा रहे हैं, अपने कारोबार को ऊंचाई दे रहे हैं। बहुत हद तक भारत की स्थिति सरोगेट मदर की तरह होती जा रही है जिसकी उधार की कोख लेकर विदेशी मल्टीनेशनल खुद का उत्पादन बढ़ा, अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। नतीजा यह है कि हमारे अपने छोटे-छोटे उद्योग बंद हो रहे हैं। उदारीकरण की लहर में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश के जरिए चिकित्सा उपकरण, खाद्य प्रसंस्करण, वस्त्रोद्योग, चर्म उद्योग, सहित लगभग 550 क्षेत्रों में विदेशी उत्पादकों के आने का रास्ता लगभग तैयार हो चुका है। ऐसे में हमें यह समझने की जरूरत है कि आज देश में केवल वस्त्रोद्योग में ही 1.20 करोड़ लोग संगठित क्षेत्र में लगे हैं जबकि इससे अधिक डेढ़ करोड़ लोग घरों से संचालित गारमेंट उत्पादन इकाइयों में नियोजित हैं।

सवाल यह है कि छोटे उद्यमों की वजह से अर्थव्यवस्था में जीवन बने रहने की अहमियत के बावजूद यह स्थिति क्यों बन रही है कि देश के आर्थिक ढांचे में इस क्षेत्र की जगह लगातार सिकुड़ती जा रही है। हालांकि जिन तीन सालों में छोटे उद्यमों के बड़े पैमाने पर बंद होने की बात कही गई है, उसमें बड़ी भूमिका कोरोना महामारी और इस महामारी के चलते लगाई गई पूर्ण तालाबंदी और उससे उपजे हालात की भी रही है। देश में घोषित पूर्ण बंदी और उसके बाद के हालात सामान्य होने में लंबा समय लगने का सबसे ज्यादा खामियाजा छोटे उद्योग धंधों को ही उठाना पड़ा है। क्योंकि छोटे उद्योगों के पास कोई बड़ी पूंजी नहीं होती इसलिए इनका काम रोज के लेनदेन पर ही अधिकतर निर्भर रहता है। बहुत सारे उद्यमी इस झटके को झेल नहीं पाए। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ा और लोगों के सामने अपनी इकाइयां बंद करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा।

मालूम हो कि सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम न सिर्फ बड़ी प्रौद्योगिकियों की सहायता करते हैं बल्कि विशाल पैमाने पर रोजगार के अवसर भी उपलब्ध कराते हैं। सरकार ने भी अपने जवाब में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग के महत्व को रेखांकित किया है तथा इनके विकास के लिए ऋण और प्रौद्योगिकी सहायता और संरचना व कौशल विकास के साथ-साथ प्रशिक्षण और बाजार सहायता विकसित करने की बात कही है। छोटे उद्योग बंदी के लिए सरकार ने कोरोना परिदृश्य को बड़ा कारक बताया है। लेकिन लगता है कि पूरा सच बताने से सरकार भी हिचक रही है। क्योंकि आंकड़े स्पष्ट रूप से घोषित कर रहे हैं कि कोरोना काल में देश के शीर्ष उद्यमियों की आर्थिक स्थिति में बेतहाशा वृद्धि हुई है।

कोरोना के दौरान सरकार ने दिल खोलकर बड़े उद्यमियों की मदद भी की। विपक्षी दलों का तो यहां तक कहना है कि सरकार ने लाखों करोड़ों रुपए कोरोना के नाम पर बड़े उद्योगपतियों के माफ कर दिए। स्वाभाविक रूप से इस विरोधाभासी स्थिति पर सवाल आगे भी उठेंगे। अब ऐसे में एक प्रश्न यह भी खड़ा होता है कि सरकार जिस तरह बड़े उद्योगों को बचाने के लिए विशेष आर्थिक इंतजाम करती है ठीक वैसे ही इंतजाम अर्थव्यवस्था में अहम योगदान देने और बड़ी तादाद में आबादी को जीवन यापन का जरिया बनने वाले सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों के लिए क्यों नहीं होते?

आज देश में बेरोजगारी का आंकड़ा ऊंचे मुकाम पर है। छोटे उद्योगों के असमय बंद होने से बेकारी की मार और बढ़ेगी तथा लोगों का जीवनयापन कठिन होगा। इसलिए जरूरी है कि सरकार हमारे पारंपरिक छोटे उद्योगों की रक्षा के लिए ठोस कार्य नीति के साथ आगे आए ताकि उद्योग बंदी पर काबू पाया जा सके।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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