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Loneliness: दुनिया पर भारी, अकेलेपन की महामारी

आठ अरब से भी ज्यादा मनुष्यों का ग्रह है पृथ्वी। फिर भी हर तीसरा वयस्क अकेलेपन का शिकार है। अकेलापन एक महामारी की तरह दुनिया को अपनी चपेट में ले चुका है।

Loneliness Threat To Public Health warn alarm by experts

Loneliness: अमेरिकी हेल्थ सर्विस के वाइस एडमिरल और सर्जन जनरल डॉ. विवेक मूर्ति ने पिछले सप्ताह अकेलेपन को लेकर बड़ी हैरतअंगेज चेतावनी दी है। डॉ. मूर्ति का कहना है कि अकेलापन स्वास्थ्य के लिए एक दिन में पंद्रह सिगरेट पीने के बराबर खतरनाक है।

उनका कहना है सामाजिक रूप से अकेले होना, असामयिक मृत्यु की एक बड़ी वजह हो सकता है। नशीली दवाओं के बेइंतहा इस्तेमाल, धूम्रपान से होने वाले कैंसर या मोटापे से भी बड़ी। अकेलापन समय से पहले मृत्यु के खतरे को 30 फीसदी बढ़ा देता है।

अकेलेपन के साइड इफेक्ट

मौत तो दरअसल उन नुकसानों की परिणति है जो अकेलेपन के कारण हमें उठाने पड़ते हैं। मृत्यु से पहले भी अकेलेपन के चलते हमें तरह - तरह की शारीरिक व मानसिक समस्याओं से जूझना पड़ता है। तनाव, अवसाद, चिड़चिड़ापन, ऊब, चिंता जैसी शिकायतें अकेलेपन से जुड़ी हैं। न्यूयार्क स्थित स्टेट यूनिवर्सिटी में इंटीग्रेटिव न्यूरो साइंस के प्रो. टरहन केनली का कहना है कि कैंसर और दिल के रोगों से जुड़े सैकड़ों जीन्स है, जो अकेलापन महसूस करने वाले लोगों में ज्यादा सक्रिय होते हैं, या इन्फ्लेमेशन जैसी समस्याओं को नियंत्रित रखने में अपनी भूमिका निभाना बंद कर देते हैं।

आर्थिक जगत के लिए भी अकेलापन काफी घाटे का सौदा है। इंश्योरेंस कंपनी सिग्ना के मुताबिक, अकेलेपन से संबंधित समस्याओं के चलते काम पर न आने वाले कर्मचारियों के कारण दुनिया भर की कंपनियों को हर साल करीब 11.70 लाख करोड़ रुपए का नुकसान उठाना पड़ता है।

बनाता है कट्टर

शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से ही नहीं बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी अकेलापन एक बहुत गंभीर चुनौती है। शिकागो यूनिवर्सिटी के सोशल न्यूरो साइंटिस्ट जॉन कैसियोप्पो ने अकेलेपन पर शोध करके कुछ नए किस्म के परिणाम हासिल किए हैं। उनका मत है कि लंबे समय तक अकेलेपन से जूझते रहने वाला व्यक्ति असुरक्षित महसूस करने लगता है। सुरक्षा की चिंता की वजह से वह कट्टरपंथी विचारधारा को पसंद करने लगता है और चुनावों में ऐसे ही दलों को समर्थन देता है, जो कट्टरवाद को बढ़ावा देते हैं। इस शोध में यह भी दावा किया गया है कि कोरोना काल में बढ़े अकेलेपन की वजह से दुनिया भर में कट्टरता बढ़ी है।

एक तिहाई आबादी है अकेलेपन की शिकार

अकेलेपन की समस्या वाकई आज बेहद विकराल हो चुकी है। करीब छह महीने पहले स्टेटिस्टा डॉट कॉम पर एक सर्वे पब्लिश हुआ। इसमें बताया गया था कि दुनिया भर में लगभग एक तिहाई (33%) वयस्क लोग खुद को अकेला महसूस करते हैं। सर्वेक्षण के मुताबिक ऐसे लोगों में सबसे ज्यादा ब्राजील (50%) के थे और इसके बाद तुर्की, भारत और सऊदी अरब के (क्रमश: 46 व 43-43 प्रतिशत )। दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका, जहाँ अकेलेपन को बहुत गंभीरता से लिया जा रहा है, अकेलापन को महसूस करने का प्रतिशत काफी कम पाया गया। 29 देशों की इस सूची में अमेरिका 17 वें स्थान पर था। जबकि, यू.एस. सेंसस ब्यूरो सर्वेज के अनुसार 60% अमेरिकी लगातार अकेलापन महसूस करते हैं।

ऐसे अनेक सर्वेक्षण समय-समय पर होते रहते हैं। उनके आंकड़ों में विभिन्नता हो सकती है, लेकिन इस बात पर सभी सहमत हैं कि अकेलापन एक ऐसी वैश्विक समस्या है, जिससे पूरी दुनिया जूझ रही है। चिंता की बात यह है कि समस्या अब सिर्फ वयस्कों तक सीमित नहीं रही है। रूट्स ऑफ लोनलीनेस प्रोजेक्ट की रिसर्च इस बारे में कई चौंकाने और डराने वाले तथ्य उजागर करती है।

इस रिसर्च के मुताबिक 18 से कम उम्र के 80% किशोर स्वयं को अकेला महसूस करते है। जबकि, 65 से अधिक उम्र के लोगों में अकेलापन अनुभव करने वाले सिर्फ 40% ही हैं। इसी रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ है कि, अकेलेपन की भावना से ग्रस्त स्त्रियों की तुलना में पुरुषों का प्रतिशत कुछ ज्यादा ( क्रमश: 45.3%, और 46.1%) है। अलग तरह के यौन रुझानों वाले व्यक्तियों में भी 42% अधिकतर समय अकेला महसूस करते हैं। इससे स्पष्ट है कि अकेलापन किसी भौगोलिक नस्ल क्षेत्र, आयु, जेंडर या यौन रुझानों तक सीमित नहीं है। हममें से कोई भी अकेलापन अनुभव कर सकता है।

असल में तो लगभग हर इंसान कभी न कभी खुद को अकेला महसूस करता है। धीरे-धीरे ऐसे अवसरों की संख्या और सघनता बढ़ती जाती है। और एक दिन हम खुद को अकेलेपन की एक ऐसी खाई में मौजूद पाते हैं, जहाँ हमारे आसपास कोई नहीं होता। जबकि सच तो यह है कि प्रकृति ने मनुष्य की रचना अकेले रहने के हिसाब से की ही नहीं है। आखिर उसे 'एक सामाजिक प्राणी' कहा जाता है तो यह अकारण तो नहीं होगा।

आत्मकेन्द्रितता और आत्ममुग्धता ने मानव को एक ऐसे असामाजिक प्राणी में बदल दिया है, जिसे अपने अलावा कुछ और नजर नहीं आता। और जब उसे 'खुद' से फुर्सत मिलती है तो वह आस- पास देखता है। तब भी उसे कोई नजर नहीं आता। क्योंकि उस समय वहाँ कोई होता ही नहीं। उसका यह अकेलापन वह कीमत है, जो उसे अपने 'सेल्फ सेंटर्ड' और 'सेल्फिश' व्यवहार के लिए चुकानी पड़ती है।

एक छोटे से उदाहरण के जरिए इस बात को आसानी से समझा जा सकता है। आप सिर्फ 10-15 साल पहले का दौर याद कीजिए। जब आप ट्रेन के कम्पार्टमेंट में बैठे होते थे और आपके सामने या बगल में बैठा व्यक्ति आपसे आपके गंतव्य के बारे में पूछता था। यहाँ से शुरू हुई बातों के सिलसिले में धीरे-धीरे आस-पास के सभी यात्री शामिल हो जाते थे। और इस तरह सफर कब खत्म हो जाता था, पता ही नहीं चलता था।

अब मौजूदा दौर देखिए। एक कम्पार्टमेंट में करीब एक दर्जन यात्री बैठे होते हैं। उनमें हर कोई अपने मोबाइल पर कुछ न कुछ देख या सुन रहा होता है। नेटवर्क है तो कोई फोन पर किसी से बात करते हुए दिख जाता है। कुछ देर के बाद हर कोई ऊब जाता है और फिर छटपटाता रहता है कि आगे का सफर कैसे कटे। जिसने शुरुआत में खुद को अकेला कर लिया, वह अंत तक अकेला ही रहता है।

साथ हो तो जीवन हो जाता है आसान

लोगों का साथ किस तरह मुश्किलों को आसान कर देता है, इसके लिए कुछ साल पहले वर्जीनिया यूनिवर्सिटी कैम्पस में एक प्रयोग किया गया। इसमें कुछ लोगों को समूह में और कुछ को एक-एक कर के एक पहाड़ी की तलहटी में ले जाया गया। उनसे पूछा गया कि इसकी चढ़ाई कितनी खड़ी है। पहाड़ी का झुकाव 26 अंश था। लेकिन दोनों तरह के प्रतिभागियों ने इसका अलग-अलग आकलन किया। समूह में शामिल लोगों को यह झुकाव ज्यादा लगा, यानि चढ़ना आसान लगा। वहीं, अकेले लोगों को यह ज्यादा सीधी चढ़ाई लगी।

इसी तरह जीवन की समस्याएं भी हैं। अकेले उनसे जूझना बहुत कठिन होता है, लेकिन सामूहिक प्रयास हर चुनौती को हल्का कर देते हैं। स्वास्थ्य की दृष्टि से भी लोगों का साथ, हमारा सामाजिक दायरा हमारे लिए काफी मुफीद साबित होता है। यह हमें उच्च रक्तचाप, अत्यधिक तनाव, कैंसर, हृदय रोग, अवसाद, अनिद्रा, वजन में गिरावट जैसी दिक्कतों से बचाता है।

अगर आप अकेलापन महसूस करने वालों में से हैं तो स्थिति बिगड़ने से पहले जागिए। भागकर अंधेरे की शरण में जाने के बजाए, बाहर की रोशनी में आकर देखिए। आपको अपने आस-पास ही अपने जैसे अकेले बहुत से लोग मिल जाएंगे। उनके साथ अकेलेपन को बांटिए। व्हाट्सएप चलाने की बजाए लोगों से 'व्हाट्स अप?' पूछिए। आज दुनिया को सोशल मीडिया की नहीं, बल्कि सोशल होने की जरूरत है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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