Madhya Pradesh: आंकड़ों के उलटफेर की संभावना से मध्य प्रदेश में बैचेनी
Madhya Pradesh: चुनाव परिणाम के दो दिन पूर्व तमाम एग्जिट पोल्स ने 5 राज्यों में संभावित सरकार बनने के जो आंकड़ें प्रस्तुत किए हैं, वे चौंकाते हैं। मध्य प्रदेश के परिपेक्ष्य में संभवतः किसी राजनीतिक पंडित ने ऐसे संभावित आंकड़ों की कल्पना नहीं की होगी। एक्सिस माई इंडिया और चाणक्य ने सत्तारूढ़ भाजपा सरकार की पुनर्वापसी का अनुमान लगाया है। खास बात यह है कि यह अनुमान भाजपा के विधानसभा चुनाव मतदान से पूर्व 'अबकी बार डेढ़ सौ पार' के नारे को चरितार्थ कर रहा है।
यह चौंकाने वाले आंकड़ें न तो कांग्रेस पार्टी को हजम हो रहे हैं और भाजपा को भी अचंभित कर रहे हैं। यदि 3 दिसंबर को मतगणना के बाद भी यही आंकड़ें रहते हैं तो निश्चित रूप से भाजपा मध्य प्रदेश में क्लीन स्वीप करेगी। इस अप्रत्याशित परिणाम को क्लीन स्वीप कहना इसलिए भी उचित है क्योंकि 18 वर्षों की भाजपा सरकार को यदि जनता का इतना स्नेह वोटों की फसल के रूप में प्राप्त हो रहा है तो यह प्रदेश से विपक्ष के साफ होने का संकेत है। किंतु, यदि अंतिम मतगणना के परिणाम एग्जिट पोल्स की अपेक्षा उलट आए और सी-वोटर तथा पोल्सट्रेट एजेंसी के अनुरूप आए तो फिर भाजपा संगठन की पेशानी पर बल पड़ना तय है। छत्तीसगढ़, तेलंगाना में कांग्रेस बढ़त बनाए हुए है और राजस्थान भी 'जादूगर' के अगले करतब को देख सकता है।

कुल मिलाकर एग्जिट पोल्स से 'कहीं खुशी-कहीं गम' की स्थिति बनी हुई है किंतु संभावनाएं राजनीति में कभी नहीं मरतीं अतः भाजपा-कांग्रेस दोनों ही अपने-अपने दावों पर अटल हैं और एग्जिट पोल्स के अनुरूप परिणाम दोनों दलों में बहुत कुछ बदल देंगे।
भाजपा में 'अजेय शिवराज' का इकबाल
यदि एग्जिट पोल अंतिम चुनाव परिणाम में बदलता है तो भाजपा में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान लोकप्रियता के उस पायदान पर पहुंच जाएंगे जहां वर्तमान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी काबिज हैं। यह भी संभव है कि ऐसे अप्रत्याशित चुनाव परिणाम से 'मोदी के बाद कौन?' की बहस पर भी विराम लग जाए क्योंकि तब स्वाभाविक ही शिवराज अपने समकक्षों से मीलों आगे खड़े नजर आएंगे। चूंकि भाजपा नेतृत्व ने इस बार किसी चेहरे को बतौर मुख्यमंत्री प्रस्तुत नहीं किया था और चुनाव 'कमल' के निशान पर लड़ा गया तो सभी का अनुमान था कि शिवराज सिंह किनारे कर दिए गए हैं।
हालांकि जैसे-जैसे चुनाव प्रचार आगे बढ़ा, शिवराज के मैराथन दौरों, चुनावी सभाओं और रोड शो ने पूरा परिदृश्य ही बदल दिया। शिवराज सिंह का 'लड़ूं या जाऊं' बयान मतदाताओं, खासकर महिलाओं के बीच खासा चर्चित रहा और इसे सहानुभूति कहें अथवा शिवराज की लोकप्रियता, उनका चेहरा पुनः 'एकमेव' हो गया।
वर्तमान राजनीति जिस ओबीसी वर्ग के इर्द-गिर्द हो रही है, शिवराज उसके भी सबसे बड़े चेहरे बनकर उभरे हैं। फिर भाजपा के मुख्यमंत्री के रूप में सबसे लंबे समय तक रहना उनका प्लस पॉइंट है। ऐसे में किसी भी नेतृत्व के लिए उन्हें नकार पाना संभव ही नहीं है। शिवराज प्रदेश में ऐसे मजबूत नेता के रूप में स्थापित हो चुके हैं कि अब भाजपा के निर्णय उन्हें दरकिनार करके नहीं लिए जा सकते।
इस चुनाव में यदि भाजपा डेढ़ सौ के आसपास भी रहती है तो इसमें शिवराज सिंह का चेहरा और उनके द्वारा प्रारंभ की गई लाड़ली बहना योजना का बड़ा योगदान होगा। एग्जिट पोल्स जिस छह प्रतिशत वोट का इजाफा भाजपा को दे रहे हैं उनमें प्रदेश की 50 प्रतिशत महिला मतदाताओं का वोट उन्हें मिलता दिख रहा है। लाड़ली बहना योजना का लाभ मध्य प्रदेश में जाति-वर्ग-धर्म की सीमा से परे 1 करोड़ 31 लाख से अधिक महिलाओं को मिल रहा है जो कांग्रेस की नारी सम्मान योजना से संभवतः प्रभावित नहीं हुईं। इससे पूर्व भी शिवराज सिंह द्वारा प्रारंभ की गईं लाड़ली लक्ष्मी योजना, मुख्यमंत्री कन्यादान योजना आदि देशभर में रोल मॉडल बनीं और उन्हें कई राज्य सरकारों ने जस का तस अपनाया।
शिवराज सिंह सोशल इंजीनियरिंग की राजनीति में भी फिट बैठे हैं और सभी वर्गों का उन्हें वोट मिलता दिखाई दे रहा है यानी शिवराज सिंह पुनः प्रदेश के 'जननायक' बनने की ओर अग्रसर हैं। कुल मिलाकर एग्जिट पोल्स के पूर्वानुमान से ही अभी तो शिवराज 'दिल्ली दरबार' के समानान्तर खड़े हो गए हैं।
कमलनाथ का राजनीतिक भविष्य दांव पर
कांग्रेस के चुनाव प्रचार की शुरुआत 'कपड़ा फाड़' प्रतियोगिता से हुई और दिग्विजय सिंह के अनमनेपन से समाप्त हुई। कांग्रेस ने पूरा चुनाव इस अपेक्षा से लड़ा कि जनता 2020 में उनकी सरकार के साथ हुई कथित नाइंसाफी का बदला भाजपा से लेगी, उन्हें कुछ नहीं करना है। कमलनाथ भी इसी आत्म-विश्वास का शिकार हुए। यहां तक कि एक्जिट पोल के अनुमान आ जाने के बाद भी वो इस पर विश्वास करने को तैयार नहीं है। कमलनाथ कह रहे हैं कि भाजपा झूठा माहौल बना रही है।
हां, यदि परिणाम इसके उलट आए, जैसा कि दो एजेंसीज ने अनुमान लगाया है और कांग्रेस विजयी होती है तो फिर कमलनाथ कांग्रेस में अशोक गहलोत के कद के नेता हो जाएंगे। उन्हें मध्य प्रदेश का 'जादूगर' कहा जाएगा। कमलनाथ के नेतृत्व में कांग्रेस यदि सत्तासीन होती है तो इससे यह संदेश भी जाएगा कि भाजपा द्वारा चुनी हुई सरकारों को अपदस्थ करना जनता को स्वीकार नहीं है और अवसर आने पर सबक सिखा सकती है। यही शायद कमलनाथ के घावों पर मरहम का काम भी करेगा।
कांग्रेस की सरकार बनी तो शिवराज सिंह की लोकप्रियता पर सवाल उठेगा। तब शिवराज सिंह की आगामी भूमिका पर बड़ा प्रश्नचिन्ह भी लग जाएगा। भाजपा के प्रतिकूल चुनाव परिणाम शिवराज सिंह के विरुद्ध जनता की प्रचंड एंटी-इन्कंबेंसी को इंगित करेगा जो उनकी छवि को डेंट मारेगा। चूंकि कांग्रेस ने चुनाव कमलनाथ के चेहरे पर लड़ा था, इसलिए उनकी संभावित जीत उनके बेटे 'नकुलनाथ' को भी स्थापित कर देगी। कमलनाथ के बाद नकुलनाथ ही अगले 10 वर्षों में वे कांग्रेस का प्रमुख चेहरा होंगे।
खैर आंकलन और वास्तविक आंकड़ों के बीच अब सिर्फ चंद घण्टों की दूरी है। 3 दिसंबर को इवीएम जब नेताओं की किस्मत का पिटारा खोलेंगी तो प्रदेश में शिवराज सिंह और कमलनाथ का बहुत कुछ दांव पर लगा होगा। देखना दिलचस्प होगा कि एग्जिट पोल्स की क्षणिक खुशी किस पर भारी पड़ती है और जनता किसे अपना 'नायक' चुनती है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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