India US Relations: सभ्यता का पुराना शेर और अमेरिका का रिश्ता
India US Relations: अमेरिकी एडमिनिस्ट्रेशन एवं पॉलिटिकल सिस्टम संभवत: संसार की सबसे 'चतुर और निष्ठुर' व्यवस्था है। बहुत पुराने इतिहास में न भी जाएं तो बीते तीस चालीस साल के इतिहास में उनकी यह 'चतुराई और निष्ठुरता' बार बार दिखती रही है। यह एक ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था है जिसके लिए अपने लाभ से बढ़कर कोई हितैषी नहीं और हानि से बढ़कर कोई दुश्मन नहीं। अपने लाभ के लिए वो उस साम दाम दंड भेद वाली रणनीति पर चलते हैं जिसे हम टोटारटंत की तरह दोहराते हैं जबकि वो इस नीति को व्यावहारिक रूप से अपनी डिप्लोमेसी में अपनाते हैं।
अमेरिका एक देश तो है लेकिन कोई प्राचीन सभ्यता या संस्कृति नहीं है। इसलिए लाभ के सिद्धांतों का पालन करते समय उनके सामने कभी भी कोई सभ्यतागत बंधन नहीं होता। अपने लाभ के लिए दुनियाभर की सभ्यताओं से टकराने वाले अमेरिकी प्रशासन के लिए आलोचना या निंदा का कोई महत्व नहीं होता। इसलिए किसी एक ही व्यक्ति या देश को सम्मान के शिखर पर बिठा देते हैं और काम निकल जाने के बाद उसे धूल में भी मिला देते हैं। याद करिए सद्दाम हुसैन को जो कभी इसी अमेरिका की आंखों का तारा हुआ करते थे। जब अमेरिका को लगा कि कुवैत पर हमला करके अब सद्दाम उन्हें ही चुनौती दे रहा है तो उसी सद्दाम को मटियामेट करने में अमेरिकी प्रशासन ने कोई संकोच नहीं किया।

प्राचीन सभ्यता होने के लाभ हैं तो नुकसान भी होते हैं। यह बिल्कुल वैसे ही है जैसे आप किसी प्रतिष्ठित कुल से जुड़े हुए हों। ऐसे में जब आप कोई भी व्यवहार करते हैं तो आपके व्यवहार में स्वत: ही आपके कुल या परिवार का व्यवहार छिपा होता है। कुल और परिवार की मर्यादा से बाहर जाकर आप स्वतंत्र व्यवहार नहीं कर पाते हैं। अमेरिका के सामने दुनिया के किसी भी देश से व्यवहार निर्धारित करते समय ऐसी कोई बाध्यता नहीं होती। वह एक मुक्त बाजार की तरह व्यवहार करता है जिसमें उसका लाभ या हित ही उसका एकमात्र अभिष्ट होता है।
पहले विश्व युद्ध के बाद अन्य देशों में आवागमन करने के लिए पासपोर्ट की व्यवस्था लागू होनी शुरू हुई। पहली बार सीमा पार करना सामान्य नागरिकों के लिए भी प्रतिबंधित कर दिया गया। इससे पहले ऐसा कभी नहीं होता था। राजा के राज्य होते थे, उनकी सीमा भी होती थी लेकिन सामान्य जन इस सीमा से बंधा नहीं होता था। वह बिना किसी पूर्व अनुमति के सामान्य सी औपचारिकता पूरी करके किसी दूसरे राज्य की सीमा में प्रवेश कर सकता था। लेकिन संप्रभुता वाले जिन नये राष्ट्रों का उदय हुआ उनका आधार अपनी सभ्यता या सभ्यताओं का समूह ही था। लेकिन देश के रूप में अमेरिका का सीमांकन बिल्कुल इस तरीके से नहीं हुआ था।
यूरोप के लिए अमेरिका महाद्वीप एक डिस्कवरी थी जिसे एक इटैलियन यात्री क्रिस्टोफर कोलबंस ने 1492 में खोज निकाला था। इस खोज के कुछ ही दशक बाद यूरोप के लोग प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता और उनके व्यापार की संभावनाओं को देखते हुए अमेरिका पहुंचने लगे थे। उस समय यूरोप के लोग अपने संसाधनों के लिए नयी नयी जगहों की खोज कर रहे थे और उन पर कब्जा भी। कोलंबस द्वारा खोजे गये अमेरिका में कॉलोनी बनाने की शुरुआत 1494 में स्पेन ने की। इसके बाद 1502 में पुर्तगाली भी पहुंच गये। 1526 में फ्रांसीसी भी अमेरिका आकर बसने लगे और आखिरकार सोलहवीं सदी में ब्रिटिश भी पहुंच गये। इस तरह अलग अलग यूरोपीय सभ्यताओं से निकले लोगों ने अमेरिका पहुंचकर वहां की मूल सभ्यता को नष्ट करके उसे पूरी तरह से अपने अधीन ले लिया।
इस तरह आज जिस यूरोपीय रंग ढंग के अमेरिका को दुनिया सुपरपॉवर समझती है उस अमेरिका का कुल इतिहास 630 साल पुराना है। दुनिया की दूसरी सभ्यताओं से निकलकर अमेरिका पहुंचने का सिलसिला आज भी रुका नहीं है लेकिन इससे अमेरिका की जो अपनी सभ्यता विकसित हुई वह ऐसे बाजार की सभ्यता थी जिसमें दुनियाभर के लोग आ रहे हैं और रह रहे हैं। वह एक आधुनिक बाजारवादी ताकत के रूप में विकसित हुआ जो दुनियाभर में अपने लाभ का सौदा करता फिरता है। इस बाजार की सुरक्षा या विस्तार के लिए सबसे अहम होता है एक मजबूत सुरक्षा तंत्र। इसलिए अमेरिका न सिर्फ विश्व की महाशक्ति है बल्कि उसकी सैन्य ताकत दुनिया में सबसे बड़ी है। इसलिए दुनिया की डिप्लोमेसी में एक बात कही जाती है कि आज संसार में जिसको भी आगे बढ़ना है वह बिना अमेरिका का उपयोग किये आगे नहीं बढ़ सकता। इसका कारण यह है कि अमेरिका के पास न सिर्फ एक उन्नत और उपभोक्तावादी बाजार है बल्कि उसके पास मजबूत सैन्य तकनीकी भी है।
अमेरिकी नीतियां समकालीन दुनिया के लिए नहीं बनती बल्कि आगे के पच्चीस-पचास साल बाद के लिए बनती हैं। इसलिए वह दुनिया के मुताबिक नहीं चलता, बल्कि दुनिया को अपने मुताबिक चलाता है। इस पच्चीस-पचास साल बाद की दुनिया में उसे किसकी कहां और कैसी जरूरत पड़नेवाली है, वो वर्तमान में उसके लिए काम कर रहे होते हैं। बीते दो दशक से अमेरिकी रणनीतिकारों के राडार पर अचानक से भारत बहुत प्रमुखता से उभरा है। नब्बे के दशक तक अमेरिका भारत को लेकर तटस्थ था। बांग्लादेश मुक्ति संग्राम हो या कश्मीर में घनघोर आतंकवाद का दौर, अमेरिका भारत के साथ खड़ा नहीं हुआ। अमेरिका का झुकाव पाकिस्तान की ओर ही रहा। कश्मीर में आतंकवाद पर अमेरिका अगर एक निंदा प्रस्ताव पारित करने से बचता रहा तो इसका कारण यह था कि उस समय वह पाकिस्तान का उपयोग अफगानिस्तान में कर रहा था। हालांकि अपने अफगानिस्तान अनुभव से उसे समझ में आया कि पाकिस्तान एक ऐसा "माइग्रेन" है जिसका कोई इलाज नहीं है। अब वह पाकिस्तान के बूते चीन की बढ़ती चुनौती का सामना नहीं कर सकता था इसलिए उसने भारत की ओर रुख किया।
बिल क्लिंटन तक अमेरिका पाकिस्तान को ही महत्व दे रहा था लेकिन भारत की ओर झुकने की शुरुआत हुई जार्ज बुश जूनियर के जमाने में जब उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह दोनों के कार्यकाल में भारत से नजदीकी बढ़ाई। फिर आये बराक ओबामा। उसके बाद डोनाल्ड ट्रंप और अब जो बाइडेन। अमेरिका के लिए उनका प्रेसिडेन्ट एक ऐसा मोहर होता है जिसे खुद चलने का अधिकार नहीं होता। वह अमेरिका की स्थाई नीतियों को प्रभावित भी नहीं कर सकता। वह एक सीईओ की तरह होता है जो तयशुदा एजेंडे पर काम करता है और चला जाता है। इसलिए बुश जूनियर, ओबामा, ट्रंप या बाइडेन राजनीतिक रूप से आमने सामने खड़े होते रहे हों लेकिन दुनिया के देशों से कैसा रिश्ता रखना है यह वे तय नहीं करते थे।
इसे तय करता है वहां का प्रशासन जो अगले पचास साल के लिए नीति निर्माण में व्यस्त होता है। भविष्य की इस पचास वर्षीय नीति में अब भारत उनके लिए कई वजहों से जरूरी समझा जा रहा है तो उसका एक कारण भारत का विशाल उपभोक्ता बाजार है जहां फिलहाल अमेरिकी कंपनियां एक कल्ट के रूप में स्थापित हो चुकी हैं। दूसरा कारण, तकनीकी विकास के लिए भारत की बौद्धिक संपदा पर नजर है। तीसरा कारण और शायद सबसे कम महत्वपूर्ण कारण है उभरती महाशक्ति के रूप में चीन की चुनौती को खत्म करना। अमेरिकी रणनीतिकार ये अच्छे से जानते हैं कि चीन के खिलाफ भारत अमेरिका का उस तरह से साझीदार नहीं बनेगा जैसे अफगानिस्तान में रूस के खिलाफ पाकिस्तान बन गया था। फिर भी चीन के मसले पर भारत तटस्थ भी रह जाता है तो बिना युद्ध किये चीन को कमजोर करने में अमेरिका को बहुत मदद मिल जाएगी।
अमेरिका की चीन विरोधी मुहिम में केवल तटस्थ रह जाने में भारत का अपना आर्थिक लाभ भी है। चीन से अमेरिकी निवेश बाहर निकलेगा तो वह भारत की ओर ही आयेगा। इसके साथ ही अमेरिका की रक्षा तकनीकी पर भी भारत की नजर है जिसे पाने के लिए वह लंबे समय से प्रयासरत है। अमेरिका में भारतीयों की बढ़ती संख्या और दबदबा भी भारत के लिए लाभ का एक अवसर है। इसके बावजूद भारत भी कभी नहीं चाहेगा कि वह अमेरिका का करीबी बनने के लिए चीन से दुश्मनी बढ़ा ले। आज भी भारत की गुटनिरपेक्ष नीति बनी हुई है और हाल में यूरोप के दौरे पर गये भारतीय विदेश मंत्री ने एक टीवी चैनल पर साफ कहा कि यूरोप के लोग 'एलाई' (सहयोगी) वाली मानसिकता से दुनिया को देखना बंद कर दें। उन्हें दुनिया के देशों का स्वतंत्र अस्तित्व स्वीकार करने की आदत डालनी चाहिए।
अमेरिकी रणनीतिकार भारत के इस स्वभाव को समझते हैं इसलिए वो भारत को लेकर कभी पूरी तरह से 'आश्वस्त' भी नहीं होते। एक ओर अगर वो 'हिन्दूवादी प्रधानमंत्री' को बुलाकर उसे अपनी संसद में खड़े होकर बार बार स्टैंडिंग ओवेसन देते हैं तो दूसरी ओर उसी देश में विपक्ष की हिन्दू विरोधी विचारधारा के मुखिया को बुलाकर उसके मुंह से वह सब कुछ सुनते हैं जो हिन्दूवादी विचारधारा का काउण्टर हो सकता है। अगर भारत दुनिया में गुटनिरपेक्ष रहना चाहता है तो अमेरिका भारत में दल निरपेक्ष रहना चाहता है। एक ओर अगर वह हिन्दूवादी प्रधानमंत्री की राह में बिछते हुए दिखता है तो दूसरी ओर उसी अमेरिका के सरकारी या गैर सरकारी संस्थान, मीडिया हाउस उसी मोदी और उसकी सरकार दोनों पर गंभीर सवाल भी उठाते रहते हैं। इसी दौरे में डिप्लोमेटिक पब्लिकेशन द एटलांटिक ने जो लेख लिखा है उसकी शुरुआत "गोधरा ट्रेन में पता नहीं किसने आग लगाई" से की है। अपने लेख में एटलांटिक ने "गुजरात में दंगे" के लिए मोदी की पार्टी और पुलिस दोनों को दोषी ठहराया है।
अमेरिका इसलिए ऐसा करता है क्योंकि अमेरिकी प्रशासन दुनिया में किसी भी देश से बराबरी का रिश्ता रखने में विश्वास नहीं करता। वह एक कॉरपोरेट घराने की तरह अपने लाभ हानि के हिसाब से दोस्ती और दुश्मनी करता है। यह बात भारत अच्छे से समझता है। इसलिए ऊपरी तौर पर चाहे जो प्रदर्शन हो लेकिन भीतरी तौर पर आज भी दोनों एक दूसरे पर पूरी तरह से विश्वास करने को तैयार नहीं हैं। इसमें जहां भारत की प्राचीन सभ्यता आड़े आती है वहीं अमेरिका का बाजार उसके रास्ते में खड़ा है।
दोनों देशों की अपनी अपनी जरूरते हैं तो अपनी अपनी रुकावटें भी जिसे दूर कर पाना फिलहाल दोनों के लिए संभव नहीं है। अमेरिका चाहता तो है कि वह सभ्यता के पुराने शेर को अपने रिंग में बंद कर ले लेकिन सभ्यता का शेर अपने मुक्त विचारों का साम्राज्य छोड़ना नहीं चाहता, इसलिए वह इसके लिए तैयार नहीं है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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