बनारस में बम बम मोदी
Varanasi Seat: 2012 में हिमाचल प्रदेश का इलेक्शन था और उस समय मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। हिमाचल में भाजपा की जीत हुई तो उस जीत की बधाई देते बैनर बनारस में लगाये गये थे। यह दूरगामी राजनीति करनेवाले नरेन्द्र मोदी की पहल पर किया गया था या फिर बनारस के लोगों ने 2012 में ही 2014 की पटकथा लिखनी शुरु कर दी थी, यह पता नहीं। लेकिन मोदी बनारस की पसंद तब बन गये थे जब वो राष्ट्रीय परिदृश्य पर नहीं आये थे।
इसलिए बनारस में जब से मोदी आये हैं उनकी बम बम है। 2014 में जरूर अरविन्द केजरीवाल की मौजूदगी ने उन्हें परेशान किया था लेकिन 18 लाख से अधिक वोटरों वाले बनारस में मोदी की लड़ाई जीत हार की नहीं होती। उनकी लड़ाई इस बात के लिए होती है कि वो कितने बड़ी मार्जिन से चुनाव जीतते हैं।

2014 में साढे तीन लाख वोटों के अंतर से और 2019 में चार लाख 80 हजार वोटों से जीते। इसके बावजूद वो देश में सर्वाधिक मतों से चुनाव जीतने का रिकार्ड नहीं बना पाये। इस बार बनारस की गलियों में जिस तरह से केन्द्रीय मंत्री, प्रदेशों के मुख्यमंत्री से लेकर भाजपा के नेता पदाधिकारी भटक रहे हैं उसे देखकर लगता है कि इस बार मोदी यहां से देश में सर्वाधिक मतों से जीत का रिकार्ड बनाना चाहते हैं।
नब्बे के दशक में अयोध्या में शुरु हुए रामजन्मभूमि आंदोलन का सबसे अधिक राजनीतिक प्रभाव भोले की नगरी काशी में ही हुआ। तब से लेकर आज तक यह सीट भाजपा के लिए एक सुरक्षित सीट की तरह है। सिर्फ 2004 में एक बार कांग्रेस के राजेश मिश्रा ने यहां जीत दर्ज की थी तो इस बार भी मोदी के सामने कांग्रेस के टिकट पर अजय राय मैदान में हैं। वरना 1991 से लेकर 2019 तक यहां बीजेपी के ही उम्मीदवार एकतरफा जीतते आ रहे हैं।
लेकिन सिर्फ इस तथ्य को ध्यान में रखकर मोदी ने यह सीट अपने चुनाव लड़ने के लिए चुनी होगी, ऐसा लगता नहीं है। मोदी से पहले 2009 में यहां से डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी भाजपा के टिकट पर चुनाव मैदान में थे। अपनी परंपरागत इलाहाबाद सीट छोड़कर उन्हें बनारस इसलिए आना पड़ा था क्योंकि इलाहाबाद सीट उनकी जीत के लिए असुरक्षित हो गयी थी और वो वहां से चुनाव लड़ना चाहते थे जहां हार की कोई गुंजाइश न हो। बनारस ने उन्हें निराश नहीं किया। मुख्तार अंसारी के सामने उनकी जीत मात्र 18 हजार वोटों से हुई लेकिन वो बनारस से जीतकर संसद पहुंचने में कामयाब हो गये।
2014 में मोदी का बनारस से चुनाव लड़ने का निर्णय किन कारणों से हुआ होगा यह तो वही लोग जानें लेकिन बनारस मानों मोदी की प्रतीक्षा में 2012 से ही बैठ गया था। बनारस का न सिर्फ सांस्कृतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है बल्कि इसका राजनीतिक रूप से भी बहुत अधिक महत्व है। बनारस भारत का संभवत: इकलौता ऐसा शहर है जहां रोज सुबह शाम चौक चौराहों पर भारत की ही नहीं वैश्विक राजनीति पर विमर्श होता रहता है। दुनिया में घटित होनेवाली घटनाओं पर जितनी चर्चा बनारस में होती है, उतनी धरती के किसी और शहर में होती होगी, ऐसा लगता नहीं है।
बनारस में रहनेवाले लोग बनारस को न सिर्फ भारत की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और धार्मिक राजधानी कहते हैं बल्कि वो चर्चा और संवाद के लिहाज से इसे भारत की राजनीतिक राजधानी भी बनाते हैं। यहां होनेवाली राजनीतिक चर्चाओं में जिन सूचनाओं का आदान प्रदान या विश्लेषण होता है उसे सुनकर किसी को विश्वास नहीं होगा कि राजनीतिक घटनाओं का इतना गहन विश्लेषण यहां होता है तो क्यों होता है? क्या उनके पास अन्य कोई काम नहीं है या फिर सचमुच वो बनारस में बैठकर दिल्ली की राजनीति की दशा दिशा तय करते हैं?
अगर हम काशी के धार्मिक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व पर न भी जाएं तो सिर्फ राजनीतिक महत्व के कारण यह जरूरी था कि भारत का कोई प्रधानमंत्री यहां से उम्मीदवार होता। बनारस से उम्मीदवार होकर मोदी ने बनारसियों की उसी चिर प्रतिक्षित इच्छा को मानों पूरा कर दिया। इसलिए बनारसी भाषा में कहें तो मोदी को पाकर बनारसियों की भी बम बम हो गयी। एक औसत बनारसी वोटर के लिए मोदी को वोट देने का मतलब देश के लिए प्रधानमंत्री निर्धारित करनेवाला काम है। वह अपने कंधों पर ऐसे ही भारी भरकम राजनीतिक जिम्मेदारियों को उठाना पसंद करता है। बनारसियों को इससे अधिक और क्या चाहिए?
लेकिन बनारस की माटी ऐसी है कि यहां गोस्वामी तुलसीदास के लिए जगह है तो संत कबीर भी यहीं पाये जाते हैं। बनारस किसी को नकारता नहीं। वह सबको स्वीकारता है और उसे अपने बीच ही कहीं जगह भी देता है। इसलिए ऐसा भी नहीं है कि मोदी को बनारस ने स्वीकार किया तो विपक्ष का संपूर्ण बहिष्कार कर दिया। बनारस को जानते समय हमें यह भी जानना होगा कि दो विपरीत वैचारिक ध्रुव पर बैठे बनारसी भी साथ साथ गंगा नहाते हैं।
इसलिए बनारसी किसी को हराता जिताता नहीं है। वह तो न्याय करता है। जो जीते वो जीते लेकिन उसके सामने जो खड़ा हो उसकी जमानत जब्त हो जाए, यह उसके मन मानस से मेल नहीं खाता। अगर वह देश में मोदी की जरूरत को महसूस कर रहा है तो उसे यह भी पता है कि विपक्ष का होना कितना जरूरी है। इसलिए हो सकता है 'सबसे बड़ी मार्जिन से जीत' वाली मानसिकता उसे पसंद न आये लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह मोदी के महत्व को नकार देगा।
बनारस में मोदी का बम बम होगा तो विरोधी का हर हर जरूर होगा। यही बनारस का राजनीतिक न्याय है जिसे करने में वह कभी पीछे नहीं रहना चाहता।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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