Indian Economy: तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के दावे में कितना दम?
प्रधानमंत्री मोदी ने 2024 के आम चुनाव के लिए देश को एक बड़ी गारंटी दी है। प्रगति मैदान में अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन सेन्टर का उद्घाटन करते हुए उन्होंने कहा है कि यदि वह तीसरी बार प्रधानमंत्री बनते हैं तो गारंटी देते हैं कि भारत को वह दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना देंगे। यानी अगले पांच साल में भारत जर्मनी और जापान को आर्थिक तरक्की में पीछे छोड़ देगा।
वैसे जनता को लुभाने के लिए बाकी के दल भी अपनी अपनी गारंटी स्कीम को अंतिम रूप में देेने में लगे हैं। कोई कर्ज माफ करने का भरोसा देगा, तो कोई बिजली पानी फ्री करने का और कोई बेरोजगारी और महिला के नाम पर कैश देगा। इस मामले में मोदी की गारंटी सरकार पर बोझ डालने वाली नहीं, कमाकर खर्च करने वाली है।

मोदी ने भले ही इस समय तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की गारंटी की बात की हो, पर इसकी रूप रेखा तो उन्होंने 2019 में दोबारा चुनाव जीत के आने के बाद ही जनता के सामने रख दी थी, जब उन्होंने 5 ट्रिलियन डॉलर का लक्ष्य रखा था। जर्मनी और जापान दोनों की अर्थव्यवस्था 5 ट्रिलियन डॉलर से कम है। अब सवाल उठता है कि मोदी की गारंटी में दम कितना है? जब विपक्ष यह शोर मचा रहा है कि मोदी सरकार ने अर्थव्यवस्था का बंटाधार कर दिया है। महंगाई चरम पर है। लोग देश छोड़ कर भाग रहे हैं और ईडी एवं सीबीआई के दुरूपयोग से निजी क्षेत्र का मनोबल टूटा हुआ है। तब पहले मोदी की गारंटी की संभावनाओं को देखते हैं और फिर विपक्ष के आरोपों को।
क्या मोदी सरकार ने पिछले नौ साल में ऐसा कुछ किया है जिससे लगे कि भारत की जीडीपी में लगातार बढ़ोतरी हो रही है और अगले पांच-छह साल में और बढ़ोतरी होगी? तो बता दें कि 2014 में भारत की जीडीपी 2 ट्रिलियन डॉलर की थी, जिसे मोदी सरकार ने पहले पांच साल के शासन में 2019 में 2.84 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचाया और अब जून 2023 में भारत की जीडीपी 3.75 ट्रिलियन डॉलर की बतायी जा रही है। आंकड़े यदि झूठ नहीं बोलते तो इस बात की संभावना है कि अगले पांच साल में भारत 5 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी बन सकता है।
मोदी की गारंटी पर जनता कितना वोट करती है, यह तो अगले साल चुनाव के बाद ही पता चलेगा। पर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ को मोदी सरकार के इस दावे में दम दिखाई दे रहा है। आईएमएफ ने मई 2022 में ही अपना अनुमान व्यक्त करते हुए कहा था कि भारत 2026-27 तक ही 5 ट्रिलियन इकोनॉमी का लक्ष्य हासिल कर लेगा। यहां उल्लेखनीय बात यह है कि आईएमएफ ने अपने ही गणित को ठीक करते हुए लक्ष्य को कम समय में ही पूरा करने का अनुमान व्यक्त किया है।
पहले इसी संस्था ने 2028-29 में भारत के तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का अनुमान व्यक्त किया था। क्रेडिट रेटिंग एजेंसी क्रिसिल ने मार्च 2023 में भारत के बारे में यह अनुमान व्यक्त किया था कि यदि मौजूदा विकास दर के आधार पर ही आकलन करें तो भारत 2029 तक 5 ट्रिलियन इकोनॉमी बन सकता है। क्रिसिल ने नॉमिनल जीडीपी विकास दर 11 प्रतिशत का लिया है, जबकि कोविड के पहले यह विकास दर 12 प्रतिशत से अधिक थी। नॉमिनल जीडीपी का मतलब देश में उत्पादित सभी वस्तुओं व सेवाओं का बाजार दर पर मूल्य गणना।
नरेंद्र मोदी का 5 ट्रिलियन इकोनॉमी 2026-27 तक और 2040 तक चीन को पीछे छोड़ देने का सपना कोई सोते आंखों से नहीं देखा गया है। अभी दस बारह साल पहले चीन ने इसे करके दिखाया है, तो भारत भी कर सकता है। ऐसा सोचने में कोई खराबी भी नहीं है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार 2009 में जापान की जीडीपी 5.06 ट्रिलियन डॉलर थी और चीन की 4.9 ट्रिलियन डॉलर, लेकिन 2010 में चीन ने 10 प्रतिशत से अधिक विकास दर के साथ जापान को पीछे छोड़ दिया। फोर्ब्स के अनुसार अमेरिका 26.8 ट्रिलियन डॉलर की जीडीपी के साथ दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, उसके बाद चीन 19.3 ट्रिलियन डॉलर के जीडीपी के साथ दूसरे नंबर पर है। जापान 4.4 ट्रिलियन डॉलर के साथ तीसरे नंबर पर है और जर्मनी 4.3 ट्रिलियन डॉलर की जीडीपी के साथ चौथे नंबर पर है। अब भारत जापान और जर्मनी को पीछे छोड़कर चीन के साथ होड़ करना चाहता है।
भारत 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था तभी बन सकता है, जब ऊंची विकास दर हासिल होती रहे। यानी लगातार 7 से 8 प्रतिशत का रियल ग्रोथ रेट। इसमें कोई शक नहीं कि इस समय भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जिसकी विकास दर 6 प्रतिशत से अधिक है। 2023-24 में भी यह दर 6 से 6.5 प्रतिशत रहने का अनुमान है। पिछले दशक में लगातार 8 प्रतिशत से अधिक की विकास दर हासिल करने वाला चीन इस समय 5 फीसदी की दर से विकास के लिए संघर्ष कर रहा है। अमेरिका के साथ उसका व्यापार विवाद और आतंरिक संघर्षों के कारण विदेशी निवेशक चीन छोड़ते जा रहे हैं और उनमें से कइयों के लिए भारत एक बेहतर विकल्प है।
जहां तक बात जापान और जर्मनी की है तो वहां की स्थितियां भारत से बहुत भिन्न है। जापान की विकास दर 2023 में 1.3 फीसदी तो 2024 में 1.1 फीसदी रहने का अनुमान है। जाहिर है जापान भारत के अपना लक्ष्य हासिल करनेे में कोई चुनौती पेश नहीं कर रहा है। इसी तरह जर्मनी में भी विकास दर 2 प्रतिशत से अधिक नहीं होने का अनुमान है। जर्मनी और जापान दोनों देश इस समय अपनी जनसंख्या के बूढ़े होने से परेशान है और वहां आर्थिक ताकत हासिल करने की बजाय दूसरी किस्म की बहस चल रही है।
5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के बाद भी हम भारतीयों की स्थिति जर्मनी और जापान से अभी बेहतर नहीं हो सकेगी। कारण हमारी विशाल जनसंख्या। जापान में प्रति व्यक्ति जीडीपी लगभग 40 हजार अमेरिकी डॉलर है, जबकि जर्मनी में 51,300 डॉलर और भारत में सिर्फ 2256 अमेरिकी डॉलर। हमारी जनसंख्या के बराबर चीन में भी प्रति व्यक्ति जीडीपी 12,556 डॉलर है।
इसका मतलब यह नहीं है कि 5 ट्रिलियन इकोनॉमी होने से भारतीयों को कोई विशेष लाभ नहीं मिलने वाला। इतनी बड़ी इकोनॉमी के होने का मतलब ही है कि हमारी वस्तुओं और सेवाओं का कुल मूल्य 5 ट्रिलियन डॉलर होगा। यानी हम अधिक उत्पादन कर सकेंगे। अधिक निवेश प्राप्त कर सकेंगे, अधिक रोजगार का सृजन होगा और अधिक आय का स्रोत होगा।
जहां तक विपक्ष के मुद्दे की बात है, देश में महंगाई और बेरोजगारी की बात हो या फिर संस्थाओं के गलत इस्तेमाल की बात हो, यह सब भी अपनी जगह पर सही हैं। आंकड़ों में 6 प्रतिशत की मुद्रास्फीति के बावजूद कभी प्याज, कभी तेल तो कभी दाल के नाम पर जनता की जेबें खाली कर ही दी जाती हैं। महंगाई के साथ बेरोजगारी का छौंक वैसे भी समाज के लिए अभिशप्त बन जाता है। सरकारी नौकरियों की भर्ती में टालमटोल और लेट लतीफी जनता के अच्छे खासे वर्ग को परेशान कर रही है। पर इन सबका समाधान आर्थिक विकास में ही है। आर्थिक विकास के लिए देश में राजनीतिक स्थिरता के साथ साथ आर्थिक नीतियों की निरंतरता भी जरूरी है। अब देखना यह होगा कि मोदी अपनी गारंटी के साथ जनता को कितना समझा पाते हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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