भारतीय संविधान का Basic structure क्या है ? उपराष्ट्रपति जगदीप धनकड़ की टिप्पणी से हो रही है चर्चा
उपराष्ट्रपति जगदीप धनकड़ के बयान के बाद विधायिका और न्यायपालिका के बीच विवाद सामने आ गया है। उन्होंने संविधान के मूल ढांचे वाली बात पर आपत्ति जताई है,जिसका सिद्धांत संविधान ने नहीं SC ने दिया है।

उपराष्ट्रपति जगदीप धनकड़ की वजह से एक बार फिर से न्यायपालिक, विधायिका और कार्यपालिका के क्षेत्राधिकारों को लेकर बहस हो रही है। पिछले कुछ वर्षों से न्यायपालिका अत्यधिक सक्रिय हुई है और इसकी वजह से कार्यपालिका और विधायिका के साथ टकराव की स्थिति भी पैदा हुई है। ताजा मतभेद न्यायिक नियुक्तियों को लेकर चल रहा है। जहां सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम सिस्टम को लेकर अड़ा हुआ है, वहीं सरकार इसकी पारदर्शिता को लेकर लगातार प्रश्नचिन्ह खड़े कर रही है। इसकी वजह से संविधान के मूल ढांचे का मुद्दा गर्मा गया है, जो न्यायपालिका के पास एक ऐसे हथियार की तरह है, जहां विधायिका की सारी 'सर्वोच्चता' सीमित हो जा रही है।
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संविधान की मूल संरचना वाले सिद्धांत की उपराष्ट्रपति ने की आलोचना
उपराष्ट्रपति जगदीप धनकड़ ने बुधवार को भारतीय लोकतंत्र के तीनों अंगों विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों के विभाजन का विषय उठाकर नए सिरे से एक बहस की शुरुआत कर दी है। उन्होंने संसद द्वारा संविधान संशोधन करके बनाए गए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम (NJAC Act) को संविधान की मूल संरचना (Basic structure) के सिद्धांत के खिलाफ होने के नाम पर रद्द करने के लिए सुप्रीम कोर्ट की आलोचना की है। इससे पहले 7 दिसंबर को उन्होंने राज्यसभा में सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को संसदीय संप्रभुता से 'गंभीर समझौता' और 'जनादेश' का अनादर बताया था। सवाल है कि संविधान की कौन सी ऐसी मूल संरचना है और इससे विधायिका की शक्तियां कैसे प्रभावित हो रही हैं?

संविधान के बुनियादी ढांचे (Basic structure) वाला सिद्धांत किया है ?
बुनियादी ढांचे का सिद्धांत मूल संविधान से नहीं, बल्कि न्यायिक समीक्षा से सामने आया है। इस सिद्धांत का इस्तेमाल सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार 1973 के केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य के ऐतिहासिक फैसले में किया था। सुप्रीम कोर्ट की 13 जजों की संविधान पीठ ने 7-6 से फैसला सुनाया था कि संविधान की 'मूल संरचना' को संसद द्वारा संशोधित नहीं किया जा सकता है। इस सिद्धांत के तहत यह तय किया गया है कि अगर न्यायपालिका को लगता है कि संसद से पारित या संशोधित कोई कानून 'संविधान के बुनियादी ढांचे' को 'नुकसान या तबाह' कर सकता है तो अदालत उसे असंवैधानिक करार दे सकती है।

बुनियादी ढांचे वाला सिद्धांत कैसे विकसित हुआ ?
केशवानंद भारती केस तत्कालीन कार्यपालिका और न्यायपालिक के बीच टकराव की एक श्रृंखला में से एक था। कार्यपालिका की अगुवाई पूर्व पीएम इंदिरा गांधी कर रही थीं। भूमि सुधार, बैंकों के राष्ट्रीयकरण, प्रिवी पर्स खत्म करने के मामले में कई बार टकराहट की स्थिति पैदा हुई। तब संसद में संविधान के किसी भी हिस्से को बदलने का अधिकार विधायिका को देने के लिए एक संविधान संशोधन लाया; और एक कानून पारित किया कि अदालतें उसकी समीक्षा भी नहीं कर सकतीं। तब सुप्रीम कोर्ट ने संविधान संशोधन के लिए संसद की शक्तियों का परीक्षण किया और भूमि सुधार की वैधानिकता की जांच की। 13 जजों की बेंच ने बहुमत से फैसला दिया कि संविधान के संशोधन के लिए संसद के पास विशाल शक्तियां हैं, लेकिन यह इसके 'बुनियादी ढांचे' को नहीं बदल सकता।

भारतीय संविधान की मूल संरचनाएं क्या हैं?
केशवानंद भारती केस में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के कई पहलुओं का जिक्र किया, जिससे 'मूल संरचनाओं' की पहचान हो सकती है, लेकिन इसकी कोई विशेष लिस्ट नहीं बताई। वैसे माना जाता है कि न्यायिक समीक्षा, कानून का शासन, लोकतांत्रिक गणराज्य और संघवाद की बुनियादी ढांचे के रूप में पहचान हुई है। इस तरह से इस सिद्धांत के माध्यम से न्यायपालिका की शक्तियों का दायरा बढ़ जाता है। 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान की मूल संरचना के खिलाफ बताते हुए ही राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम को खारिज कर दिया था। जबकि, संसद ने इस संविधान संशोधन को भारी बहुमत (सिर्फ एक सदस्य अनुपस्थित रहा) पारित किया था। यही वजह है कि धनकड़ ने इसे संसद की संप्रभुता को न्यायपालिका द्वारा कम किए जाने की बात कहकर इसकी आलोचना की है।

संविधान की मूल संरचना के सिद्धांत की आलोचना क्यों होती है ?
दरअसल, संविधान में मूल संरचना जैसे कोई शब्द नहीं हैं और इसका सिद्धांत सुप्रीम कोर्ट ने ही न्यायिक समीक्षा के माध्यम से दिया है। यही वजह है कि इसपर उंगलियां उठती रही हैं। आरोप लगते हैं कि न्यायपालिका अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर विधायिका के दायरे में दखल दे रही है। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक इस सिद्धांत के आलोचकों में से एक वरिष्ठ वकील राजू रामचंद्रण कहते हैं, कि एक 'अनिर्वाचित जज' की संविधान संशोधन को इस सिद्धांत के आधार पर रद्द करने की शक्ति 'अलोकतांत्रिक और बहुमत-विरोधी है।'
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