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India in Sports: एशियाई खेलों में भारत के रिकार्डतोड़ प्रदर्शन का रहस्य

India in Sports: हांग्जो एशियाई खेलों में भारतीय खिलाड़ी सौ से अधिक पदक लेकर लौटे हैं। भारत के खेल इतिहास में यह एक महत्वपूर्ण क्षण है। इस महत्वपूर्ण उपलब्धि से जाहिर तौर पर देश गौरवान्वित महसूस कर रहा है। इससे पुरुषों की क्रिकेट टीम चल रहे विश्व कप के दौरान अच्छे प्रदर्शन का दबाव महसूस कर रहा होगी। अधिक पुरानी बात नहीं है कि अपने देश में क्रिकेट के अलावा किसी दूसरे खेल की तरफ ध्यान नहीं दिया जाता था। इसे लेकर कई बार पत्रकार अपनी शिकायत भी दर्ज करते थे। अब समय बदल गया है।

एशियाई खेलों में भारतीय खिलाड़ियों ने 28 गोल्ड, 38 सिल्वर और 41 ब्रॉन्ज के साथ कुल 107 मेडल जीते हैं। 72 साल के इतिहास में भारत ने पहली बार पदक का शतक बनाया है। भारत को 1951 में दिल्ली में पहले एशियाई खेलों की मेजबानी करने का सम्मान मिला था और उस समय वह पदक जीतने में जापान के बाद दूसरे स्थान पर था। अब 2023 में पदक जीतने के मामले में भारत एशियाई देशों में चौथे स्थान पर है।

India in Sports: The secret of Indias record-breaking performance in the Asian Games

इससे पहले भारत को 2018 में सबसे अधिक 70 मेडल मिले थे। ठीक दो दशक पहले, 2002 में बुसान एशियाई खेलों में भारत ने मामूली 36 पदक हासिल किये थे। हालाँकि, खेल और उसके एथलीटों के प्रति देश के नजरिए में लगातार सुधार हो रहा है। 2006 तक, दोहा खेलों के दौरान, भारत की पदक संख्या 53 हो गई थी, और 2010 में गुआंगज़ौ खेलों में यह संख्या बढ़कर 65 पदक तक पहुंच गई गई।

2014 में इंचियोन एशियाड में थोड़ी गिरावट आई, जहां भारत को 57 पदक मिले। फिर भी, भारत ने पांच साल पहले जकार्ता और पालेमबांग में विजयी वापसी करते हुए 70 पदकों का रिकॉर्ड बनाया, जो उस समय तक भारत का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था। इस बार के एशियाड को मिलाकर यह 7वीं बार है, जब भारत ने 50 से अधिक पदक जीते हैं।

इस बार एशियाई खेलों में 34 खिलाड़ियों ने बेहतरीन प्रदर्शन करके भारत की झोली में 100 से अधिक मेडल डाले। इनमे कई खिलाड़ियों ने एक से अधिक मेडल जीते हैं। इसमें शूटर्स सबसे आगे रहे। शूटर ऐश्वर्य प्रताप सिंह ने 4 मेडल जीते हैं। जिसमें 2 गोल्ड, एक सिल्वर और एक ब्रॉन्ज पदक शामिल है। वे एशियाई खेलों में 4 पदक जीतने वाले अकेले पुरुष खिलाड़ी हैं। दूसरी ओर वुमेंस शूटर ईशा सिंह ने भी एक गोल्ड और 3 सिल्वर के साथ कुल 4 पदक जीते हैं।

उल्लेखनीय है कि एक तरफ खिलाड़ी एशियाई खेलों से अभी लौटे हैं और दूसरी तरफ भारत ने अगले ओलंपिक की तैयारी शुरू कर दी है। भारतीय खेल प्राधिकरण की तरफ से 21 खेलों के लिए 398 कोच तैनात कर दिए गए है। इनमें कई पूर्व अंतरराष्ट्रीय एथलीट हैं, कई अर्जुन पुरस्कार विजेता हैं, जो अपने-अपने क्षेत्र के दिग्गज खिलाड़ी रहे हैं। उनमें से कई कोच विश्व चैंपियनशिप, ओलंपिक विजेता या उसमें हिस्सा लिए हुए पूर्व खिलाड़ी हैं।

एशियाई खेलों में हासिल जीत के लिए देश के उद्योग जगत के उन नामों को भी एक बार धन्यवाद दिया जाना चाहिए, जिन्होंने छात्रवृति, सहयोग देकर अथवा प्रायोजक बनकर भारतीय खिलाड़ियों को प्रोत्साहित किया। कई पदक विजेताओं को रिलायंस इंडस्ट्रीज, टाटा समूह, जेएसडब्ल्यू समूह और अदानी समूह जैसे शीर्ष कॉर्पोरेट घरानों का सहयोग प्राप्त हुआ, जिन्होंने प्रायोजक बनकर, प्रशिक्षण की व्यवस्था करवा कर एवं अन्य प्रकार के सहयोग के माध्यम से अपने खिलाड़ियों को वैश्विक मंच पर प्रदर्शन करने की तैयारी में मदद की।

भारतीय कॉर्पोरेट जगत के इन दिग्गजों ने एशियाई खेलों में पदक जीतने वाले एथलीटों को हर प्रकार से सहयोग देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। रिलायंस फाउंडेशन ने 12 पदक जीतने वाले एथलीटों की तैयारी में मदद की, उन्हें सहयोग प्रदान किया। जबकि जेएसडब्ल्यू स्पोर्ट्स ने चार स्वर्ण सहित 17 पदक लाने वाले एथलीटों की सहायता की।

इसके साथ ही सरकार खेलों को रोजगार से भी जोड़ रही है। एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल जीतनेवाली उत्तर प्रदेश की पारुल चौधरी ने पत्रकारों से बातचीत करते हुए एक सवाल के जवाब में कहा कि यूपी सरकार की नयी नीति में विश्व चैंपियन खिलाड़ियों को सीधा डीएसपी बनाते हैं और मुझे वही चाहिए था, इसलिए स्वर्ण से नीचे समझौते की वजह नहीं थी। कुछ लोगों को यह जवाब बेबाक भी लग सकता है और कुछ लोगों को खिलाड़ी का भोलापन।

वैसे ग्रामीण परिवेश से आने वाले खिलाड़ियों की यह एक सच्चाई भी है। खेल के साथ साथ उनके ऊपर परिवार और समाज की तरफ से नौकरी हासिल करने का दबाव भी होता है। यह सवाल बार बार उनके सामने आता है कि खेलकर क्या हासिल कर लोगे? यह खेल नौकरी नहीं दिलवा सकता। अब खिलाड़ियों के बीच यह संदेश जा चुका है कि खेल से नौकरी भी मिल सकती है।

इसलिए गांवों में युवाओं का रूझान खेलों की तरफ बढ़ा है। वहां खेल के बुनियादी ढांचे के उपलब्ध होने से प्रतिभाओं की बहुत जल्द पहचान हो जा रही है और एथलेटिक्स की उन स्पर्धाओं में भी खिलाड़ियों की संख्या बढ़ रही है, जिनमें कभी हमारा कोई नामलेवा नहीं था। अब हम उन खेलों में भी स्वर्ण-रजत जीत रहे हैं। भारत ने एशियाड में इस बार अब तक सबसे अधिक 29 मेडल एथलेटिक्स में जीते हैं। 2024 और 2028 के ओलंपिक को लेकर भी अब तैयारियां पूरे जोर शोर से चल रही हैं।

इस बात में कोई संदेह नहीं है कि भारतीय खेल ने सफलता तक पहुंचने में एक लंबा सफर तय किया है, लेकिन वैश्विक मानकों के साथ अंतर को पाटने के लिए अभी भी बहुत कुछ किया जाना शेष है। केंद्र सरकार, भारतीय खेल प्राधिकरण और विभिन्न राज्य सरकारें एथलीटों की मदद के लिए कई पहल लेकर आई हैं।

मोदी सरकार का भी भारत में खेलों की स्थिति को सुधारने की तरफ विशेष ध्यान है लेकिन यह बात किसी से छुपी नहीं है कि भारतीय खेलों को अकुशल प्रशासकों, संघों में गुटबाजी, अंतहीन अदालती लड़ाइयों और चारों ओर मंडराते डोपिंग के मामलों का हमेशा खतरा रहता है। भारत का सिर ऊंचा रखने के लिए, हमें उसके शरीर और पैरों को लड़खड़ाने नहीं देना है। भारत को विजेता बनने के लिए खेलों में सुधार के साथ साथ शासन व्यवस्था में सुधार को लेकर गंभीर होना होगा।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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