JDS in NDA: कांग्रेस की जातिवादी रणनीति के बीच कर्नाटक में लिंगायत वोक्कालिगा गठबंधन
वैसे तो लोकसभा चुनाव आते आते न जाने कितने मुद्दे आएंगे और जाएंगे। लेकिन चुनाव जीतने के लिए जातीय समीकरण शाश्वत मुद्दा है। जबसे कर्नाटक में ईसाई दलितों और मुस्लिमों के समीकरण ने कांग्रेस को सत्ता दिलाई है, तब से कांग्रेस ने यह स्वीकार कर लिया है कि चुनावों का सारा खेल जातीय समीकरणों का है। इसलिए उसने जातीय जनगणना को मुद्दा बना लिया है, जबकि कांग्रेस हमेशा से जातीय जनगणना के खिलाफ रही थी।
जबसे भाजपा ने उत्तर भारत में हिन्दुओं की सभी जातियों को हिंदुत्व की छतरी में लाने में सफलता हासिल की है, तबसे यूपी-बिहार में जाति आधारित दलों और कांग्रेस के बुरे दिन चल रहे हैं। इसलिए जाति आधारित दलों का एक ही एजेंडा है कि किसी तरह पिछड़ी जातियों को हिंदुत्व की छतरी से बाहर निकाला जाए। यह बात कर्नाटक में भाजपा को भी समझ आ गई है कि जातीय समीकरणों का ठीक होना ही चुनाव जीतने की कुंजी है।

कर्नाटक में कई बड़े लिंगायत नेताओं की नाराजगी का भाजपा को विधानसभा चुनावों में खामियाजा भुगतना पड़ा। कर्नाटक के वोक्कालिगा और अल्पसंख्यक वोटर जेडीएस और कांग्रेस में बंटते थे, इसलिए भाजपा का पलड़ा भारी हो जाता था। इस बार के चुनाव में मुसलमानों ने जेडीएस का साथ छोड़कर सिर्फ कांग्रेस को चुना। ईसाई तो मोटे तौर पर कांग्रेस के साथ थे ही, धर्मांतरण करके ईसाई बने दलितों ने भी कांग्रेस का साथ दिया, क्योंकि कांग्रेस उन्हें अनुसूचित जाति का आरक्षण देने का समर्थन करती है।
वोक्कालिगा वोटरों को जब लगा कि कांग्रेस सरकार बना सकती है, तो वे भी काफी तादाद में कांग्रेस के साथ चले गए। यह खेल देवेगौड़ा को चुनावों के बाद समझ में आया। अब जब उन्हें पता चल गया है कि अल्पसंख्यक वोटर उन्हें छोड़ गया है, उनके साथ सिर्फ वोक्कालिगा ही बचा है, तो देवेगौड़ा ने भाजपा से हाथ मिलाने का फैसला कर लिया। भाजपा को सबसे ज्यादा चिंता कर्नाटक की थी, क्योंकि 2019 में उसे 28 में से 25 सीटें मिलीं थी, जिसे बचाना बहुत मुश्किल लग रहा था।

पिछले दिनों भाजपा और जेडीएस में बातचीत शुरू हुई थी, बात एक नतीजे पर पहुंच भी गई थी। पूर्व मुख्यमंत्री और लिंगायत नेता येदीयुरप्पा ने सहमति का एलान भी कर दिया था, लेकिन जेडीएस से खंडन किया गया था। भाजपा ने जेडीएस को लोकसभा की चार सीटों पर चुनाव लड़ने की पेशकश की थी, लेकिन भाजपा ने उसे सोचने का पूरा समय भी दिया था। आखिर शुक्रवार को एच. डी. कुमारस्वामी अपने बेटे के साथ दिल्ली आकर अमित शाह और जेपी नड्डा से मिलकर एनडीए में शामिल हो गए।
लालू यादव, नीतीश कुमार और अखिलेश यादव ने कांग्रेस को समझा दिया है कि जब तक उत्तर भारत की पिछड़ी जातियां, दलित और आदिवासी भारतीय जनता पार्टी से अलग नहीं होते, तब तक भाजपा को नहीं हराया जा सकता। जबसे ये सभी जातियां हिंदुत्व की छतरी के नीचे एकजुट हुई हैं, तबसे यूपी और बिहार के जाति आधारित दलों और कांग्रेस के बुरे दिन चल रहे हैं। पिछड़ी जातियों को भाजपा से तोड़ने की रणनीति के तहत ही लालू यादव और नीतीश कुमार का दुबारा गठबंधन हुआ है।
पिछड़ी जातियों को उनकी संख्या के आधार पर आरक्षण और उनकी वास्तविक जनसंख्या का पता लगाने के लिए जातीय जनगणना का दांव भी इन दोनों ने इसीलिए चला था। इंडी एलायंस की मुम्बई बैठक में जातीय जनगणना को एजेंडे में शामिल करवाने के लिए कांग्रेस, राजद, जेडीयू और सपा में सहमति हो चुकी थी। लेकिन ममता बनर्जी, उद्धव ठाकरे और केजरीवाल ने विरोध कर दिया। बाद में कांग्रेस ने एलायंस की को-ऑर्डीनेशन कमेटी से जातीय जनगणना को इंडी एलायंस के एजेंडे में शामिल करवा लिया। ममता बनर्जी इससे खफा हैं, लेकिन कांग्रेस ने अपनी हैदराबाद बैठक में जातीय एजेंडे को अपने एजेंडे में शामिल करके ममता, उद्धव और केजरीवाल को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया है।
हालांकि जातीय जनगणना हो या महिला आरक्षण इन दोनों मुद्दों पर कांग्रेस का खुद का राजनीतिक इतिहास दागदार है। ओबीसी पर कांग्रेस का इतिहास तो ऐसा है कि नेहरू के जमाने में काका कालेलकर की रिपोर्ट दबा दी गई और इंदिरा गांधी- राजीव गांधी के जमाने में मंडल आयोग की रिपोर्ट दबा दी गई। कांग्रेस ने हमेशा जाति आधारित जनगणना का विरोध किया था। आज़ाद भारत में जवाहर लाल नेहरू सरकार ने जाति आधारित जनगणना बंद करवा दी थी। 1951 की पहली जनगणना में सिर्फ अनुसूचित जाति और जनजाति की जनगणना हुई, क्योंकि संविधान ने इन दोनों वर्गों को आरक्षण दिया था।
आज़ादी के बाद अब तक सात बार जनगणना हुई है। इनमें से पांच बार 1951, 1961, 1971, 1981, 1991 में कांग्रेस के राज में जनगणना हुई। किसी भी जनगणना में कांग्रेस ने जातीय जनगणना की मांग स्वीकार नहीं की। 2001 को छोड़कर 2011 में फिर कांग्रेस की रहनुमाई वाली यूपीए सरकार में जनगणना हुई। तब यूपीए सरकार लालू यादव, मुलायम सिंह यादव और शरद यादव के समर्थन पर टिकी थी। इन तीनों ने मनमोहन सिंह पर जातीय आधारित जनगणना का दबाव बनाया।
मनमोहन सिंह ऑन रिकार्ड कह चुके हैं कि गठबंधन सरकार में उन्हें सिद्धांतो से समझौता करना पड़ा। उन्होंने सरकार बचाने के लिए कांग्रेस के इस सिद्धांत से भी समझौता किया। लालू, मुलायम के दबाव में 2011 की जनगणना में जाति पूछी गई। लेकिन जातीय जनगणना के आंकड़े जाहिर नहीं किए गए। अब राहुल गांधी कह रहे हैं कि मोदी सरकार वे आंकड़े जारी करे, जो उनकी सरकार ने जारी नहीं किए थे।
जातीय जनगणना के अलावा कांग्रेस के हाथ दूसरा मुद्दा लगा है महिला आरक्षण। महिला आरक्षण को लेकर भी कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल दो मोर्चों पर मोदी सरकार को घेर रहे हैं। एक तो उनकी मांग वही है, जिसे 2010 में कांग्रेस ने ठुकरा दिया था। कांग्रेस का बिल इसी लिए लोकसभा में पास नहीं हो पाया था, क्योंकि लालू यादव, मुलायम सिंह और शरद यादव ने आरक्षण में ओबीसी वर्ग की महिलाओं का कोटा रखने की मांग कर दी थी।
जातीय जनगणना और महिला आरक्षण में ओबीसी का आरक्षण लालू यादव, मुलायम सिंह यादव, शरद यादव और नीतीश के पुराने मुद्दे थे। कांग्रेस इन दोनों मुद्दों पर इन सभी जातीय आधारित राजनीति करने वालों के खिलाफ थी, लेकिन अब कांग्रेस ने इन दोनों मुद्दों को अपना लिया है। लोकसभा में महिला आरक्षण बिल पर बहस के दौरान राहुल गांधी ने जातीय जनगणना की मांग को जोरदार ढंग से उठाया।
लेकिन 8 मार्च 2010 को यूपीए सरकार के कांग्रेसी क़ानून मंत्री वीरप्पा मोईली ने राज्यसभा में कहा था कि महिला आरक्षण बिल में ओबीसी का कोटा संभव ही नही है। राहुल गांधी तब कांग्रेस महासचिव थे। अब वही राहुल गांधी महिला आरक्षण में ओबीसी कोटे की मांग कर रहे हैं। महिला आरक्षण का दूसरा मुद्दा है कि बिल पास करवाने के लिए तो जल्दबाजी में संसद सत्र बुलाया गया और आरक्षण लागू करने की तारीख को जनगणना और डीलिमिटेशन से जोड़ दिया, जो न जाने कब होगी।
इन दोनों मुद्दों पर मोदी सरकार जरुर रक्षात्मक मुद्रा में है, लेकिन मोदी कब मुद्दा बदल दें, या कब इन दोनों मुद्दों को पलट कर रख दें, कहा नहीं जा सकता। भाजपा का नेतृत्व इन दोनों मुद्दों पर अन्य विपक्षी दलों को न सही, कांग्रेस को तो कटघरे में खड़ा कर ही सकता है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)=
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