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Legislature vs Judiciary: लोकतंत्र को बचाने हेतु विधायिका की सर्वोच्चता फिर कायम करनी होगी

निर्वाचित सदनों पर न्यायपालिका के हावी होने की जड़ में जाते हुए उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने कहा कि यह 1973 में सुप्रीमकोर्ट के केशवानंद भारती केस में फैसले से शुरू हुआ था।

Legislature vs Judiciary supremacy of the legislature to save democracy

Legislature vs Judiciary: जब राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ ने कहा कि वह पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन में जाएंगे, तो लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला कुछ हैरान और परेशान जरुर हुए होंगे| लेकिन उनके पास इसे स्वीकार करने और चुप्पी साध लेने के सिवा कोई चारा नहीं था| जबसे पीठासीन अधिकारियों का सम्मेलन होना शुरू हुआ है, राज्यसभा के सभापति कभी भी उसमें शामिल नहीं हुए| हमेशा लोकसभा स्पीकर ही पीठासीन अधिकारियों यानि विधानसभाओं के स्पीकरों के सम्मेलन का उद्घाटन करते रहे हैं| अगर राज्यसभा के सभापति सम्मेलन में हिस्सा लेंगे, तो स्वाभाविक है कि प्रोटोकाल में राष्ट्रपति के बाद दूसरे नंबर पर होने के कारण उद्घाटन भी वही करेंगे| पीठासीन अधिकारियों का सम्मेलन संवैधानिक फोरम नहीं है, इसलिए राज्यसभा के सभापति सम्मेलन में हिस्सा नहीं लेते|

Legislature vs Judiciary supremacy of the legislature to save democracy

दूसरा कारण यह है कि वह निर्वाचित सभापति नहीं हैं, वह उपराष्ट्रपति होने के कारण राज्यसभा के सभापति हैं| इस कारण लोकसभा सचिवालय भी हैरान था, और राज्यसभा सचिवालय भी| यह समस्या आगे भी खड़ी हो सकती है। यदि वह पीठासीन अधिकारियों के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में जाने की इच्छा व्यक्त करेंगे, तो विदेश जाने वाले प्रतिनिधिमंडल की अध्यक्षता भी वही करेंगे और लोकसभा स्पीकर डेलिगेशन के सिर्फ सदस्य होंगे| लेकिन किसी को यह नहीं पता था कि जगदीप धनखड़ ने राजस्थान में होने वाले पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन में जाकर उद्घाटन भाषण देने की बात क्यों की थी|

इसकी दो मुख्य वजहें थीं, जो सम्मेलन में उनके भाषण से जाहिर हो गईं| पहला, अपने गृह राज्य में जाटों को संदेश देना, और दूसरा सुप्रीमकोर्ट को यह बताना कि विधायिका सर्वोच्च है और विधायिका की वह गरिमा वापस दिलाने का काम शुरू हो चुका है| अपने 37 मिनट के भाषण में जगदीप धनखड़ ने करीब आधा समय सुप्रीमकोर्ट को कड़ा संदेश देने में लगाया|

आपको याद होगा कि जब उन्होंने कोलिजियम की आलोचना करते हुए उसे संविधान की भावना के खिलाफ बताया था तो 8 दिसंबर को सुप्रीमकोर्ट के जस्टिस संजय किशन कौल, विक्रम नाथ और अभय एस ओका की पीठ ने भारत के अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी से "उन्हें सलाह" देने को कहा था कि वह जुबान संभाल कर बोलें| हालांकि जजों ने इस भाषा का इस्तेमाल नहीं किया था, लेकिन उनके कहने का मतलब यही था|

अटार्नी जनरल ने निश्चित ही उपराष्ट्रपति के सामने जाकर इन जजों की बात नहीं कही होगी| क्योंकि प्रोटोकाल के मुताबिक़ वह सीधे उपराष्ट्रपति को कोई संदेश नहीं दे सकते| उपराष्ट्रपति सरकार का हिस्सा नहीं होता| लेकिन जजों ने जो बात कहनी थी वह सुप्रीमकोर्ट के मंच से मीडिया के माध्यम से कह दी थी| मुझे तब से ही अंदेशा था कि वक्त आने पर जगदीप धनखड़ इसका कड़ा जवाब देंगे| हालांकि जजों के कथन का सही जवाब तो विधायिका को देना है, क्योंकि 2015 में संसद और सोलह विधानसभाओं से सर्वसम्मति से पारित राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग को सुप्रीमकोर्ट ने ठुकरा दिया था|

उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने कोलिजियम सिस्टम की आलोचना करते हुए संसद के सर्वोच्च होने का ही मुद्दा उठाया था| लेकिन जगदीप धनखड़ ने पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन का सुप्रीमकोर्ट को जवाब देने के लिए इस्तेमाल किया| यह उचित फोरम था, क्योंकि लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों के मंच विधानसभाएं और संसद सर्वोच्च हो सकती हैं, सुप्रीमकोर्ट नहीं| जबकि सुप्रीमकोर्ट ने अपने कई फैसलों से संसद के बनाए कानूनों को रद्द करके खुद को सर्वोच्च बना लिया है, इस पर संसद ने कभी कोई एतराज नहीं किया|

जगदीप धनखड़ ने जिस दिन कोलेजियम सिस्टम की आलोचना की थी, उस दिन भी उन्होंने यही कहा था कि जब सुप्रीमकोर्ट ने संसद में सर्वसम्मति से पारित क़ानून को रद्द किया था, उस समय संसद में इस पर चर्चा होनी चाहिए थी कि सुप्रीम कोर्ट ऐसा कैसे कर सकता है| यही सवाल उन्होंने पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन में उठाया है, क्योंकि यह विधानसभाओं और संसद की सर्वोच्चता का सवाल है|

इतना ही नहीं अदालतें अब पीठासीन अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र में भी दखल देने लगी हैं| दलबदल क़ानून में दलबदल वाले मामलों में फैसले का अधिकार स्पीकरों को दिया गया है| लेकिन राजस्थान के मामले में ही राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पीकर सी.पी. जोशी को फैसला लेने से रोक दिया था| जयपुर में हुए पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन में वह उपराष्ट्रपति की बगल में ही बैठे थे|

निर्वाचित सदनों पर न्यायपालिका के हावी होने की जड़ में जाते हुए जगदीप धनखड़ ने कहा कि यह 1973 में सुप्रीमकोर्ट के एक फैसले से शुरू हुआ था| वह चर्चित फैसला केशवानंद भारती केस में था जिसमें सुप्रीमकोर्ट ने कहा था कि संसद को संविधान के बेसिक स्ट्रक्चर को बदलने का अधिकार नहीं है| उस दिन से विधायिका की शक्ति क्षीण होना शुरू हुई, जोकि एक गलत फैसला था और एक गलत परंपरा शुरू हो गई|

न्यायपालिका के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए राज्यसभा के सभापति ने कहा कि संविधान में क़ानून बनाने का अधिकार संसद और विधानसभाओं को दिया गया है| क्या संसद यह इजाजत दे सकती है कि वह सुप्रीमकोर्ट के अधीन होगी, ऐसा नहीं हो सकता| इस मंच के माध्यम से जगदीप धनखड़ ने यह मूल सवाल उठाया है कि सुप्रीमकोर्ट संसद की सर्वोच्चता को कैसे भंग कर सकती है|

उनका यह संदेश राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और विपक्ष के साथ साथ विधानसभाओं को भी है, क्योंकि न्यायिक नियुक्ति आयोग बनाने के फैसले में उन सब की भी भूमिका थी| सुप्रीमकोर्ट ने सभी राजनीतिक दलों और लोकतंत्र को चुनौती दी है, उपराष्ट्रपति ने उस चुनौती को स्वीकार करने और लोकतंत्र को पुन:स्थापित करने पर जोर दिया है| उन्होंने कहा कि लोकतंत्र तभी फले-फूलेगा जब विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका मिलकर काम करें| कोई किसी के अधिकार क्षेत्र में दखल न दे, जैसे विधायिका अदालत के फैसले नहीं लिख सकती, उसी तरह अदालत क़ानून नहीं बना सकती|

उनका कहने का मतलब था कि अदालत अपने फैसले को क़ानून नहीं कह सकती, जैसा कि वह कोलिजियम प्रणाली को "ला आफ दि लैंड" कह रही है, या अन्य फैसलों में कह देती है| अदालत को क़ानून में संशोधन की सलाह देने का हक है, लेकिन क़ानून बनाने का हक नही है| उन्होंने कहा कि अगर कुछ समस्या हो तो आपसी विचार विमर्श हो सकता है लेकिन सुप्रीमकोर्ट जैसे मंच का इस्तेमाल करके अटार्नी जनरल से कहा गया कि वह उच्च सवैधानिक पदाधिकारी को सलाह दें|

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    उपराष्ट्रपति Jagdeep Dhankhar ने Judiciary को कैसे कड़े शब्द कहे ? | Supreme Court | वनइंडिया हिंदी

    उपराष्ट्रपति ने पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन का इस्तेमाल करते हुए न्यायपालिका को कड़ा संदेश दिया है कि वह विधायिका की शक्तियां कम नहीं होने देंगे| वह जिस पद पर हैं उस पद का सम्मान भी कम नहीं होने देंगे| उन्होंने इस मंच के माध्यम से न्यायपालिका को स्पष्ट संदेश दिया कि सभी को अपनी मर्यादा, स्वाभिमान और संविधान के प्रति प्रतिबद्धता की गहरी भावना तक ही सीमित रहना होगा, सार्वजनिक मंचों के माध्यम से संवाद करना ठीक नही है|

    यह भी पढ़ें: भारतीय संविधान का Basic structure क्या है ? उपराष्ट्रपति जगदीप धनकड़ की टिप्पणी से हो रही है चर्चा

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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