Israel and Palestine: शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व ही है फिलीस्तीन और इजरायल का भविष्य
Israel and Palestine: प्राचीन काल में जब यहूदी बेबीलोनिया (वर्तमान में सीरिया-इराक के इलाके) में दास बना लिए गए थे तो भगवान याहोवा ने इन्हें प्रोमिज्ड लैंड 'आज के फ़लस्तीन-इजरायल' के इलाके में बसने का आदेश दिया था। डेविड और सोलोमन के राज में ये एक यहूदी राज्य के रूप में बने रहे। बाद में जूडा (दक्षिणी हिस्सा) और इजरायल (उत्तरी हिस्सा) के रूप में दो राज्यों में बंट गए। इस बीच तमाम साम्राज्यों के चपेटे में आते रहे और अंत में रोमन साम्राज्य से हारकर उसी साम्राज्य के दूसरे हिस्सों में बसते-उजड़ते रहे।
फ़लस्तीन आने तक वे अरब, यूरोपीय और अमेरिकी महाद्वीपों में बसे रहे। पर उनके मन में अपने एक राष्ट्र में संगठित होने की राजनीतिक महत्वाकांक्षा बनी रही। उन्हें उनके धर्मग्रंथ 'तोरा' से 'प्रोमिज्ड लैंड' की प्रेरणा मिलती रही। फ़लस्तीन के रूप में आबाद देश का इलाका ही वह क्षेत्र था जो यहूदियों के लिए 'प्रोमिज्ड लैंड' थी। जहाँ उनकी धार्मिक ऐतिहासिक जड़ें थीं, लेकिन राजनैतिक हार की वजह से जहाँ से बिखरकर वे अनेक देशों में बसने के लिए मजबूर हो गए थे।

आधुनिक काल में राष्ट्रवाद के उदय से यहूदियों ने अपने राष्ट्र निर्माण के बारे में सोचा और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यहूदी राष्ट्रवाद का प्रचार हुआ। कट्टरपंथी यहूदियों ने इस विचार का प्रचार किया और अपने समुदाय के एक बड़े हिस्से को समझाने में सफल हुए कि प्रोमिज्ड लैंड पर एक यहूदी राष्ट्र का निर्माण उनके अस्तित्व के लिए अपरिहार्य है।
1897 में बासिल में सम्पन्न प्रथम यहूदी कांग्रेस यहूदी राष्ट्र के इस विचार को मूर्त रूप देने की दिशा में पहला कदम था। विभिन्न देशों से आये प्रतिनिधियों ने एक जायनिस्ट संगठन बनाया और इसके पदाधिकारी चुने। इन्होंने कानूनन फ़लस्तीन में इजरायल के रुप में राष्ट्र स्थापित करने के लिए जो भी जरूरी था वह सब तय किया। पर सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि सब कुछ शांतिपूर्ण और अंतरराष्ट्रीय कानूनी की हद में होना था। इस कांग्रेस का आयोजन इतना सफल और निर्णायक साबित हुआ कि कई लोग इसी से इजरायल राष्ट्र की स्थापना मानते हैं, भले ही इजरायल इसके लगभग 50 साल बाद अस्तित्व में आया।
उस समय की सबसे बड़ी साम्राज्यवादी ताकत ब्रिटेन को यहूदी नेताओं ने इस बात के लिए राजी कर लिया कि ब्रिटेन फ़लस्तीन में एक यहूदी राष्ट्र बनाने की पहल में मदद करेगा। 1917 में ब्रिटिश विदेश मंत्री आर्थर बेल्फर ने सार्वजनिक रूप से इसकी घोषणा की और इसे मध्य एशिया की अपनी नीति का हिस्सा बना लिया। यहूदी राष्ट्रवाद के लिए यह बड़ी जीत थी। अब ब्रिटेन एक दूसरे देश की ज़मीन पर एक तीसरा राष्ट्र बलपूर्वक स्थापित करने के लिए तैयार था। इस समय तक यह क्षेत्र ऑटोमन साम्राज्य का अंग था और इसमें पहले से ही अल्प संख्या में यहूदी रह रहे थे।
प्रथम विश्व युद्ध के बाद जब यह इलाका ऑटोमन साम्राज्य के हाथ से निकलकर ब्रिटिश साम्राज्य के हाथ में आया तो बेल्फ़र घोषणा से उत्साहित होकर यहूदियों के फ़लस्तीन कूच में और तेजी आई। कुछ समय बाद जर्मनी एवं अन्य यूरोपीय देशों में यहूदियों के नरसंहार के बाद उनमें से अधिकांश के मन में फ़लस्तीन जाकर बसने के एक मात्र विकल्प की मजबूरी बन गयी। फलतः वे बड़ी संख्या में फ़लस्तीन पहुंचने लगे। द्वितीय विश्व युद्ध के अंत तक यहूदियों की आबादी फ़लस्तीन की कुल आबादी का 31 प्रतिशत हो चुकी थी। संगठित रूप से जमीनें खरीदने, उद्योग लगाने, और खेती करने की योजनाएं वैसे ही लागू की जाने लगीं जैसे कोई स्थापित राज्य अपना प्रबंधन करता है। जाहिर है, इसमें ब्रिटेन खुले हाथ से मदद कर रहा था।
अमेरिका पहले से ही इजरायल के समर्थन का मन बना चुका था लेकिन 1946 में वह खुलकर इजरायल राष्ट्र स्थापना का सहयोगी बन गया। उसकी तैयारी का पता इसी से चलता है कि जब 14 मई 1948 को इजरायल बना तो अमेरिका ने उसी दिन उसे मान्यता दे दी थी जबकि उस समय दुनिया के अधिकांश देश इजरायल बनने का विरोध कर रहे थे।
अमेरिका और ब्रिटेन के खुले समर्थन के बाद और फ़लस्तीन में बस चुके नवागत यहूदियों-फलस्तीनियों के बीच दंगे और खुली अदावत को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1947 में एक समिति बनाई। समिति ने यह प्रस्ताव किया, जिसे राष्ट्र संघ ने पास कर दिया, कि 1948 में जब फ़लस्तीन में ब्रिटेन मैंडेट की मियाद पूरी हो जाएगी तब वह इलाका इजरायल और फ़लस्तीन के दो राष्ट्रों के बीच बांट दिया जाएगा।
14 मई, 1948 को यहूदी एजेंसी के मुखिया डेविड अल गुरियन ने जब स्वतन्त्र इजरायल राष्ट्र की घोषणा की तो यह महज एक औपचारिकता थी। क्योंकि इसके पूर्व ही यहूदियों ने अपने आपको वहाँ इतना बेहतर ढंग से जमा लिया था कि वे एक राष्ट्र की घोषणा के बाद अपने को न केवल चला सकें बल्कि क्रुद्ध अरब राष्ट्रों से अपनी सुरक्षा भी कर सकें।
एक बिखरे हुए समुदाय से एक राष्ट्र के रूप में इजरायल को तब्दील करने में जो सोच, कार्ययोजना, आर्थिक प्रबंधन और लॉबिंग करनी थी उसे यहूदी नेताओं ने इतने संगठित और योजनाबद्ध ढंग से किया कि आज ताज्जुब होता है।
इजरायल के नेताओं को यह मालूम था कि ब्रिटेन, अमेरिका की छत्र-छाया में वे राष्ट्र तो बन जाएंगे। लेकिन अपनी सुरक्षा के लिए आत्मनिर्भर होना ही पड़ेगा। कूटनीति और प्रबल संगठन शक्ति से वे राष्ट्र बना लेंगे लेकिन आत्मरक्षा के लिए हथियारों और मजबूत अर्थव्यवस्था की जरूरत होगी।
इस दिशा में उनकी कैसी तैयारी थी इसका अंदाज़ा इससे लगता है कि जैसे ही इजरायल ने अपने राष्ट्रत्व की घोषणा कि अरब देशों ने उस पर संयुक्त रूप से आक्रमण कर दिया और इजरायल ने अपने दम पर सबको हराकर भगा दिया। 1967 में उस पर हमला हुआ और 6 दिन तक चले युद्ध में इजरायल न केवल विजयी हुआ बल्कि उसने कई पड़ोसी देशों की जमीनें भी कब्जा लीं।
स्थापना के समय से अब तक इजरायल न केवल तकनीकी, शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रतिव्यक्ति आय, अर्थव्यवस्था, राजनीतिक स्थिरता, आंतरिक एवं बाह्य सुरक्षा में चौंकाने वाली कामयाबी हासिल की बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय में अपनी स्वीकार्यता भी बढ़ाता चला गया। यहाँ तक कि तमाम अरब देश भी अब ठंडे पड़ गए हैं। इजरायल की ताकत और अर्थव्यवस्था के आगे नतमस्तक हो चुके हैं।
पर अब भी कुछ देश हैं जो इस्लामी एकता व भाईचारे के लिए फ़लस्तीन के आतंकी संगठन हमास की मदद करते हैं। हमास की आतंकी गतिविधियों से इजरायल को पूरी दुनिया में सहानुभूति मिलती है और इजरायल को और अधिक क्रूरता से फलस्तीनियों को कुचलने का बहाना देती है। 7 अक्टूबर को हमास ने जो किया उससे फ़लस्तीन का मकसद और कमजोर हुआ है।
इजरायल की स्थापना एक धार्मिक सोच के तहत हुई। इसका विरोध केवल अरब देशों ने ही नहीं किया बल्कि उदार और प्रगतिशील सोच के लोगों के लिए भी यह विचार अस्वीकार्य था। इजरायल की स्थापना से विश्व इतिहास की कई धारणाओं को धक्का लगने की आशंका थी इसलिए दुनियाभर के प्रगतिशील और उदार लोग व देश इजरायल की स्थापना के विरोधी थे। भारत भी इजरायल की स्थापना का विरोधी था। उसे 1993 में आकर भारत ने एक राष्ट्र के रूप में मान्यता दी थी। अमेरिका, ब्रिटेन जैसे इजरायल समर्थक देश भी फ़लस्तीन के अस्तित्व को स्वीकार करते थे, पर इजरायल और फ़लस्तीन के हमास के आतंकी अब भी या तो हम नहीं, या तो तुम नहीं की नीति पर चल रहे हैं।
इजरायल शुरू से जिस तरीके से फलस्तीनियों के विरोध का दमन करता आ रहा है वह मुस्लिम देशों को कत्तई अस्वीकार्य है। उसने तमाम संधियों और वैश्विक कानूनों को ठेंगा दिखाकर फ़लस्तीन को जमींदोज कर दिया है। जबकि राजनैतिक वास्तविकता यह है कि न अब इजरायल को कोई नकार सकता है और न ही फलस्तीनियों की स्वतन्त्र राष्ट्रीयता को और अधिक कुचला जा सकता है। दोनों देशों की जनता को शांति व सुरक्षा तभी मिलेगी जब वे इतिहास से निकलकर भविष्य की सोचें और एक दूसरे के अस्तित्व को स्वीकार करें।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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