Opposition Breakup: बिखरते विपक्ष ने आसान की मोदी की जीत?

Opposition Breakup: 23 जून 2023 को 15 राजनैतिक दलों के 32 नेता 2024 केे आम चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी की अगुवाई वाली केन्द्र सरकार को उखाड़ फेकने के लिए साझा मिशन का ऐलान करने के लिए पटना में एकत्रित हुए थे।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के प्रयासों से पटना पहुंचे विपक्षी गठबंधन के नेताओं का घोषित उद्देश मोदी की 'फासीवादी और निरंकुश हुकूमत' से भारतीय लोकतंत्र को बचाना था। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चेतावनी देते हुए कहा था कि 'अगर भाजपा 2024 का लोकसभा चुनाव जीत जाती है तो भविष्य में फिर कोई चुनाव नहीं होगा'।

lok sabha election 2024

पटना में एकत्रित विपक्ष जब लोकतंत्र बचाने की बात कर रहा था तो उसकी चिंता लोकतंत्र से ज्यादा मोदी के सामने अपने अस्तित्व को बचाने की कोशिश भर थी। मई 2023 में कर्नाटक में कांग्रेस की जीत ने निर्जीव पड़े और भाजपा के सामने लगभग हथियार डाल चुके बीजेपी विरोधी खेमे में जान डालने के साथ कांग्रेस को विपक्ष की धुरी बनने का मौका उपलब्ध करा दिया था। नीतीश कुमार ने साफ कह दिया था कि बिना कांग्रेस के कोई विपक्षी गठबंधन नहीं हो सकता।

कागजों पर विपक्षी नेताओं का गणित मजबूत दिख भी रहा था। 2019 के लोकसभा चुनाव में इन 15 पार्टियों को कुल मिलाकर भाजपा के 22.90 करोड़ वोटों से 16 लाख ज्यादा वोट मिले थे। अलग अलग चुनाव लड़ने की वजह से 2019 में लोकसभा की 543 सीटों में से 154 सीटें ही विपक्ष हासिल कर सका था। विपक्ष मान कर चल रहा था कि एक साझा उम्मीदवार मोदी के खिलाफ उतारेंगे तो 14 राज्यों में फैली 336 सीटों पर भाजपा के लिए चुनौती पेश की जा सकती है और मोदी को लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने से रोका जा सकता है।

2019 में भाजपा ने इनमें से 169 या 50 फीसदी सीटें जीती थी। कम से कम 425 सीटों पर एकजुट विपक्ष का उम्मीदवार उतारने के पक्ष में आम राय बनाई जा रही थी। विपक्षी दलों का कहना था कि कांग्रेस उन सीटों पर बेहतर प्रदर्शन करे जहां भाजपा के साथ उसकी सीधी टक्कर है।

2019 के चुनाव में दोनो पार्टियां 186 सीटों पर एक दूसरे के खिलाफ लड़ी थी। कांग्रेस ने महज 15 सीटें जीती। कांग्रेस ने जिन 421 सीटों पर चुनाव लड़ा उनमें से 148 सीटोें पर जमानत गवां बैठी। मोदी के खिलाफ बने गठबंधन में शामिल विपक्षी दलों का फार्मूला था कि कांग्रेस हर राज्य में सबसे मजबूत पार्टी को भाजपा के खिलाफ लड़ने दे और कांग्रेस उन राज्यों पर फोकस करे जहां वह सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ अकेली लड़ती है।

23 जून 2023 को कागजों पर मजबूत दिख रहा विपक्षी गठबंधन 210 दिन बाद ही 28 जनवरी 2024 को तार तार हो गया जब नीतीश ने इंडिया गठबंधन को छोड़ एनडीए गठबंधन का हाथ थाम लिया। लगे हाथ बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी बंगाल की सभी सीटों पर अकेले लड़ने और राहुल गांधी की न्याय यात्रा के बंगाल पहुंचने पर उन्हे प्रवासी पक्षी कहकर गठबंधन से बाहर होने की औपचारिकता पूरी कर दी। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पंजाब में कांग्रेस से गठबंधन करने से सिर्फ इंकार ही नहीं किया असम की तीन सीटों डिब्रुगढ, गुवाहाटी, सोनितपुर और गुजरात की भरूच से उम्मीदवार घोषित कर दिए।

झारखंड में जेल जाने से पहले हेमंत सोरेन कह चुके हैं कि इस बार कांग्रेस को लोकसभा में 9 सीटें देना संभव नहीं होगा। केरल में जहां से 20 लोकसभा सीटें आती हैं और 2019 के चुनाव में कांग्रेस ने 20 में से 15 सीटें जीती थी, वहां पर भी कांग्रेस के अगुवाई वाले यूनाईटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की अगुवाई वाले लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट की राहें जुदा हो चुकी है।

उत्तर प्रदेश के बाद सबसे ज्यादा 48 लोकसभा सीट देने वाले महाराष्ट्र में भी उद्धव ठाकरे की शिवसेना और कांग्रेस में 7 बैठकों के बाद भी समझौता नहीं हो सका है। उत्तर प्रदेश में जयंत चौधरी का एनडीए में जाना लगभग तय हो गया है। मायावती पहले ही किसी भी गठबंधन का हिस्सा होने से इंकार कर चुकी हैं। कर्नाटक में जेडीएस एनडीए में आ चुका है और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और टीडीपी के अध्यक्ष चंद्रबाबू नायडू एनडीए का हिस्सा बनने के लिए दिल्ली में डेरा डाल चुके हैं।

दरअसल इंडिया गठबंधन की कामयाबी बहुत कुछ सहयोगी दलों के साथ सीटों के सार्थक बंटवारे की व्यवस्था तैयार करने की कांग्रेस की क्षमता पर टिकी थी। मगर कांग्रेस ने मौके की नजाकत को भांपकर और उस पर खरा उतरने की बजाय सीटों की गैरवाजिब मांग करते हुए बेतुका रवैया अपनाया, जिसके कारण इंडिया गठबंधन तार तार हो गया।

इंडिया गठबंधन के सामने एकमात्र चुनौती सिर्फ सीटों का बंटवारा ही नहीं थी, इसमें शामिल क्षेत्रीय नेताओं की प्रधानमंत्री पद को लेकर महत्वाकांक्षाएं भी थी। उसके बाद राह़ुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा ने सहयोगी दलों की बैचेनी बढ़ा दी। कांग्रेस ने राहुल की यात्रा को सामूहिक अभियान बनाने की बजाय सिर्फ राहुल और कांग्रेस की यात्रा बना दिया।

विपक्ष के अधिकांश नेता राहुल गांधी को मोदी की लोकप्रियता के मुकाबले सबसे कमजोर कड़ी मानते है। विपक्षी गठबंधन के सामने मोदी की अगुवाई वाली भाजपा से मुकाबला के लिए एक विश्वसनीय चेहरे के अभाव के साथ साथ कोई भरोसेमंद नैरेटिव न होने ने भी इंडिया गठबंधन के बिखरने में भूमिका निभाई।

मोदी 10 साल के अपने काम के दम पर भारतीय जनता पार्टी को 370 सीटें और एनडीए को 400 सीटें मिलने का दावा कर रहे हैं। मोदी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर लोकसभा और राज्यसभा में बोलते हुए विपक्ष को जिस तरह से लपेटा और केन्द्र सरकार यूपीए कार्यकाल के दौरान आर्थिक अनियमितताओं पर जो श्वेत पत्र लेकर आई उस पर विपक्ष मोदी सरकार के किसी भी आरोप का तार्किक जवाब नहीं दे सका।

वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियां बताती हैं कि मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिलना तय है। बहस इस पर हो सकती है कि मोदी 2019 में मिली 303 सीटों से कितने आगे जा पाएंगे। मोदी जहां अपने लिए 370 सीटों का टार्गेट सेट कर रहे हैं वहीं कांग्रेस 2019 में मिली 52 सीटों के लिए भी संघर्ष करती नजर आ रही है।

विपक्ष की एकता हवा हो चुकी है और मोदी के तीसरे कार्यकाल के लिए चुनाव औपचारिकता भर है। मोदी को तश्तरी में रखकर जीत विपक्ष ने सौंप दी है। 2024 में एकतरफा होने जा रहे चुनाव के लिए मोदी के काम से ज्यादा विपक्ष का बिखराव सबसे बड़ा कारण है। मोदी ने राज्यसभा में ठीक ही कहा था कि विपक्ष का गठबंधन भानुमति के कुनबे से ज्यादा कुछ नहीं था। इस एलांयस का एलाइनमेंट खराब हो चुका है और कांग्रेस चुनाव लड़ने का विश्वास भी खो चुकी है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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