Maharashtra BJP: अजित पवार को साथ लेकर मुश्किल में फंसी भाजपा?
Maharashtra BJP: भाजपा के कार्यकर्ताओं और जमीनी नेताओं को राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अजित पवार गुट को गठबंधन सरकार में शामिल करने का फैसला बिल्कुल भी रास नहीं आ रहा है। कार्यकर्ताओं ने जून 2022 में शिवसेना में दो फाड़ के बाद कभी फड़नवीस सरकार में सिर्फ एक मंत्री रहे एकनाथ शिंदे को फड़नवीस को नजरअंदाज कर मुख्यमंत्री बनाने के निर्णय का कड़वा घूट इसलिए पी लिया था कि भाजपा सरकार में आ रही थी और शिवसेना की कमर टूट रही थी। लेकिन अचानक अजीत पवार के अपने समर्थक विधायकों के साथ सरकार में शामिल होने को महाराष्ट्र में भाजपा के कैडर के साथ संघ के स्वयंसेवक भी स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं।
अभी तक देवेंद्र फड़णवीस अकेले मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के डिप्टी की भूमिका निभा रहे थे, लेकिन अब अजीत पवार के भी डिप्टी सीएम बनने के बाद महाराष्ट्र में दो डिप्टी सीएम होने के बाद न केवल मंत्रिमंडल में भाजपा की ताकत कम हुई है बल्कि देवेन्द्र फड़नवीस की भूमिका भी सीमित हो गई है। यह पहली बार है कि महाराष्ट्र में दो डिप्टी सीएम बने हैं।

ऐसे में महाराष्ट्र की राजनीति भ्रम और अनिश्चितता के माहौल में चल रही है। यह चर्चा भी जोरो पर है कि अजीत पवार जल्द ही एकनाथ शिंदे की जगह ले सकते हैं। हालांकि फड़नवीस ने इसका खंडन किया है। फिर भी 2 जुलाई को सरकार में शामिल होने के बाद अजीत पवार न सिर्फ उपमुख्यमंत्री बने बल्कि फड़नवीस की अनिच्छा और मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के भारी विरोध के बाद भी वित्त मंत्रालय लेने में सफल रहे। इतना ही नहीं अजीत पवार ने वित्त के साथ निगम, चिकित्सा शिक्षा और खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति जैसे महत्वपूर्ण विभाग भी अपने विधायकों के लिए हासिल कर लिये।
भाजपा के कैडर को यही बात रास नहीं आ रही है। भाजपा के कार्यकर्ताओं में इस बात को लेकर नाराजगी है कि राज्य में भाजपा के विधायकों की संख्या के अनुपात में मंत्री सबसे कम हैं। 105 विधायक होने के बावजूद, फड़नवीस सहित भाजपा के कोटे से मात्र 10 मंत्री हैं, जबकि शिंदे गुट को मात्र 40 विधायकों के साथ कैबिनेट में 10 मंत्री मिल गए हैं। पवार गुट के नौ मंत्री हैं जबकि यह अभी भी स्पष्ट नहीं है कि उन्हें एनसीपी के 53 विधायकों में से दरअसल कितने विधायकों का समर्थन प्राप्त है।
कैबिनेट में अभी भी 14 मंत्रियों के लिए स्थान शेष है और कैबिनेट में बची हुई जगह पाने के लिए शिंदे और पवार के बचे हुए विधायक दबाव बना रहे हैं कि उन्हे जल्द से जल्द मंत्री बनाया जाए। ऐसे में भाजपा के विधायकों के हाथ मे ज्यादा कुछ नहीं आने वाला है। भाजपा जहां अपने विधायकों के असंतोष का सामना कर रही है, वहीं उसे अपने कोर वोटरों को खोने का डर भी सता रहा है। भाजपा को इस बात की उम्मीद थी कि शिंदे और पवार के साथ आने पर 2024 के लोकसभा चुनाव में वह 48 लोकसभा सीटों में से 41 सीटें जीतने के अपने 2019 के प्रदर्शन को दोहरा पाएगी। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और बया कर रही है। भाजपा का कोर वोटर शिंदे और पवार के साथ को स्वीकार नहीं कर रहा है।
भाजपा के एक वरिष्ठ विधायक ने स्वीकार किया कि पार्टी में असंतोष है, और राजनीति के ऐसे बेमेल गठबंधन को हमारा कोर वोटर स्वीकार नहीं कर पा रहा है। हम कार्यकर्ताओं को समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि 'यह निर्णय भाजपा हाईकमान का है और ऐसा मोदी को पीएम के रूप में लगातार तीसरा कर्यकाल सुनिश्चित कराने के लिए किया गया है। लेकिन हमारे मतदाताओं के गले यह बात नहीं उतर रही है।'
भाजपा की सबसे बड़ी समस्या महाराष्ट्र के दो बड़े मराठा नेताओं को अपने साथ लाने के बाद अपने मूल मतदाता अन्य पिछड़ा वर्ग को साध कर रखना है। महाराष्ट्र में मराठा बनाम ओबीसी की लड़ाई गहरे तक समाई हुई है। मराठा अपनी राजनीतिक ताकत और पैसों के दम पर दलित और अन्य पिछड़ी जातियों पर दबदबा बना कर रखते हैं। ऐसे में भाजपा ने कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस की मराठा प्रभुत्व वाली राजनीति को चुनौती देने के लिए अन्य पिछड़े वर्ग में लगभग 400 जातियों को साधने के लिए लंबे समय से जमीनी स्तर पर काम किया था।
राज्य भाजपा के पूर्व महासचिव वसंतराव भागवत ने एक 'माधव फॉर्मूला' (माली, धनगर और वंजारी जातियों के पहले अक्षर को मिलाकर दिया गया संक्षिप्त नाम) बनाया था। उसके तहत गोपीनाथ मुंडे (वंजारी), एन. एस. फरांडे (माली) और अन्ना डांगे (धनगर) जैसे ओबीसी नेताओं की एक पीढ़ी तैयार हुई। इस सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूले ने भाजपा को ब्राह्मण-बनिया जैसी सवर्णों की पार्टी की छवि से छुटकारा पाने में भी मदद की और पिछड़ी जातियों में भाजपा की पैठ बनी। भाजपा ने धनगरों (चरवाहा समुदाय) पर पिछले कुछ समय से ज्यादा फोकस किया है। मराठा-कुनबी जाति समूहों (31.5 प्रतिशत) के बाद धनगर राज्य का दूसरा सबसे जाति समूह (12-15 प्रतिशत) है। धनगरों तक पहुंच बनाने के लिए भाजपा ने राष्ट्रीय समाज पार्टी (आरएसपी) के गोपीचंद पड़लकर और महादेव जानकर जैसे समुदाय के बड़े नेताओं को शामिल कराया। पड़लकर ने बारामती से अजित पवार के खिलाफ चुनाव लड़ा था, लेकिन हार गए थे। बाद में भाजपा ने उन्हें एमएलसी बनाया था।
गोपीचंद पड़लकर पवार परिवार पर अपने तीखे हमलों के लिए जाने जाते हैं और उन्होंने अजीत पवार के भाजपा के साथ आने के बाद भी साफ कह दिया था कि वह अजीत का विरोध पूरी ताकत से करेंगे। कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने 2019 के आम चुनाव में प्रकाश आंबेडकर के नेतृत्व वाली वंचित बहुजन अघाड़ी (वीबीए) को नजरअंदाज किया था, जिसके बाद वंचित बहुजन अघाड़ी अपने दम पर मैदान में उतरी और कांग्रेस और एनसीपी के आठ उम्मीदवारों की हार का कारण बनी। केन्द्र में मंत्री और महाराष्ट्र में भाजपा के सहयोगी रामदास आठवले का भी मानना है कि बदली हुई परिस्थितियों में भाजपा को अपने पिछड़ी जातियों के वोटरों को बचाकर रखना आसान नहीं होगा।
अपने ओबीसी मतदाताओं को साधने के साथ ही भाजपा के सामने एक दूसरी बड़ी समस्या यह भी है कि 2019 के विधानसभा चुनाव में एनसीपी से हार गए अपने उम्मीदवारों को उनके लिए सीट खाली करने या उनका सहयोग करने के लिए तैयार करना होगा। भाजपा के ज्यादातर नेता जो एनसीपी के उम्मीदवार से चुनाव हार गए थे, अपना दावा छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। ज्यादातर नेताओं ने संकेत दिया है कि अपना चुनाव क्षेत्र छोड़ने की बजाय वह अन्य पार्टियों को विकल्प के रूप में देखेंगे। जाहिर है यह संकेत भाजपा के लिए शुभ नहीं है।
भाजपा के एक एक वरिष्ठ नेता ने स्वीकार किया कि,"नया गठबंधन कागज पर अच्छा दिखता है, लेकिन स्थानीय स्तर पर चीजें उतनी सहज नहीं है। गांवों में दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं के बीच कड़वाहट गहरी है। ऐसे में जमीनी स्तर पर मिलन होना मुश्किल है।" कांग्रेस भी इसमें अपने लिए अवसर ढूढ़ रही है और कांग्रेस का मानना है कि ऐसे असंतुष्ट नेता महा विकास आघाड़ी के लिए उपयुक्त विकल्प हो सकते हैं, खासकर उन सीटों पर जहां भाजपा और एनसीपी में सीधी टक्कर थी।
इसके अलावा शिंदे और पवार के आने के बाद भाजपा के लंबे समय से महाराष्ट्र में सहयोगी रहे छोटे छोटें दलों की अपनी चिंताए भी है। आरएसपी जैसे भाजपा के छोटे सहयोगी दल भी राज्य की सत्ता से बाहर रखे जाने से नाराज हैं। रैयत क्रांति संगठन (आरकेएस) के किसान नेता सदाभाऊ खोत और आरपीआइ के दिग्गज अविनाश महातेकर 2019 से पहले की भाजपा-शिवसेना गठबंधन सरकार में मंत्री थे।
बहरहाल, तीन बड़ी पार्टियों के बीच मंत्रीपद के लिए मारामारी के कारण इन छोटी पार्टियों को सत्ता से वंचित होना पड़ा है। बीजेपी ने भी हाल में एनडीए की बैठक की तो इन छोटे दलों को बुलाना जरूरी नहीं समझा। इन छोटे दलों का कहना है कि अपने स्वार्थ के लिए भाजपा ने हमें नजरअंदाज कर दिया। समय आने पर हम भी भाजपा को नजरअंदाज कर सकते हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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