NDA: मोदी को एनडीए की याद क्यों आयी?

NDA: ज्यादा पुरानी बात नहीं है। पिछले साल अगस्त में भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने पटना में कहा था कि "सभी क्षेत्रीय पार्टियां खत्म होती जा रही हैं। जो खत्म नहीं हुए वो जल्दी ही खत्म हो जाएंगे। बचेगी तो सिर्फ भाजपा।" इस बयान के सालभर के भीतर ही वही जेपी नड्डा ऐलान करते नजर आये कि 18 जुलाई को देश के 38 राजनीतिक दल एनडीए के बैनर तले इकट्ठा हो रहे हैं। इस तरह हमारे पास एनडीए का कुनबा सबसे बड़ा है।

लगातार दो चुनावों 2014 और 2019 में अपने दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बना चुकी भाजपा के रुख में ये बदलाव क्यों आ गया? भाजपा 2024 के लिए एनडीए का विस्तार करने के लिए जिस तरह बेचैन है, वह यह बताने के लिए पर्याप्त है कि विपक्ष की एकता के गंभीर प्रयासों ने भाजपा को अंदर तक हिला दिया है। इसीलिए ठीक उसी दिन दिल्ली में एनडीए की बैठक रखी गयी जिस दिन बंगलुरु में 26 विपक्षी दल मिल रहे थे।

lok sabha election 2024 Why did narendra Modi remember NDA?

भाजपा ने अपने बूते 2014 में 282 और 2019 में 303 सीटें जीती थी। भारत की सबसे ज्यादा सामर्थ्यवान पार्टी और उसके कुशल रणनीतिकार मोदी और शाह जानते हैं कि वो अलग अलग दलों से लड़कर तो जीत सकते हैं लेकिन संयुक्त विपक्ष जीत पाना कठिन होगा। इसलिए मोदी और शाह के लिए अनिवार्य हो गया है कि वह लगातार तीसरी बार सत्ता वापसी करने के लिए छोटे छोटे दलों को अपनी छतरी के नीचे लाकर एनडीए से ज्यादा खुद को सुरक्षित महसूस करने की पहल करें।

भाजपा की सबसे बड़ी चिंता उत्तर प्रदेश को सुरक्षित करना है, जहां वह 80 मेें से 80 जीतने का लक्ष्य लेकर चल रही है। उत्तर प्रदेश में भाजपा को 2019 में 64 सीटें मिली थी। 80 सीटें जीतने के लिए भाजपा को 64 को बरकरार रखने के साथ 16 सीटें और जीतनी होगी। इसलिए भाजपा ने ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी को एनडीए का हिस्सा बना लिया है। राजभर की पार्टी को 2019 के आम चुनाव में 1% से भी कम वोट मिले थे। हालांकि पूर्वांचल की 15 सीटों पर राजभर वोटबैंक का प्रभाव है, जिसके कारण भाजपा पूर्वांचल की कई सीटें हार गई थी। कुर्मी के प्रभाव के कारण अपना दल को भाजपा ने जोड़ रखा है और अब जयंत चौधरी को भी अपने पाले में लाने के लिए भरसक प्रयास कर रही है। प्रदेश में भाजपा गैर यादव ओबीसी वोटरों को अपने साथ जोड़ने के लिए छोटे छोटे कितु अपने क्षेत्र में प्रभावशाली दलों को जोड़ रही है।

बिहार में भाजपा को नीतीश और तेजस्वी के मजबूत सामाजिक आधार वाली पार्टियों से तगड़ी चुनौती मिल रही है। 2019 में नीतीश कुमार ने एनडीए के साथ चुनाव लड़ा था और बिहार में एनडीए ने 53 फीसदी वोट हिस्सेदारी के साथ 40 में से 39 सीटें जीत ली थी। अब पलड़ा नीतीश और तेजस्वी की ओर झुकता देख भाजपा ने एनडीए का विस्तार करने के लिए बिहार में सेंध लगाने की शुरूआत कर दी है। भाजपा के इसी अभियान के तहत जीतनराम मांझी का हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा और राष्ट्रीय लोक समता दल के उपेन्द्र कुशवाह को अपने साथ लाने में सफल रही है।

इसके अलावा चिराग पासवान की एलजेपी (रामविलास), मुकेश साहनी की वीआईपी ने भी एनडीए का दामन थाम लिया है। चिराग पासवान को आगे कर भाजपा लोकसभा चुनाव में बिहार के 4.5% पासवानों को साधने, मांझी के हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा से महादलितों को और मुकेश साहनी की विकासशील इंसान पार्टी को साथ लेकर नाविकों, मछुआरों और किसानों के वोट एनडीए के पक्ष में करने की तैयारी भाजपा ने शुरू कर दी है। 2019 के लोकसभा चुनाव में बिहार में भाजपा की सहयोगी एलजेपी ने 6 सीटें जीतीं और उसे 8% वोट मिले थे। राष्ट्रीय लोक समता पार्टी, विकासशील इंसान पार्टी, और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा यानि हम की लोकसभा में कोई सीट नहीं है लेकिन इन दलों को 7% वोट मिले थे।

बिहार के साथ भाजपा का ध्यान महाराष्ट्र पर भी है, जहां से उत्तर प्रदेश के बाद सबसे ज्यादा 48 लोकसभा की सीटें आती है। 2019 में भाजपा ने अविभाजित शिवसेना के साथ चुनाव लड़ा और दोनो ने मिलकर 48 में से 41 सीटें जीत ली। इसमेें भाजपा की 23 और शिवसेना की 18 सीटें थी। एनडीए गठजोड़ को 51.3 फीसदी वोट मिलें। अलग अलग वोट हिस्सेदारी और गठबंधन के जोड़ महाराष्ट्र में जीत की कुंजी है। शिवसेना के राष्ट्रवादी कांग्रेस और कांग्रेस के साथ हाथ मिलाने पर यह तय था कि अगर यह गठबंधन 2024 तक बना रहा तो ऐसे में इस गठबंधन की कुल 55 फीसदी वोट हिस्सेदारी में सेंध लगाना भाजपा के लिए मुमकिन नहीं होगा और इस कारण भाजपा ने पहले शिवसेना को तोड़कर महाराष्ट्र में सरकार बनाई और 2 जुलाई को राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को तोड़कर 2024 के लिए एनडीए को मजबूत कर लिया। एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना और अजीत पवार के नेतृत्व में एनसीपी ने 18 जुलाई को दिल्ली में एनडीए की बैठक में हिस्सा लेकर भाजपा को राहत दी।

पश्चिम बंगाल चुनाव में ममता की एकतरफा जीत और आने वाले लोकसभा चुनाव में तृणमूल, कांग्रेस और लेफ्ट के मिलकर चुनाव लड़ने की संंभावना ने भाजपा को बैचेन कर दिया है। भाजपा ने 2019 के लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में 18 सीटें जीती थीं। ऐसे में अगर बंगाल में लेफ्ट, कांग्रेस और तृणमूल साथ आ गए तो बीजेपी को अपनी 18 सीटें बचाकर रखना आसान नहीं होगा। इस कारण भाजपा यहां पर तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस में सेंध लगाने की रणनीति पर काम कर रही है। हो सकता है कि आने वाले दिनों में ममता के भतीजे और तृणमूल कांग्रेस में नंबर दो की हैसियत रखने वाले अभिजीत बनर्जी के खिलाफ शिक्षक भर्ती घोटाले में उनकी कथित भूमिका की जांच तेज कर दी जाए।

उत्तर में बेहद मजबूत होेने के बाद भी एनडीए का कुनबा बढ़ा रही भाजपा दक्षिण में भी सहयोगी को साधने और एनडीए को मजबूत करने की रणनीति अपना रही है। भाजपा की नजर तमिलनाडु पर भी है जहां से लोकसभा की 39 सीटें आती हैं और भाजपा के पास एक भी नहीं है। भाजपा यहां अन्नाद्रमुक के टूटे धड़े पनीरसेल्वम और टीवी दिनाकरण के साथ गठजोड़ करके आगे बढ़ना चाहती है।

तेलंगाना में भाजपा ने 2019 में 4 सीटें जीती थी। भाजपा 2024 में एनडीए के लिए इस राज्य से 17 में 9 सीटें चाहती है। केंद्रीय मंत्री किशन रेड्डी को वहां का नया प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है। वहीं भारत राष्ट्र समिति छोड़कर भाजपा में शामिल हुए इटाला राजेंद्र को चुनाव समिति का संयोजक नियुक्त किया गया है। विवादास्पद हिंदुत्ववादी नेता और भाजपा से निलंबित विधायक राजा सिंह को भी मनाने की कोशिश की जा रही है।

तेलंगाना के पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश में भाजपा सत्तारूढ युवजन श्रमिक रायतु कांग्रेस (YSR Congress) के जगन मोहन रेड्डी से दोस्ताना संंबंध बना रही है जिससे लोकसभा में शक्ति परीक्षण में भाजपा को जगह मोहन का साथ मिल सके। जगह मोहन रेड्डी कांग्रेस के शासन में जेल जा चुके हैं और अभी भी सीबीआई और ईडी इनके खिलाफ कई मामलों की जांच कर रही है। ऐसे में जगनमोहन रेड्डी भले ही एनडीए में शामिल न हो, जरूरत पड़ने पर एनडीए का साथ देंगे यह तय है।

भाजपा ने आंध्र प्रदेश में टीडीपी के संस्थापक एनटी रामाराव की तीसरी बेटी और पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडु की साली दग्गुबाती पुरंदेश्वरी को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया है। भाजपा की रणनीति यह है कि प्रभावशाली कम्मा समुदाय के वोटों का बंटवारा किया जा सके और चंद्रबाबू नायडु की पार्टी में सेंध लगाकर एनडीए को मजबूत किया जा सके।

इसी तरह कर्नाटक में विधानसभा चुनाव हार चुकी भाजपा जेडीएस को एनडीए में लाने की कोशिश कर रही है। विधानसभा चुनाव में जेडीएस को 13 फीसदी मत मिला था। भाजपा जेडीएस को साथ लाकर कर्नाटक की 28 में से पिछली बार की 25 सीटें बरकरार रखना चाहती है। जेडीएस ने अभी अपने पत्ते खोले नहीं है, लेकिन एनडीए में जाने की उसकी पूरी संभावना बन रही है। पंजाब में भाजपा अपने सबसे पुराने सहयोगियों में से एक अकाली दल को फिर से एनडीए में लाने की कोशिश में है। पंजाब में आप की ताकत से निपटने के लिए भाजपा को अकाली दल का साथ चाहिए।

लेकिन 2024 को लेकर भाजपा का मुख्य फोकस विपक्ष शासित तेरह राज्यों पर है। इन 13 राज्यों से लोकसभा की 298 सीटे आती हैं। 2019 में भाजपा ने इसमें से एनडीए के साथ मिलकर 119 सीटें जीती थी। ऐसे में भाजपा एक बार फिर इन राज्यों में अपनी पकड़ मजबूत करने के साथ एनडीए का विस्तार करने की रणनीति पर काम कर रही है। मोदी और शाह के पास पहुंच रही खबरों को मानें तो अगले आम चुनाव में भाजपा को बिहार, कर्नाटक, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में 30 से 40 सीटों का नुकसान हो सकता है। ऐसे में इस नुकसान की भरपाई करने के लिए भाजपा एनडीए मेे ऐसे दलों को शामिल कर रही है जिनका भले ही लोकसभा में एक भी सांसद न हो लेकिन एक दो प्रतिशत वोट पा जाते हैं।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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