Yoga Science: पश्चिमी विज्ञान की कसौटी पर योग
Yoga Science: योग दिवस विश्व को भारतीय सभ्यता की एक अभूतपूर्व देन है। आज 21 जून को पूरा विश्व वसुधैव कुटुंबकम की थीम पर योग का अभ्यास कर रहा है। इस प्रकार योग न सिर्फ व्यक्तिगत, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है बल्कि योग कार्यक्रम सामाजिक स्वास्थ्य और समरसता के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। भारत विश्व में इसकी अगुआई कर रहा है। भारत के आह्वान पर 180 से भी अधिक देश योग दिवस पर योग का अभ्यास कर रहे हैं, जो कि ऐतिहासिक है।
हमें योग की वैश्विक यात्रा की वर्तमान स्थिति तो ज्ञात है। जिसका इतिहास इतना है कि यूनाइटेड नेशन्स जनरल एसेम्बली में भारत की ओर से योग दिवस का प्रस्ताव 2014 में रखा गया था। उस समय अप्रत्याशित रूप से रिकॉर्ड देशों ने इसे समर्थन दिया था। तब से ही अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में वैश्विक स्वीकृति के साथ योग का एक सतत चैतन्य आंदोलन सा चल पड़ा है। जिससे बड़ी संख्या में लोग लाभान्वित हो रहे हैं।

किन्तु क्या योग की यह यात्रा इतनी ही है? भारतीय ज्ञान परंपरा का सिद्धांत क्या विश्व ने यूं ही स्वीकार कर लिया? पश्चिम, जो साइंस के अपने दृष्टिकोण को ही सैद्धांतिक मानता है, आखिर उन्होंने कैसे योग को सहज रूप में अपना लिया? इतना ही नहीं आज वे योग के क्षेत्र में छोटे - छोटे सिद्धांत प्रतिपादित करके उसे पेटेंट कराने का प्रयास कर रहे हैं।
यह विदित है कि बिना चुनौतियों का सामना किए सिद्धांत नहीं बनते। और बिना सिद्धांत, विज्ञान नहीं माना जाता है। योग को पश्चिम सहित पूरी दुनिया में मान्यता दिलाने वाले स्वामी शिवानंद सरस्वती, स्वामी ब्रह्मनन्द सरस्वती, स्वामी सत्यानंद या स्वामी राम की चुनौतियों और उनके परीक्षण के विषय में हम भारतीयों को अवश्य जानना चाहिए। यही वो लोग हैं जिन्होंने बीसवीं सदी की शुरुआत में योग को संसार में प्रसारित करना शुरु किया।
भारत से पश्चिम की ओर गये योगियों और साधु संतों ने अपने वैज्ञानिक प्रयोगों से वहां की लैब में ये सिद्ध किया कि तंत्र में वर्णित आठ चक्र कल्पना नहीं बल्कि ऐसे यथार्थ हैं जिन्हें आधुनिक वैज्ञानिक मशीनों से रिकार्ड किया जा सकता है। इसमें स्वामी राम ने तो मैनिंजर फाउण्डेशन में शरीर के तापमान को असामान्य रूप से बढ़ाने, शरीर पर चक्र के आभामंडल को प्रकट करने तथा हृदय गति को सामान्य से बहुत नीचे लाकर भी जीवित बचे रहने के प्रयोग किये। उनके ये सारे प्रयोग न सिर्फ मशीन में रिकार्ड किये गये बल्कि अनाहत चक्र (हृदय मंडल) पर उभरी आभा को कैमरे में भी कैद किया गया। इसके लिए उन्होंने हिमालय के योगियों का धन्यवाद दिया जिन्होंने हिमालय में रहकर ऐसी सिद्धियां अर्जित की जो साइंस के लिए अविश्वसनीय या अकल्पनीय है।
इसी तरह कुछ साल पहले बिहार स्कूल आफ योगा के परमाचार्य स्वामी निरंजनानंद सरस्वती विदेश में थे तो उन्होंने लैब में एक प्रयोग किया। उन्होंने लैब में बैठकर सारे उपकरणों के सहारे ये सिद्ध कर दिया कि व्यक्ति विचारशून्य हो सकता है। ध्यान की गहरी अवस्था में जाकर उन्होंने सिद्ध किया कि वो विचारशून्य हैं जिसे मशीनों ने भी रिकार्ड किया। यह पश्चिमी साइंस के लिए एक तरह से अकल्पनीय था जो यह मान ही नहीं सकता कि थॉट या विचार प्रवाह को रोका भी जा सकता है।
योग शास्त्र में जिन आभामय चक्रों की बात आती है आधुनिक चिकित्सा विज्ञान इन चक्रों के तंत्र को रिप्रोडक्टरी, एक्स्क्रेटरी, डाइजेस्टिव, स्केलेटन, सर्कुलेटरी, रेस्पिरेटरी, नर्वस व एंडोक्राइन सिस्टम के नाम से समझता है। अर्थात दोनों एक ही धरातल पर हैं लेकिन दोनों की शब्दावली और शरीर तथा मन को समझने का सिरा अलग अलग है।
योग को पश्चिम में स्वीकार्यता मिली तो इसका एक प्रमुख कारण पश्चिमी विज्ञान की कसौटी पर उसका खरा उतरना है। बीसवीं सदी की शुरुआत में परमहंस माधवदास बाबा जब कंदराओं से निकालकर योग को सार्वजनिक जीवन में लेकर आये तो उस समय अपने दो शिष्यों गुणाकर मुले और मणिभाई देसाई से यही कहा था कि संसार योग की बात तब मानेगा जब तुम उसे आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर कसोगे। योग आसनों का असली परीक्षण अब लेबोरेटरी में ही होनेवाला है। अगर यह वहां पास हुआ तभी संसार इसे अपनायेगा।
बीसवीं सदी के जितने योगी पश्चिम की ओर गये सबने लगभग इसी कसौटी पर योग आसनों को कसा और सफल रहे। आज दुनिया अगर योग से निरोग रहने की बात कह रही है इसके मूल में ऐसे ही योगियों की साधना और तपस्या है जिन्होंने इसे आधुनिक समय में कंदराओं से निकालकर वैज्ञानिक उपकरणों की कसौटी पर कसा है।
'योग' शब्द का उल्लेख ऋग्वेद सहित अन्य उपनिषदों में मिलता है। आधुनिक योग सिद्धांत को जिस परिप्रेक्ष्य में समझा जाता है, सबसे पहले वह दृष्टिकोण कठोपनिषद में उल्लिखित है। कठोपनिषद का रचना कालखंड ईसापूर्व पांचवीं और तीसरी शताब्दी ईसापूर्व के बीच का माना गया है। पतञ्जलि का योगसूत्र योग का सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ है। पश्चिमी विद्वान ईसा की प्रथम शताब्दी या उसके आसपास का समय इसका रचना कालखण्ड मानते हैं, हालांकि कई भारतीय विद्वान इसे ईसा से कई शताब्दी पूर्व की रचना मानते हैं। इसके बाद हठ योग के ग्रन्थ 9वीं से लेकर 11वीं शताब्दी में रचे जाने लगे थे। इनका विकास तन्त्र से हुआ।
पश्चिमी जगत में "योग" को हठयोग के आधुनिक रूप में लिया जाता है जिसमें शारीरिक फिटनेस, तनाव-शैथिल्य तथा विश्रान्ति (relaxation) की तकनीकों की प्रधानता है। ये तकनीकें मुख्यतः आसनों पर आधारित हैं जबकि परम्परागत योग का केन्द्र बिन्दु ध्यान है जो वह सांसारिक लगावों से मुक्ति दिलाने का प्रयास करता है। इसलिए पश्चिम में और खासकर अमेरिका में योग को लेकर बहुत तरह के प्रयोग भी शुरु हो गये हैं। ये आधुनिक प्रयोग परंपरागत आसनों और उससे होने वाले फायदों को कितना घटाते या बढ़ाते हैं, इसका परिणाम जानने में समय लगेगा।
लेकिन इतना तो तय है कि योग न सिर्फ शरीर और मन की कसौटी पर सदैव खरा उतरा है बल्कि आज यह वैज्ञानिक उपकरणों की कसौटी पर भी खरा उतर रहा है। इसके कारण इसकी उपयोगिता निर्विवाद रूप से सर्व स्वीकार्य हो गयी है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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