Judiciary vs Society: समाज और संविधान के बीच टकराव है चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ का बयान
संविधान और कानून के दायरे में रहकर चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ भारत की जिस परंपरागत विवाह व्यवस्था पर नैतिकता के बहाने सवाल उठा रहे हैं, एक सामान्य भारतीय के लिए वही श्रेष्ठ है।

Judiciary vs Society: बीते शनिवार को मुंबई के एक कार्यक्रम में बोलते हुए सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने सामाजिक व्यवस्था पर एक गंभीर टिप्पणी की। उन्होंने सामाजिक व्यवस्थाओं और कानून के बीच होने वाले टकराव की ओर इशारा करते हुए कहा कि देश में सैकड़ों युवाओं की हर साल हत्या हो जाती है। वह भी सिर्फ इसलिए क्योंकि वो अपनी जाति या धर्म के बाहर शादी कर लेते हैं। उनका कहना था कि यह सब नैतिकता के नाम पर किया जाता है।
चीफ जस्टिस का इशारा कथित ऑनर किलिंग की ओर है कि समाज में आज भी अंतर्जातीय या अंतर्धामिक विवाहों की स्वीकार्यता नहीं है। ऐसा ही समाज या धर्म हत्या कर देता है। इसके लिए उन्होंने उत्तर प्रदेश में 1991 में घटित एक घटना का उल्लेख किया जिसमें ग्रामीणों ने स्वीकार किया कि हां, उन्होंने विवाह के लिए समाज के खिलाफ जाने वाले की हत्या की है। न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने एक और टिप्पणी की कि "ऐसी नैतिकता वो समूह तय करते हैं जो कमजोर लोगों पर हावी होते हैं।''
चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ संभवत: भारत की सामाजिक व्यवस्थाओं के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करना चाहते। उनके द्वारा समाज व्यवस्था को अस्वीकार कर देना, या फिर उस पर सवाल उठा देना इतना असहज करनेवाला भी नहीं है। वो जिस शासन प्रणाली के तहत देश के चीफ जस्टिस बने हैं वह शासन प्रणाली भी समाज के अस्तित्व को कहां स्वीकार करती है? भारत का संविधान न तो समाज के अस्तित्व को स्वीकार करता है और न ही समाज के आधार परिवार के अस्तित्व को।
अत: भारतीय संवैधानिक व्यवस्था के तहत जो भी विचार करेगा, उसे भारतीय समाज व्यवस्था में वैसा ही दोष नजर आयेगा जैसा चीफ जस्टिस को नजर आ रहा है। भारत का संविधान अंतर्जातीय विवाह, अंतर्धामिक विवाह को प्रोत्साहित करता है। इसके लिए स्पेशल मैरिज एक्ट का प्रावधान करता है। संविधान निर्माता संभवत: ऐसा समझते थे कि एक राष्ट्र राज्य और उसके नागरिक के बीच में कोई दूसरी सामाजिक या पारिवारिक व्यवस्था नहीं आनी चाहिए। आज भी समान नागरिक संहिता की मांग के मूल में यही भावना है।
संविधान सभा में जब परिवार और समाज के मुद्दों पर बहस होती थी तो साफ तौर पर यह बात कही जाती थी कि व्यक्ति और राज्य के बीच में किसी तीसरी व्यवस्था को कानूनी रूप से मान्य नहीं किया जा सकता। परिवार को व्यक्ति की स्वतंत्रता की राह में बाधा माना गया जबकि समाज को वर्णभेद और जातिभेद पैदा करनेवाला बताया गया। स्वाभाविक था जिस परिवार और समाज को व्यक्ति के विकास में बाधक मानकर भारत का संविधान बनाया गया उस संविधान को मानने वाला सिस्टम परिवार और समाज की व्यवस्थाओं को कैसे स्वीकार करेगा?
इसलिए समस्या चंद्रचूड के बयान में नहीं है। समस्या वहां है जिसे भारत का संविधान कहा जाता है। यह एक ऐसी गंभीर समस्या है जिसका असर भारतीय समाज पर दिख रहा है। जैसे एक ओर चंद्रचूड़ 1991 में ऑनर किलिंग की किसी घटना के जरिए व्यक्ति की स्वतंत्रता को महत्व दे रहे हैं तो दूसरी ओर ठीक इसी समय में श्रद्धा वॉकर और रिबिका पहाड़ी की दिल दहलाने वाली हत्याएं सामने आयी हैं। श्रद्धा वॉकर ने भारतीय संविधान में प्रदत्त शक्तियों का इस्तेमाल करके लिव इन में रहने का फैसला किया था। वो एक अंतर्धार्मिक प्रेम संबंध में थीं। उन्होंने परिवार के अस्तित्व को स्वीकार नहीं किया। लेकिन श्रद्धा के साथ क्या हुआ? क्या संविधान या कानून श्रद्धा वॉलकर की हत्या होने से रोक पाया?
इसी तरह झारखण्ड के साहेबगंज में अभी चंद दिन पहले रिबिका पहाड़ी को उसके एक प्रेमी ने टुकडे टुकड़े में काटकर फेंक दिया। रिबिका भी अंतर्धामिक प्रेम संबंध में थी और संविधान द्वारा प्रदत्त नागरिक अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए परिवार, समाज और धर्म की सीमा लांघकर एक मुस्लिम से निकाह कर लिया था। लेकिन उसी मुस्लिम ने उसके टुकड़े टुकड़े कर कुत्तों को खाने के लिए गाड़ दिया था।
श्रद्धा वॉकर और रिबिका पहाड़ी के मामले में परिवार और समाज दोनों नदारद हैं। एक तरह से इन लड़कियों ने परिवार और समाज दोनों की परवाह नहीं की। उन्होंने संविधान प्रदत्त अपने नागरिक अधिकारों का इस्तेमाल किया। लेकिन संविधान या संवैधानिक व्यवस्थाएं इन दोनों को जीवित रहने के मौलिक अधिकार की गारंटी' भी नहीं दे पायीं।
जस्टिस चंद्रचूड़ या फिर समाज की आलोचना करने वाले लोग कह सकते हैं कि संवैधानिक व्यवस्थाओं की अपनी सीमा है। वह समाज की तरह कभी काम कर ही नहीं सकता। तो फिर सवाल उठता है कि संवैधानिक व्यवस्थाएं समाज के अस्तित्व को नकारती क्यों हैं?
हमारी रोजमर्रा की जिन्दगी सामाजिक है। समाज की नैतिकता और परिवार की जिम्मेदारी किसी भी संवैधानिक व्यवस्था पर भारी है। भारत में रहकर क्या हम परिवार और समाज से इतर जाकर पूरी तरह से पुलिस और प्रशासन के जरिए अपना जीवन जी सकते हैं? भारत की बनावट और बसावट में यह असंभव है। भारत की सरकारी व्यवस्था के बारे में आम भारतीयों की धारणा वैसे भी कोई अच्छी नहीं है। चंद्रचूड़ जिस कोर्ट सिस्टम वाली न्याय प्रणाली का भरोसा नागरिकों को दिलाना चाहते हैं, उसके बारे में आम नागरिक की धारणा ये है कि पुलिस, कोर्ट कचहरी और अस्पताल ये तीन जगहें ऐसी हैं जिससे हमेशा बचकर रहना चाहिए। जो इनके चक्कर में पड़ता है, बर्बाद हो जाता है।
आजादी के 75 साल बाद भी पुलिस, प्रशासन और कचहरी सिस्टम के प्रति आम नागरिक का विश्वास बन नहीं पाया है। एक सामान्य नागरिक इनके फेर में फंसने से बचता है। वो अपनी पारिवारिक और सामाजिक व्यवस्थाओं में ज्यादा बेहतर न्याय और सुरक्षा प्राप्त कर लेता है। वो जस्टिस चंद्रचूड़ भी चीफ जस्टिस की कुर्सी पर रहने या हटने के बाद संभवत: अपने उसी परिवार में अधिक नागरिक सुरक्षा प्राप्त करेंगे या प्रदान करेंगे, जिसे चीफ जस्टिस की कुर्सी पर बैठकर स्वीकार भी नहीं कर सकते। यही भारत की पारिवारिक और सामाजिक व्यवस्था का महत्व है।
भारत एक राष्ट्र रहा है तो उसका आधार राज्य या प्रशासन नहीं था। उसका आधार था समाज। भारत एक सामाजिक राष्ट्र रहा है जहां की व्यवस्थाएं समाज आधारित थीं। इस समाज का आधार परिवार था और उस परिवार के गठन का आधार विवाह होता था। बहुत सारे हस्तक्षेप के बाद आज भी एक सामान्य भारतीय विवाह को सामाजिक व्यवस्था के रूप में देखता है। हमारी परंपरागत समझ में विवाह दो व्यक्तियों का संबंध तो है लेकिन उससे एक नये परिवार का गठन भी होता है। विवाह से ही परिवार बनता है और परिवार से ही समाज का निर्माण होता है।
इसलिए भारत का सामान्य व्यक्ति विवाह को लेकर बहुत संवेदनशील होता है। वह जानता है कि विवाह ही समाज का आधार है और अंतत: समाज में ही उसे रहना है। इसलिए वह विवाह में सामाजिक मर्यादाओं के उल्लंघन पर बहुत कठोरता से इसका विरोध करता है। भारत का संविधान, कानून, शासन प्रशासन इनको स्वीकार नहीं करता। तो फिर दोष किसका है? संविधान और शासन का या फिर समाज का? संविधान में समाज को समाहित करने की बजाय हम समाज के अस्तित्व को ही नकारकर भला क्या हासिल कर लेंगे?
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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