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कांग्रेस की कमजोरी का नुकसान भुगत रहे मोदी

Congress Party: कांग्रेस मुक्त भारत का नारा दस साल पहले नरेन्द्र मोदी ने ही दिया था। लेकिन आज दस साल बाद संभवत: नरेन्द्र मोदी को ही कांग्रेस की कमजोरी खल रही है, इसलिए वह खुद इस आम चुनाव को भाजपा बनाम कांग्रेस बनाने के लिए पूरी मेहनत कर रहे हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए कहा जाता है कि मजबूत विपक्ष सशक्त लोकतंत्र के लिए जरूरी होता है।

यह विपक्ष पार्टी के भीतर और बाहर दोनों जगह जितना मजबूत होता है, पार्टी का लीडर उतनी ही कम गलतियां करता है और लोकमानस में गहरे बैठ पाता है।

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लेकिन यह मोदी का सौभाग्य ही कहा जाएगा कि दो बार के कार्यकाल में उनके नेतृत्व में भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला जिसके कारण विपक्ष तो साफ हुआ ही, पार्टी के भीतर भी उनके आलोचकों का अकाल हो गया। इस परिस्थिति ने संभवत: उन्हें इस मन:स्थिति में पहुंचा दिया कि वो जो करते हैं बिल्कुल सही करते हैं और उनके हर किये को जनता का समर्थन हासिल है। एक बार तो संसद में खड़े होकर उन्होंने कहा भी था कि मोदी को और कुछ समझ आता हो या न आता हो लेकिन राजनीति तो समझ में आती है। जब वो ऐसा बोल रहे थे तो उनका इशारा उसी कांग्रेस की ओर था जिससे भारत को मुक्त कराने के लिए 2014 में उन्होंने गांधीनगर से दिल्ली कूच किया था।

लेकिन आज दस साल बाद जिस तरह से खुद नरेन्द्र मोदी पूरे चुनाव को भाजपा बनाम कांग्रेस बनाने में लगे हुए हैं उससे इतना तो साफ हो जाता है कि भारत प्रचंड बहुमत वाली किसी इकलौती राष्ट्रीय पार्टी का लोकतंत्र नहीं हो सकता। केन्द्र में सदैव दो सशक्त दावेदार ही इस देश के लोगों का समुचित प्रतिनिधित्व कर पायेंगे और लोकतंत्र को मजबूती दे पायेंगे।

मोदी ने ही यह चूक की हो ऐसा नहीं है। सत्ता और सफलता का ऐसा प्रभुत्व होता है कि जो इसे पा लेता है वह अपने अलावा बाकी सबके अस्तित्व को खत्म करने का ख्वाब देखने लगता है। अस्सी नब्बे के दशक में जब भाजपा कांग्रेस का विकल्प बनकर उभर रही थी तब कांग्रेस ने उसे गहरे गड्ढे में दबा देने के हर संभव उपाय किये थे। इसी संसद में जहां आज कांग्रेस इतनी सीटें भी नहीं जीत पा रही है कि उसे नेता विपक्ष का पद मिल जाए, वहीं बैठकर उसने चुनी हुई कई बीजेपी सरकारों को उखाड़ फेंका था।

उस समय कांग्रेस अहंकार के शिखर पर थी। उसके पास सत्ता थी। उसे कभी लगता ही नहीं था कि चालीस साल से केन्द्र की सरकार चलानेवाली कांग्रेस की कभी ऐसी दुर्दशा भी हो जाएगी कि उसे पचास सीट के लिए भी लाले पड़ जाएंगे। आज उत्तर भारत में हालात यह हैं कि यूपी बिहार से कांग्रेस का लगभग नामो निशान मिट चुका है। बाकी बचे हिमाचल, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ में कांग्रेस जमीन पर जरूर बची हुई है लेकिन बची खुची कांग्रेस मोदी से लड़ने की बजाय आपस में लड़ने से फुर्सत नहीं पा रही है।

गुजरात में तो हालात ऐसे हैं कि सिर्फ मार्जिन की लड़ाई चल रही है। लोग यह चर्चा कर रहे हैं कि इस बार कांग्रेस कितने बड़े अंतर से हारती है। इसी तरह पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और पूर्वोत्तर से भी कांग्रेस का लगभग सफाया ही हो चुका है। अगर दो चार सीटें वो जीत भी जाते हैं तो इसे उनकी मेहनत की बजाय उनका भाग्य या दूसरे दलों के चुनावी गणित का गड़बड़ाना ही कहा जाएगा।

हां दक्षिण में जरूर कांग्रेस ने अपनी खोई जमीन वापस पायी है और आज भी बीजेपी के लिए दक्षिण द्वार अभेद्य बना हुआ है। अविभाजित आंध्र प्रदेश से राजशेखर रेड्डी ने कांग्रेस की जो वापसी करवाई तो आज तेलंगाना और कर्नाटक में वह सरकार में है। कांग्रेस कैडर आधारित पार्टी नहीं है। वह लीडर आधारित पार्टी है। इसलिए राजशेखर रेड्डी हों, डीके शिवकुमार हों या फिर रेवंत रेड्डी। जैसे ही उनके खेमे में कोई करिश्माई नेता उभरता है कांग्रेस सत्ता में वापसी कर लेती है।

फिर भी कांग्रेस का दुर्भाग्य यह है कि इंदिरा, संजय और राजीव गांधी की मौतों के बाद से ही केन्द्रीय स्तर पर उसके पास करिश्माई नेता का अभाव रहा है। राहुल गांधी या प्रियंका गांधी में कोई ऐसा करिश्मा नहीं है कि वह भारत के लोगों को पसंद आने लगें। दोनों ही पचास साल की उम्र में उस राजपरिवार के बच्चे की तरह व्यवहार करते हैं जो अपने राजवंश के बारे में तो बहुत कुछ जानता है लेकिन उस राज्य के बारे में कुछ खास नहीं जानता जहां उनका शासन रहा है।

इसके बावजूद अगर इस चुनाव में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के बयान चर्चा में आ रहे हैं, तो इसका मतलब है कि खोटे सिक्के भी बाजार में चलने के लिए इसलिए तैयार हैं कि खरे सिक्के की खनक खाना खराब कर रही है। यूपी, बिहार और गुजरात को छोड़ दें तो उत्तर भारत के लगभग सभी राज्यों में कांग्रेस 2019 से बेहतर प्रदर्शन करती दिखाई दे रही है। कर्नाटक, तेलंगाना, तमिलनाडु और केरल में वो पहले से ही मजबूत स्थिति में हैं।

इसलिए तमाम आंतरिक कमियों और कमजोरियों के बावजूद अगर कांग्रेस इस बार नेता विपक्ष का पद पाने लायक सीटें जीत जाती है यह न केवल स्वस्थ लोकतंत्र के लिए बल्कि खुद नरेन्द्र मोदी और भाजपा के लिए भी एक शुभ समाचार ही कहा जाएगा। संभवत: यही कारण है कि खुद नरेन्द्र मोदी अपने 10 साल की सरकार की उपलब्धियां गिनाने के बजाय कांग्रेस की कमियां गिना रहे हैं जो दस साल से नेता विपक्ष का पद पाने लायक भी नहीं थी।

सैम पित्रोदा के एक पिद्दी से बयान को लेकर जिस तरह पीएम मोदी सहित पूरी भाजपा ने मुद्दा बनाने की कोशिश की, उससे यह संकेत मिलता है कि मोदी या भाजपा को अपनी जीत के लिए कांग्रेस का मौजूद होना कितना जरूरी लग रहा है। जबकि सैम पित्रोदा न तो देश में कांग्रेस के नेता हैं और न ही वो यहां की राजनीति करते हैं। वो अमेरिका में रहते हैं और वहीं ओवरसीज कांग्रेस का काम देखते हैं। लेकिन उनके बयान को आधे अधूरे तरीके से मुद्दा बनाने की कोशिश की गई ताकि भाजपा अपनी उपलब्धियों के बजाय कांग्रेस की कमजोरियों को उभारकर जीत का रास्ता साफ कर सके।

यह भी कम आश्चर्य की बात नहीं है कि लोकसभा में 303 सीटों पर बैठी पार्टी 52 सीट जीतने वाली पार्टी से भयभीत नजर आ रही है। उसके सत्ता में लौटने का डर दिखा रही है। असल में यह डर कांग्रेस का नहीं बल्कि खुद भाजपा का है जिसके नेताओं को लगने लगा है कि अगर कांग्रेस ही खत्म हो गयी तो हम किसके कुशासन को दुश्मन ठरायेंगे? इंदौर में अति उत्साह में भाजपा वालों ने कांग्रेस प्रत्याशी को चुनावी मैदान से हटाकर अपनी पार्टी में तो मिला लिया लेकिन अब उन्हें नोटा का भय सता रहा है। क्योंकि अगर लोकतंत्र में विपक्ष कमजोर होगा तो नोटा सबसे बड़ा विपक्ष बनकर उभरेगा जो किसी भी सत्ताधारी दल के लिए शर्म से डूब मरनेवाली बात होगी।

फिलहाल कमजोर कांग्रेस का नुकसान इस बार बीजेपी को साफ नजर आ रहा है। तीन चरण का चुनाव हो चुका है और चुनावी रंगत अभी तक नहीं आ पायी है। केवल कांग्रेस ही नहीं बल्कि भाजपा के समर्थक भी चुनाव को लेकर उदासीन हो गये हैं। इसका कांग्रेस से अधिक नुकसान अगर किसी को होगा तो भाजपा को ही होगा।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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