नई सरकार को नहीं मिलेगी सरपट दौड़ती अर्थव्यवस्था

नई दिल्ली। गांवों में एक कहावत कही जाती है- 'न खेलेंगे, न खेलने देंगे, सिर्फ खेल बिगाड़ेंगे।' कुछ इसी तरह के हालात भारतीय अर्थव्यवस्था की बन गई है। यूं कहें कि कहानी एकदम खराब होने के कगार पर है। केन्द्र मोदी सरकार के कामकाज से अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचा है। यूं कहें कि 26 मई को केन्द्र जिस पार्टी की भी सरकार बनेगी, उसके लिए राह आसान नहीं होगा। उस सरकार को तमाम आर्थिक मोर्चों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। चुनावी प्रक्रिया खत्म होने वाली है। इसी बीच कुछ चिंताजनक ख़बरें भी आने लगी हैं। ऐसा लगता है कि दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थवव्यवस्था मंदी की ओर जा रही है। अभी से इसके संकेत हैं।

नई सरकार को नहीं मिलेगी सरपट दौड़ती अर्थव्यवस्था

दिसम्बर के बाद के तीन महीनों में आर्थिक विकास दर 6.6% पर आ गई है, जो कि पिछली छह तिमाही में सबसे कम है। कारों और एसयूवी की बिक्री सात साल के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई है। ट्रैक्टर और दोपहिया वाहनों की बिक्री भी कम हुई है। बैंक और वित्तीय संस्थानों को छोड़कर 334 कंपनियों का कुल लाभ 18% नीचे आ गया है। इतना ही नहीं, मार्च में दुनिया में सबसे तेज़ी से बढ़ने वाले उड्डयन बाज़ार में पैसेंजर ग्रोथ पिछले छह सालों में सबसे कम रहा। बैंक क्रेडिट की मांग अस्थिर है। उपभोक्ता सामान बनाने वाली भारत की अग्रणी कंपनी हिंदुस्तान यूनिलीवर ने मार्च की तिमाही में अपने राजस्व में सिर्फ़ 7% की विकास दर दर्ज कराई, जो कि 18 महीने में सबसे कम है। इस प्रकार सवाल यह उठ रहा है कि भारत कहीं उपभोक्ता आधारित बाज़ार की कहानी में पिछड़ तो नहीं रहा। ये सब शहरी और ग्रामीण आमदनी में कमी को दर्शाते हैं, मांग सिकुड़ रही है। फसल की अच्छी पैदावार से खेतीबाड़ी में आमदनी गिरी है।

बड़े ग़ैर बैंकिंग वित्तीय संस्थानों के दिवालिया होने से क्रेडिट में ठहराव आ गया है जिससे क़र्ज़ देने में गिरवाट आई है।सत्रहवीं लोकसभा के चुनावों के दौरान उठे राजनीतिक धूल-गुबार के छंटने के दिन करीब हैं और 23 मई को तय हो जाएगा कि देश में कौन सा राजनैतिक दल या गठबंधन सरकार बनाएगा। दावों-प्रतिदावों के बीच देश के आम नागरिक और सरकार के लिए आने वाले दिन बहुत सुकून भरे नहीं रहने वाले हैं। काफी समय के बाद पहली बार नई सरकार के सामने देश की अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर चुनौतियों का पहाड़ खड़ा होगा। थोड़ा पीछे जाकर केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली पहली एनडीए सरकार की बात करें तो भले ही 'इंडिया शाइनिंग' का नारा राजनैतिक रूप से उसे भारी पड़ा हो, लेकिन वह सरकार एक तेज वृद्धि दर के दौर के लिए तैयार अर्थव्यवस्था छोड़कर गई थी। उसके बाद सत्ता में आई यूपीए की सरकार को बेहतर मौका मिला और अर्थव्यवस्था दो अंकों की तिमाही वृद्धि दर तक पहुंची, जो 2008 के वैश्विक आर्थिक संकट को भी झेल गई। लेकिन यूपीए-2 के दौरान 2013 तक अर्थव्यवस्था निचले स्तर पर पहुंच गई थी और उसके बाद सुधार का रुख कर चुकी थी। इस तरह से देखें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार को एक सुधरती अर्थव्यवस्था मिली थी। साल 2014-15 तो बेहतर रहा ही, 2015-16 और बेहतर रहा। लेकिन उसके बाद हालात सुधरने के बजाय बिगड़े और पहला झटका 2016-17 में लगा। भले ही सरकार कितने ही दावे करे लेकिन सच्चाई यह है कि अर्थव्यवस्था कमजोर वृद्धि दर के दौर में फंस गई है।

पिछले दिनों खुद प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस ऐंड पॉलिसी (एनआइपीएफपी) के डायरेक्टर रथिन रॉय ने स्वीकार किया कि अर्थव्यवस्था के कमजोर विकास दर के दौर में फंसने की स्थिति बन गई है। इसी तरह की जानकारी वित्त मंत्रालय ने ताजा समीक्षा में भी दी है। अब सवाल उठता है कि राजनैतिक मोर्चे पर राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे और राष्ट्रवाद की बैसाखी के सहारे चुनाव जीतने की कोशिश कर रही नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार को आर्थिक मोर्चे पर पैदा हुई परिस्थिति का जवाब देना होगा, क्योंकि देश का हर नागरिक एक बेहतर भविष्य की उम्मीद में ही सरकार चुनता है। उसके सामने 2014 में गुजरात मॉडल और अच्छे दिन का वादा रखकर वोट हासिल किए गए थे। लेकिन मौजूदा चुनावी माहौल में यह दावे गायब हैं। असल में कमजोर होती अर्थव्यवस्था की आहट ही नहीं, अब कई सारे तथ्य इसे साबित कर रहे हैं कि देश में उपभोक्ता मांग सुस्त पड़ रही है। यानी लोगों के पास या तो खर्च करने के लिए पैसे नहीं हैं या फिर वह संकोच कर रहे हैं। देश की बड़ी एफएमसीजी कंपनियां हिंदुस्तान यूनिलीवर और डाबर इंडिया की बिक्री से संकेत मिल रहे हैं कि रोजमर्रा की जरूरत के सामान में भी लोग कटौती कर रहे हैं। इसके अलावा जिस तरह से ऑटो सेक्टर की बिक्री के अप्रैल, 2019 के आंकड़े करीब एक दशक बाद सबसे बड़ी गिरावट दिखा रहे हैं, कि स्थिति काफी खराब हो गई है। वहीं, स्टॉक मार्केट में हाल के दिनों में लगातार नौ सत्रों की गिरावट ने भी दशकों का रिकॉर्ड बनाया है। औद्योगिक उत्पादन सूचकांक 21 महीने के निचले स्तर पर ही नहीं, बल्कि ताजा आंकड़ों में यह ऋणात्मक हो गया है। इसलिए केवल राजनीतिक बयानबाजी में ही 70 साल में पहली बार या 65 साल में पहली बार की बात नहीं की जा रही है। आर्थिक मोर्चे पर भी दो साल, 10 साल, 45 साल में पहली बार ऐसे रिकॉर्ड बन रहे हैं। रोजगार के मोर्चे पर सरकार द्वारा रोकी गई एनएसएसओ की रिपोर्ट 45 साल में सबसे अधिक बेरोजगारी की बात कह रही है। इस बीच आंकड़ों की विश्वसनीयता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।

लेबर ब्यूरो और एनएसएसओ के रोजगार के आंकड़े जारी नहीं किए गए। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की नई सीरीज और बैक सीरीज को लेकर सवाल उठे और राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग (एनएससी) लगभग निष्क्रिय स्थिति में पहुंच गया है। हाल में जब जीडीपी के आकलन के लिए उपयोग किए गए एमसीए-21 के आंकड़ों को लेकर सवाल उठे तो उसके चलते जीडीपी के मौजूदा स्तर पर ही सवाल उठ गया है।आर्थिक मसलों के विशेषज्ञ मानते हैं कि अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए कोई जादू की छड़ी नहीं है। इसके लिए दुनिया भर में एक ही तरह का फॉर्मूला अपनाया जाता है। जब आंकड़े नीचे जा रहे हों तो सरकार को सार्वजनिक खर्च बढ़ाना पड़ता है। ऐसे सार्वजनिक खर्च की बदौलत अमेरिका भी मंदी से बाहर आया था। भारत को भी नए जोश के साथ यह करना होगा। अर्थव्यवस्था अगर लगातार नीचे की ओर जाने लगेगी तो फिर आर्थिनक पैकेज की जरूरत पड़ेगी। हालांकि अभी वह नौबत नहीं आई है। ब्याज दरें घटाकर रिजर्व बैंक ग्रोथ को बढ़ावा दे सकता है। साथ ही भारत को अपनी निर्यात नीति पर पुनर्विचार करना होगा ताकि वैश्विक आर्थिक तरक्की में भागीदार बन सके। विश्व बैंक के एक अध्ययन में पाया गया है कि 1960 में मिडिल इनकम वाले 101 देशों में केवल 13 देश ही 2008 तक हाई इनकम (अमरीका के मुकाबले प्रति व्यक्ति आमदनी) देशों में शामिल हो पाए। इन 13 देशों में केवल तीन देशों की आबादी ढाई करोड़ से अधिक है। भारत लोवर मिडिल इनकम अर्थव्यवस्था है और ऐसे समय में इस जाल में फंसना दुखदायी है। बहरहाल, यह कह सकते हैं कि केन्द्र की मोदी सरकार की कथित गलत कार्यशैली की वजह से देश की अर्थव्यवस्था पटरी से उतरती हुई नजर आ रही है। देखना यह है कि आने वाली सरकार इस सिस्टम को किस तरह सुधारती है?

(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)

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