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Infra Projects Delay: इन्फ्रा परियोजनाओं में देरी, करदाताओं की जेब पर भारी

सांख्यिकी मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट बताती है कि इनफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में लेटलतीफी देश की अर्थव्‍यवस्‍था और करदाताओं की जेब दोनों पर भारी पड़ रही है।

Infra Projects Delay heavy cost Latest report of Ministry of Statistics

Infra Projects Delay: एम्पायर स्टेट बिल्डिंग, गोल्डन गेट ब्रिज, सी एन टॉवर जैसे आधुनिक विश्व के सात आश्चर्यों के बारे में तो आपने सुना ही होगा। इनमें से नीदरलैंड नॉर्थ सी प्रोटेक्शन वर्क (1997) को छोड़ सभी तेरह महीने से दस साल के भीतर तैयार हो गए थे। हमारे यहाँ विलंबित परियोजनाओं में लगने वाला समय ही उन्हें विश्व के 'आश्चर्यों' में बदल देता है।

महाराष्ट्र के विदर्भ में चल रही गोसीखुर्द राष्ट्रीय सिंचाई परियोजना ऐसे ही इन्फ्रास्ट्रक्चर अजूबों में से एक है। इसका कार्य चालीस साल पहले शुरू हुआ था। 1984 में आरंभ हुई इस परियोजना को आठ साल में पूरा होना था। लेकिन अब इसकी ताजा डेडलाइन 2024 तक भी इसके पूरा होने के कोई आसार नहीं हैं। इसके लिए वजह बताई जा रही है कि इस साल के बजट में योजना के लिए आवंटित 1500 करोड़ रुपयों में यह काम नहीं हो सकता। इसके लिए कम से कम तीन गुनी रकम की जरूरत है। यानि 4500 करोड़ रुपए। वह भी तब, जब यह परियोजना पहले ही करीब पंद्रह हजार करोड़ रुपए लील चुकी है। इसके बावजूद इसका काम अभी तीन चौथाई भी पूरा नहीं हो पाया है।

शर्मनाक बात यह है कि जिस समय इस परियोजना की शुरुआत हुई थी, इस समय इस पर सिर्फ 372 करोड़ रुपए की लागत आने का अनुमान लगाया गया था... बशर्ते कि यह समय पर पूरी हो गई होती। लेकिन, भ्रष्‍टाचार, लालफीताशाही, घटिया प्रबंधन, दोषपूर्ण प्‍लानिंग जैसी अनेक वजहों से यह लटकती चली गई। इसी का नतीजा है‍ कि बीते चार दशकों में बानगंगा नदी पर बन रही इस परियोजना की डेड लाइन, कम से कम दस बार बढ़ चुकी है, और लागत, पचास गुने से भी अधिक।

साढ़े तीन सौ लेटलतीफ योजनाएं, साढ़े चार लाख करोड़ की चपत

अफसोस की बात यह है कि गोसीखुर्द ऐसी अकेली योजना नहीं है। इसी हफ्ते आई सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय की हालिया तिमाही रिपोर्ट (अक्‍टूबर से दिसंबर 2022) बताती है कि देश में ऐसी विलंबित योजनाओं की तादात सैकड़ों में है। जिनमें हो रही देरी की कीमत हमारी अर्थव्‍यवस्‍था को चुकानी पड़ रही है।

उल्‍लेखनीय है कि मंत्रालय ऐसी परियोजनाओं की निगरानी करता है, जिनकी लागत डेढ़ सौ करोड़ रुपए या इससे ज्‍यादा होती है। रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि इन्‍फ्रास्‍ट्रक्‍चर सेक्‍टर की ऐसी 354 परियोजनाएं हैं, जिनकी लागत देरी और अन्य कारणों से बढ़ी है। यह लागत तय अनुमान से 4.55 लाख करोड़ रुपए ज्यादा है। यह राशि हमारे वर्ष 2023-24 के कुल बजट 45.03 लाख करोड़ रुपए की लगभग दस फीसदी है।

इस समय डेढ़ सौ करोड़ रुपए से अधिक लागत वाली करीब डेढ़ हजार परियोजनाओं पर काम चल रहा है। इनकी मूल लागत 20,69,658.30 करोड़ रुपए थी, जो साढ़े तीन सौ परियोजनाओं में देरी के चलते 22.02% प्रतिशत बढ़कर अब 25,25,348.87 करोड़ रुपए हो चुकी है। अभी तक इन सभी परियोजनाओं पर कुल लागत की लगभग 55.07% राशि, अर्थात् 13,90,736.58 करोड़ रूपए, खर्च की जा चुकी है।

ऐसी परियोजनाओं की संख्या भी आठ सौ से ज्यादा हैं, जिनकी लागत तो नहीं बढ़ी है, लेकिन चल वे भी देरी से ही रही हैं। इनमें 190 एक महीने से एक साल तक की देरी से चल रही हैं, 177 एक से दो साल, 325 दो से पांच साल की देरी से और 129 पांच साल से भी अधिक देरी से। इस लिहाज से देखें तो हर परियोजना करीब 37.79 माह की देरी से चल रही है।

देरी पर चिंता भी जरूरी है और चिंतन भी

इस परियोजनाओं में विलंब के पीछे भूमि अधिग्रहण, पर्यावरणीय मंजूरी में देरी, कानूनी अड़चनें, कामकाज में सुस्ती, कुछ अप्रत्‍याशित परिस्थितियों आदि कई प्रकार की समस्याएं हो सकती हैं। इनकी आड़ में सभी संबद्ध विभाग आसानी से बच निकलते हैं। लेकिन, अगर 1449 परियोजनाओं में से 1175 देरी से चल रही हों तो यह चिंता की बात है और चिंतन की थी। चिंता इस बात की होनी चाहिए कि यह देरी परियोजना की लागत तो बढ़ाती ही है, साथ ही विकास की गति को भी धीमा कर देती है।

वहीं चिंतन इस पर होना चाहिए कि हमारी नीयत, नीतियों, योजनाओं और उनके क्रियान्वयन के तौर तरीकों में कहां खोट रह जाती है कि हमारी अस्सी फीसदी परियोजनाएं समय पर पूरा होने में नाकाम रहती हैं। अगर हम इसके पीछे के मूल कारणों को तलाश नहीं कर पाते तो समाधान भी शायद ही कभी तलाश पाएं।

देखा जाए तो यह उन करदाताओं के साथ किसी विश्‍वासघात से कम नहीं है, जो अपनी मेहनत की कमाई का एक बड़ा हिस्‍सा कर के रूप में सरकार के हवाले करते हैं। इस पैसे के लिए कुछ तो जवाबदेही तय होनी चाहिए। हम भारतीय स्‍वभाव से लेटलतीफ होते हैं। लेकिन, जब से सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के उपक्रमों में बायोमेट्रिक अटेंडेंस को अपनाया है, सेलरी कटने या अर्जित अवकाश घटने के डर से लोगों ने आदतन देरी से आना छोड़ दिया है। भय के माध्‍यम से जिम्‍मेदारी और जवाबदेही का यही फार्मूला अगर परियोजनाओं के संदर्भ में भी अपनाया जाए तो शायद स्थिति इतनी ज्‍यादा न बिगड़े।

दिल्‍ली मेट्रो परियोजना के सबक

दिल्‍ली मेट्रो परियोजना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। 1998 में शुरू की गई इस परियोजना को दिल्‍ली मेट्रो रेल कार्पोरेशन ने चार साल की निर्धारित अवधि खत्‍म होने से पहले ही पूरा कर लिया था। उचित योजना, कुशल निष्पादन और प्रभावी परियोजना प्रबंधन जैसी चीजों के अलावा डीएमआरसी एक और वजह से परियोजना को समय सीमा से पहले पूरा करने में कामयाब रही। वह थी दिल्‍ली सरकार और डीएमआरसी के बीच एग्रीमेंट का एक क्‍लॉज, जिसके मुताबिक यह तय किया गया कि परियोजना के पूरा होने में जितने दिन की भी देरी होगी, डीएमआरसी को हर दिन के लिए एक लाख रुपए जुर्माना देना होगा।

क्‍या इस तरह की कोई व्‍यवस्‍था बाकी क्षेत्रों में नहीं की जानी चाहिए। आखिर अधिकारियों की काहिली या लापरवाही की कीमत करदाता क्‍यों चुकाएं? अर्थशास्त्री और नीति निर्माता सुझाव देते हैं कि आर्थिक विकास, इन्‍फ्रास्‍ट्रक्‍चर में खर्च बढ़ाकर ही सुनिश्चित किया जा सकता है। भारत सरकार का सौ लाख करोड़ रुपये का कार्यक्रम 'गति शक्ति भारत मास्टर प्लान' इसी सुझाव पर टिका है कि इन्‍फ्रा में सरकार का निवेश मांग, रोजगार सृजन, आय, खपत में इजाफा करेगा। एक तरफ यह उम्‍मीद है और दूसरी तरफ सांख्यिकी मंत्रालय की यह रिपोर्ट। अब फैसला सरकारी विभागों को ही करना है कि उनको किस दिशा में जाना है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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