Jharkhand: मोदी सरकार इस कलंक से बाल बाल बची
Jharkhand: हेमंत सोरेन ने 31 जनवरी को शाम आठ बजे झारखंड के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था| उनके साथ गठबंधन के नए नेता चंपई सोरेन भी गए थे, जिन्होंने 43 विधायकों के समर्थन की चिठ्ठी सौंपते हुए सरकार बनाने का दावा पेश किया|
राज्यपाल सीपी राधाकृष्णन ने हेमंत सोरेन का इस्तीफा तो मंजूर कर लिया, लेकिन चंपई सोरेन को 28 घंटे बाद सरकार बनाने का न्योता दिया और 40 घंटे बाद उनकी शपथ हुई|

चालीस घंटे पहले चंपई सोरेन ने राजभवन से बाहर निकलते हुए कहा था कि हेमंत सोरेन ने इस्तीफा दे दिया है, और हमने सरकार बनाने के लिए 43 विधायकों के हस्ताक्षर वाला पत्र सौंप दिया है| उन्होंने यह भी बताया था कि उन्हें 47 विधायकों का समर्थन है, लेकिन चार विधायक अभी अस्पताल में हैं|
जिस तरह बिहार के राज्यपाल राजेन्द्र विश्वनाथ अर्लेकर ने नीतीश कुमार के दावे की चिठ्ठी मिलते ही उन्हें सरकार बनाने का न्योता दे दिया था, उसी तरह झारखंड के राज्यपाल सीपी राधाकृष्णन को भी करना चाहिए था| जबकि सीपी राधाकृष्णन ने चंपई सोरेन को तुरंत न्योता नहीं दिया| राज्यपाल ने अगली व्यवस्था तक हेमंत सोरेन को पद पर बने रहने को भी नहीं कहा था क्योंकि उन्हें पता था कि उन्हें राजभवन से बाहर निकलते ही तुरंत गिरफ्तार कर लिया जाना है|

जब राज्यपाल ने चंपई सोरेन को न्योता नहीं दिया तो उन सभी 43 विधायकों ने राज्यपाल से मिलने की इच्छा जाहिर की, लेकिन राज्यपाल ने उन्हें इजाजत नहीं दी तो उन सभी ने राज भवन के सामने जाकर परेड भी की| तब राज्यपाल ने चंपई सोरेन को शाम साढ़े पांच बजे पांच विधायकों के साथ मिलने को बुलाया, लेकिन इस मुलाक़ात में भी राज्यपाल ने उन्हें सरकार बनाने का न्योता नहीं दिया|
इसी बीच झारखंड के भाजपा सांसद निशीकांत दूबे ने कहा कि झारखंड मुक्ति मोर्चा के 18 विधायक चंपई सोरेन को मुख्यमंत्री बनाने के पक्ष में नहीं है, इसलिए राज्यपाल को अनुच्छेद 355 के तहत कार्रवाई करते हुए राष्ट्रपति राज की सिफारिश करनी चाहिए|
यह बात सही है कि हेमंत सोरेन की भाभी सीता सोरेन ने हेमंत सोरेन की पत्नी कल्पना सोरेन के नाम पर आपत्ति जताई थी, लेकिन उन्होंने यह भी कहा था कि या तो उन्हें मुख्यमंत्री बनाया जाए, या किसी वरिष्ठ नेता को मुख्यमंत्री बनाया जाए| चंपई सोरेन झारखंड मुक्ति मोर्चे से संस्थापक सदस्यों में से हैं और 5 बार के विधायक हैं, इसलिए उनके नाम पर किसी के एतराज की संभावना कम ही थी|
निशीकांत दूबे भाजपा नेतृत्व के काफी करीब माने जाते हैं| इसलिए उनके बयान ने झारखंड में राजनीतिक अस्थिरता की आशंका पैदा कर दी| झारखंड मुक्ति मोर्चे और कांग्रेस को आशंका हुई कि कहीं महाराष्ट्र की तरह झारखंड में तो दलबदल नहीं होने वाला है|
हेमंत सोरेन की तरह महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे ने दबाव में आकर मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था और भाजपा ने शिवसेना के बागी विधायकों से मिलकर एकनाथ शिंदे की सरकार बना ली थी| हेमंत सोरेन ने ईडी के दबाव में आकर इस्तीफा दे दिया था, लेकिन विधायकों का बहुमत झारखंड मुक्ति मोर्चा, कांग्रेस और राजद के पास था।
इसके बावजूद नए नेता चंपई सोरेन को न्योता नहीं दिया जाना कई तरह की आशंका पैदा कर रहा था| खरीद फरोख्त से दलबदल करवाने की आशंका को देखते हुए गठबंधन को अपने विधायकों को कांग्रेस शासित तेलंगाना ले जाने का फैसला करना पड़ा। वह तो गनीमत है कि मौसम खराब होने के कारण फ्लाईट नहीं उड़ी और कुछ देर बाद ही राज्यपाल ने चंपई सोरेन को बुलाकर सरकार बनाने का न्योता दे दिया|
अगर विधायक हैदराबाद चले गए होते तो राज्यपाल की नहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फजीहत होती| क्योंकि माना यही जाता है कि राज्यपाल जो कुछ भी करते हैं, उसके पीछे केंद्र सरकार की मंशा होती है| महाराष्ट्र में जब राज्यपाल भगत सिंह कोशियारी ने उद्धव ठाकरे को बहुमत साबित करने के लिए कहा था, तो इसे केंद्र सरकार के इशारे पर लिया गया फैसला ही माना गया था|
इसमें कोई शक नहीं कि केंद्र सरकार राज्यपालों का दुरूपयोग करके विपक्षी दलों की राज्य सरकारें गिराती रही हैं, लेकिन कई बार केंद्र सरकार को मुंह की भी खानी पड़ी है| पुराने तो कई उदाहरण हैं, जैसे 1982 में चौधरी देवी लाल को हरियाणा में सरकार बनाने का न्योता देने के बावजूद राज्यपाल गनपत राव देवजी ने इंदिरा गांधी के इशारे पर भजन लाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी थी। इससे नाराज देवीलाल लोकदल और भाजपा के विधायक लेकर राजभवन पहुंचे और राज्यपाल से बातचीत के दौरान देवीलाल ने उन्हें थप्पड़ मार दिया था|
इसी तरह की एक घटना आंध्र प्रदेश की है, जब अगस्त 1984 में तेलुगू देशम के मुख्यमंत्री एन.टी. रामाराव अपने हार्ट का ऑपरेशन करवाने अमेरिका गए हुए थे, तो आंध्र प्रदेश के राज्यपाल राम लाल ठाकुर ने इंदिरा गांधी के इशारे पर उन्हें बर्खास्त करके उन्हीं की सरकार के वित्त मंत्री भास्कर राव को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी थी|
एन.टी. रामाराव ने भारत लौट कर इंदिरा गांधी की तानाशाही के विरोध में जोरदार आन्दोलन शुरू कर दिया, क्योंकि उनकी पार्टी में फूट के बावजूद बहुमत उनके पास था| विपक्षी दलों के सहयोग से यह आन्दोलन न केवल आंध्र प्रदेश बल्कि पूरे देश में फैल गया। रामाराव ने दिल्ली में पत्रकारों के सामने अपने समर्थक विधायकों की परेड करवा दी। आखिरकार इंदिरा गांधी को रामलाल को हटाकर शंकर दयाल शर्मा को राज्यपाल बनाना पड़ा जिन्होंने तुरंत एन.टी. रामाराव की दुबारा ताजपोशी करवा दी|
1998 में जब लोकतांत्रिक कांग्रेस ने यूपी की कल्याण सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया तो राज्यपाल रोमेश भंडारी ने कल्याण सिंह को बहुमत साबित करने के लिए समय देने के बजाए उन्हें बर्खास्त करके कांग्रेस के जगदम्बिका पाल को शपथ दिला दी थी| जगदम्बिका पाल दो ही दिन मुख्यमंत्री रह पाए, क्योंकि हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश विधानसभा में वोटिंग करवाने का आदेश दे दिया, जिसमें कल्याण सिंह भारी पड़े| इसके बाद राज्यपाल रोमेश भंडारी को इस्तीफा देना पड़ा|
2005 में जब बिहार के राज्यपाल बूटा सिंह ने जेडीयू और भाजपा के पास 115 विधायक होने के बावजूद एनडीए सरकार नहीं बनने दी थी, और विधानसभा भंग कर दी थी तो सुप्रीमकोर्ट ने उन्हें फटकार लगाई थी| क्योंकि बहुमत का फैसला विधानसभा में ही हो सकता है, राजभवन में नहीं| 2016 में जब उत्तराखंड के राज्यपाल ने हरीश रावत सरकार को बर्खास्त कर दिया था, तो सुप्रीमकोर्ट ने राज्यपाल के फैसले को पलट दिया था|
मोदी सरकार के तीन राज्यपाल अभी भी विपक्ष की राज्य सरकारों के साथ टकराव के चलते बहुत ही विवादास्पद हैं| तमिलनाडू के राज्यपाल एन. रवि, केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान और पंजाब के राज्यपाल बनवारी लाल पुरोहित| इन तीनों राज्यपालों को अभी हाल ही में सुप्रीमकोर्ट ने इस बात के लिए फटकार लगाई है कि उन्होंने विधानसभा से पारित विधेयकों को लंबे समय से दबा कर रखा हुआ था|
इससे पहले पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से रोज रोज की खिटपिट के कारण विवादास्पद बने हुए थे| झारखंड की घटना अपने आप में अजीब घटना हुई है, जो संविधान की नजर में सही नहीं है, क्योंकि 40 घंटे तक न तो कोई सरकार थी, न राष्ट्रपति राज था| यह अच्छा हुआ कि राज्यपाल सीपी राधाकृष्णन ने 28 घंटे बाद ही सही यूपीए गठबंधन के चुने हुए नेता चंपई सोरेन को मुख्यमंत्री पद पर मनोनीत कर दिया, जिससे प्रधानमंत्री मोदी की साख बच गई|
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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