Gyanvapi: वह ज्ञानवापी मस्जिद नहीं है, ज्ञानवापी परिसर में मस्जिद है

Gyanvapi: भारतीय धर्म परंपरा में नाद या ध्वनि के बारे में अवधारणा है कि यह शून्य से प्रकट हुआ है। जब ब्रह्मांड शून्य में था तब शिव ने डमरू बजाकर इस ब्रह्मांड को नाद से भर दिया। उस समय उनके डमरू से जो ध्वनियां प्रकट हुई उन्हें महेश्वर सूत्र कहा जाता है। शिव के डमरू से निकली यही 14 प्रकार की ध्वनियां पाणिनी के संस्कृत व्याकरण के 14 सूत्र हैं।

अब जब नाद प्रकट हो गया, सूत्र मिल गया तो शब्द भी बनने लगे और वाक्य रचना भी होने लगी। इस क्रम में शब्दों का निर्माण मनुष्य अपनी आवश्यकता के अनुसार करता आया है और करता रहेगा। लेकिन जो शब्द स्थाई भाव लिए हों, उनकी पहचान बदल जाए तो मूल भाव को पहचानने में बड़ी मुश्किल होती है। 'ज्ञानवापी मस्जिद' एक ऐसा ही शब्द गढ़ दिया गया है जो जितनी बार बोला जाता है उतनी बार भ्रम पैदा करता है।

Masjid in Gyanvapi complex not Gyanvapi Masjid

बीते कुछ सालों से काशी के कुछ गौरी भक्त अदालत पहुंचे हुए हैं। उन्होंने काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर के पास श्रृंगार गौरी के पूजन की अनुमति मांगी है जो कि उसी मस्जिद की एक दीवार पर स्थिर हैं जिसे ज्ञानवापी मस्जिद कहा जाने लगा है। इस मांग से उस अंतहीन कानूनी लड़ाई में एक नया अध्याय जुड़ गया जो ज्ञानवापी परिसर को लेकर लंबे समय से चलता आ रहा है। हाल ही में स्थानीय अदालत ने एएसआई के साइंटिफिक सर्वे की अनुमति दी है जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने 26 जुलाई तक रोक लगा दी है। इस बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट सुनवाई करके 26 जुलाई तक इस निर्णय पर पहुंचेगा कि वहां आगे सर्वे हो या न हो।

यह एक लंबी और थकाऊ अदालती कार्यवाही का हिस्सा है जो अभी लंबे समय तक चलती रहेगी। लेकिन हम लौटते हैं उस ज्ञानवापी पर जिसे मस्जिद कहा जाने लगा है। क्या ज्ञानवापी मस्जिद कहा या लिखा जाना चाहिए? आखिर ज्ञानवापी है क्या जिसे औरंगजेब द्वारा आदि विश्वेश्वर मंदिर के खंडहर पर खड़े की गई मस्जिद का नाम दे दिया गया है?

ज्ञानवापी का उस मस्जिद से दूर दूर तक वैसे ही कोई रिश्ता नहीं है जैसे 'दीन' का ज्ञान से कोई रिश्ता नहीं होता। दीन एक बिलीफ सिस्टम है जिसमें इसके फॉलोवर को वह सब बातें मान लेती होती हैं जो उसे दीन के नाम पर बताई जाती हैं। इसमें तर्क, प्रश्न, अन्वेषण इत्यादि के लिए कोई स्थान नहीं होता। हर बिलीफ सिस्टम में ऐसा ही होता है और इस्लाम में भी ऐसा ही है।

जबकि ज्ञान का आधार तर्क और अन्वेषण है। अपने तर्क और अन्वेषण से हम जिस सत्य तक पहुंचते हैं हमारे लिए वही हमारा ज्ञान होता है। ज्ञान किसी बिलीफ सिस्टम से नहीं निकलता क्योंकि वहां तर्क और अन्वेषण का सर्वथा अभाव होता है। इसलिए भी भारतीय मूल के शब्द ज्ञान को किसी अरबी मूल से निकले शब्द मस्जिद जिसका अर्थ खाली मैदान होता है उससे जोड़ना अतार्किक और मूर्खतापूर्ण है।

इस स्थान को ज्ञानवापी इसलिए कहा गया क्योंकि यह एक कूप या कुएं का नाम है। काशी में कुल 6 कूप थे जिन्हें वापी कहा जाता था। इसमें दो ज्येष्ठवापी और सिद्धवापी लुप्त हो चुके हैं। जो शेष चार आज भी बचे हैं उनके नाम हैं, शंकचूड़वापी, भद्रवापी, कारकोटक वापी और ज्ञानवापी। इनमें से ज्ञानवापी सबसे प्राचीन कूप है जो ठीक उस स्थान के दक्षिण में स्थित है जहां आदि विश्वेश्वर महादेव का मंदिर हुआ करता था।

इस ज्ञानवापी का उल्लेख लिंग पुराण में इस संदर्भ के साथ आता है कि यहां पर स्वयं शिव ने माता पार्वती को ज्ञान का उपदेश दिया था। इसलिए इस कूप का नाम ज्ञानवापी हो गया। लिंग पुराण में कहा गया है कि "देवस्य दक्षिणे भागे, वापी तिष्ठति शोभना, तस्यात वोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते।" अर्थात देव के दक्षिण भाग में वह कूप स्थित है जिसका जल पीने से मनुष्य जन्म मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।

इसी तरह स्कंद पुराण में निर्देश है कि शिवभक्त को ज्ञानवापी कूप के जल से ही संध्या वंदन करना चाहिए। इससे उसके पाप का नाश हो जाता है और वह ज्ञान को प्राप्त करता है। इसी से जुड़ी वह पौराणिक कहानी भी है कि ईशान देव काशी आये थे। तब गंगा नदी नहीं थी और न ही धरती पर वर्षावृष्टि होती थी। धरती जन जीवन से शून्य थी। उस समय ईशान देव ने काशी में उसी स्थान पर एक अंतहीन ज्योतिर्लिंग का स्तंभ देखा जिसकी देवता, गंधर्व, किन्नर और विद्याधर वंदना कर रहे थे। तब उन्होंने अपने त्रिशूल से यहां प्रहार करके धरती में एक कूप प्रकट किया और उसी के जल से उस ज्योतिलिंग का अभिषेक किया।

ऐसी पौराणिक कहानियां सिर्फ प्रतीक रूप में उस स्थान का महत्व समझाने के लिए कही जाती है। लेकिन यहां महत्वपूर्ण पौराणिक कहानी की जांच नहीं बल्कि उस कूप का उल्लेख है जिसके बारे में बताया गया। इस ज्ञानवापी कूप के नाम पर ही आदि विश्वेश्वर तीर्थ क्षेत्र को ज्ञानवापी परिसर भी कहा जाता है। इसी ज्ञानवापी परिसर पर इस्लामिक शासन के दौरान बार बार हमला हुआ और मंदिर को ध्वस्त कर दिया गया। 1194 में मोहम्मद गोरी ने, 1515 में सिकंदर लोधी ने आदि विश्वेश्वर मंदिर को ध्वस्त तो किया लेकिन उसकी जगह कोई नया निर्माण नहीं किया था। इसलिए कालातंर में पुन: पुन: मंदिर जीर्णोद्धार होता रहा।

लेकिन 1669 में जब औरंगजेब के फरमान पर इस मंदिर को तोड़ा गया तो वहां पर मस्जिद का निर्माण कर दिया। अब उस स्थान पर दोबारा मंदिर नहीं बन सकता था इसलिए अहिल्याबाई होलकर ने मूल स्थान से थोड़ा और दक्षिण में नये मंदिर का निर्माण करवाया जिसे आज काशी विश्वनाथ मंदिर के नाम से जाना जाता है। लेकिन जो मूल मंदिर था उसकी पिछली दीवार आज भी वही पुरानी है जिसके ऊपर तीन गुंबदों वाली एक मस्जिद बना दी गयी है।

न सिर्फ पिछली दीवार बल्कि अब तो वह शिवलिंग भी प्रकट है जहां पानी भरकर मुस्लिम हाथ पैर धोने के लिए इस्तेमाल करते थे। वह ज्ञानवापी कूप, शिवलिंग, नंदी तीनों आज भी ठीक उसी स्थान पर विद्यमान हैं जहां पौराणिक काल में उनका उल्लेख मिलता है। अगर कुछ नहीं है तो वह मंदिर जिसे मस्जिद में परिवर्तित कर दिया गया है।

इसलिए उस मस्जिद को औरंगजेबी मस्जिद या चाहें तो आलमगीर मस्जिद कह सकते हैं लेकिन ज्ञानवापी मस्जिद नहीं। ज्ञानवापी से उस मस्जिद का कोई संबंध नहीं है, सिवाय इस बात के कि एक दौर में जब औरंगजेब शासन कर रहा था तो उसने मूल मंदिर को तोड़कर उस मंदिर के ढांचे पर ही तीन गुम्बदों वाली मस्जिद बनवा दी थी। अत: वह ज्ञानवापी मस्जिद नहीं बल्कि ज्ञानवापी में स्थित एक मस्जिद है जिसे मंदिर तोड़कर बनाया गया है इससे अधिक कुछ भी नहीं।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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