MP Assembly Elections: मध्य प्रदेश में मुस्लिम उम्मीदवारों से हर दल की दूरी

MP Assembly Elections: मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में विभिन्न राजनीतिक दलों ने कमोबेश सभी वर्गों एवं जातियों के प्रतिनिधियों को प्रत्याशी बनाकर मतदाता के सामने सोशल इंजीनियरिंग का उदाहरण प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। किंतु प्रदेश में लगभग 9 प्रतिशत की जनसंख्या वाला मुस्लिम समुदाय इस बार स्वयं को ठगा हुआ महसूस कर रहा है।

मुस्लिम वर्ग की सबसे अधिक नाराजगी कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी जैसे राजनीतिक दलों से है जो स्वयं को मुसलमानों का रहनुमा साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। ये सभी दल मुसलमानों में भाजपा का डर दिखाकर समुदाय का एकमुश्त वोट तो लेते रहे हैं किंतु जब मुस्लिम समुदाय को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने की बारी आती है तो ये सभी दल बगलें झाँकने लगते हैं।

MP Assembly Election 2023 parties far away from Muslim candidates in Madhya Pradesh

2011 की जनगणना के अनुसार, प्रदेश में 7 प्रतिशत मुस्लिम जनसंख्या थी जो अब बढ़कर कमोबेश 9 प्रतिशत हो गई है अर्थात प्रदेश की साढ़े सात करोड़ जनसंख्या में मुस्लिम समुदाय की संख्या 60-80 लाख है। प्रदेश में मुस्लिम समुदाय का लगभग 21 विधानसभा सीटों पर सीधा प्रभाव है और इनका वोट किसी भी प्रत्याशी की हार-जीत में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। खासकर मालवा और मध्य भारत में मुस्लिम समुदाय अच्छी संख्या में है और इनका वोट किसी भी प्रत्याशी की किस्मत का फैसला करता है। इतने पर भी राजनीतिक दल मुस्लिम समुदाय के नेताओं को टिकट देने से बचते हैं क्योंकि प्रदेश में मुस्लिम समुदाय का नेतृत्व करने वालों का अभाव है और जो नेतृत्व कर सकते हैं वे अब आयु के उस पड़ाव पर हैं जहां उनके लिए राजनीति के दरवाजे बंद हो जाते हैं।

भाजपा ने तो इस बार प्रदेश में गुजरात और उत्तर प्रदेश के मॉडल पर टिकट वितरण किया है और हिंदुत्व की लहर पर सवार पार्टी किसी मुस्लिम को टिकट देगी, इससे तो स्वयं मुस्लिम समुदाय भी इंकार करता है। किंतु कांग्रेस की ओर टकटकी लगाए बैठा मुस्लिम समुदाय यहां से भी निराश हुआ है। कमलनाथ स्वयं सॉफ्ट हिंदुत्व के भरोसे भाजपा के हार्डकोर हिंदुत्व का मुकाबला करने की मंशा पाले हुए हैं।

230 विधानसभा सीटों में कांग्रेस ने मात्र 2 मुस्लिम चेहरों को ही चुनाव में उतारा है और दोनों ही चेहरे भोपाल में कांग्रेस के कद्दावर नेता हैं। भोपाल मध्य विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिमों की जनसंख्या लगभग 50 प्रतिशत है वहां से विधायक आरिफ मसूद चुनाव लड़ रहे हैं जबकि भोपाल उत्तर विधानसभा से 1990 से आरिफ अकील कांग्रेस का मुस्लिम चेहरा बने हुए हैं।

हालांकि 1993 में उन्हें भी हार का सामना करना पड़ा था और इस बार बढ़ती उम्र के चलते उनके स्थान पर उनके पुत्र को टिकट दिया है जो अपने ही परिवार की अदावत से भीतरघात का सामना कर रहे हैं। यह भी कम दिलचस्प नहीं कि 1993 में जब दिग्विजय सिंह प्रदेश के मुख्यमंत्री निर्वाचित हुए तो उनकी सरकार में एक भी मुस्लिम चेहरा नहीं था क्योंकि विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के छह और भाजपा के एक मुसलमान उम्मीदवार अब्दुल गनी अंसारी की करारी हार हुई थी। तब मुस्लिम समुदाय को प्रतिनिधित्व देने के चलते दिग्विजय सिंह ने इब्राहिम कुरैशी को मंत्री बनाया किंतु छह माह बाद वे विधायक बनने से भी चूक गए।

मुस्लिम प्रतिनिधित्व से वंचित मप्र विधानसभा

1962 के विधानसभा चुनाव में 7 मुस्लिम प्रत्याशी विधानसभा पहुंचे थे जो अब तक उनके प्रतिनिधित्व में रिकॉर्ड है जबकि 1980 के विधानसभा चुनाव में 35 मुस्लिम प्रत्याशी चुनाव में उतरे जिनमें से मात्र 6 ही विधानसभा पहुंच सके। 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 1 तो कांग्रेस ने 3 मुस्लिम प्रत्याशी उतारे जिनमें से 2 जीते और दोनों ही भोपाल से कांग्रेस का चेहरा थे। मालवा क्षेत्र की इंदौर लोकसभा की बात करें तो इसके अंतर्गत आने वाली इंदौर 1, इंदौर 3, इंदौर 5 और सांवेर विधानसभा में क्रमशः 20 प्रतिशत, 32 प्रतिशत, 23 प्रतिशत और 18 प्रतिशत मुस्लिम जनसंख्या है किंतु यहां मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाला कोई चेहरा किसी राजनीतिक दल के पास नहीं है।

इन चारों विधानसभाओं में कांग्रेस ही लंबे समय से मुस्लिम समुदाय की रहनुमा बनी रही है जिसका असर पिछले एक दशक से कम हुआ है। इसी प्रकार उज्जैन उत्तर विधानसभा क्षेत्र में 20 प्रतिशत मुस्लिम जनसंख्या है जबकि महाकाल मंदिर क्षेत्र होने के चलते यह भाजपा का गढ़ बना हुआ है। रतलाम शहर, खंडवा, जावरा, शाजापुर, देपालपुर, मंदसौर, देवास, धार जैसी विधानसभाओं में मुस्लिम जनसंख्या 18 प्रतिशत से अधिक है किंतु इनमें से अधिकांश में मुस्लिम नेतृत्व न होने के चलते यहां से मुस्लिम प्रत्याशी न के बराबर रहे हैं और जो रहे हैं उनके नसीब में जीत नहीं लिखी थी। यानि मुस्लिम प्रतिनिधित्व के नजरिए से मप्र विधानसभा वंचित ही रही है।

राम मंदिर आंदोलन के बाद से कम हुआ प्रतिनिधित्व

1992 में राम मंदिर आंदोलन के बाद मध्य प्रदेश भी हिंदुत्व की लहर पर सवार हुआ जिसका परिणाम यह रहा कि कांग्रेस भी मुस्लिम समुदाय के नेताओं को टिकट देने से बचने लगी। हाँ, दिखावे के तौर पर 2-5 सीटें उन्हें दी जाती रही हैं किंतु इस बार तो उनके खाते में मात्र 2 सीटें ही आई हैं जहां वे कड़े मुकाबले में फंसे हैं। मुस्लिम वोटों पर एकाधिकार जमाती रही कांग्रेस सॉफ्ट हिंदुत्व के चलते अपने सुर बदल चुकी है ताकि भाजपा के हार्ड हिंदुत्व का मुकाबला कर सके।

यहां तक कि कांग्रेस ने संगठन से लेकर सार्वजनिक मंचों तक से मुस्लिम नेताओं को बेदखल कर दिया है। जिन मुस्लिम नेताओं को टिकट मिला भी है, वह उनकी मेहनत की राजनीतिक जमीन के चलते दिया गया है अन्यथा तो उन क्षेत्रों में भी अन्य दावेदार थे।

यही सब देखते-समझते इस बार मुस्लिम समुदाय के मुद्दे भी चुनाव प्रचार से गायब हैं और पूरा चुनाव जाति आधारित और एंटी-इन्कंबेंसी केन्द्रित हो गया है। मुस्लिम समुदाय भी सब देख रहा है और उसका वोट किसे मिलेगा यह देखना दिलचस्प होगा।

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+