India and China: विदेश नीति पर एकमत रहने की रही है परंपरा

विदेश नीति के मुद्दे पर भारत के सभी राजनीतिक दलों को परिपक्वता दिखानी चाहिए| किसी विदेशी सरकार के किसी भी दावे पर प्रतिक्रिया देने से पहले विदेश मंत्रालय के स्टैंड को देख लेना चाहिए| किसी विदेशी सरकार के दावे को सच मान कर अपनी प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिए|

लेकिन पिछले कुछ अरसे से भारत की विपक्षी पार्टियां हमारे पड़ोसी देशों चीन और पाकिस्तान के दावों को सही मान कर प्रतिक्रिया देने लगी हैं| उस प्रतिक्रिया का विदेशी मीडिया भारत के खिलाफ दुरूपयोग करता है|

India and China

इससे पहले का इतिहास यह बताता है कि विपक्ष विदेशी दावों को लेकर सरकार से संसद में ही सवाल पूछा करता था, ताकि उनके सवाल पर भारत का स्टैंड भी स्पष्ट हो जाए, और विदेशी मीडिया उनके सवाल का भारत के खिलाफ दुरूपयोग न कर सके| अब चीन को लेकर सरकार और विपक्ष में नई तकरार शुरू हो गई है। भारत की अंदरुनी राजनीति में विदेश नीति को घसीटना किसी भी लिहाज से उचित नहीं है, इससे विदेशी शक्तियों को ही बल मिलता है|
भारत में हो रहे जी-20 शिखर सम्मेलन और भारत के राजनीतिक दलों की नासमझी का लाभ उठाकर 28 अगस्त को चीन ने अपने प्राकृतिक संसाधन मंत्रालय की वेबसाईट पर एक ऐसा नक्शा जारी कर दिया, जिसमें भारत के अरुणांचल प्रदेश, अक्साईचिन के अलावा वियतनाम पर दावा किया गया है|

India and China

चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने इस मेप को ट्विट करते हुए लिखा है कि चीन के 2023 के स्टेंडर्ड मेप को चीन की प्राकृतिक संसाधन मंत्रालय ने अपनी वेबसाईट पर लोड किया है| अक्साईचिन तिब्बत को पश्चिमी चीन से जोड़ता है। यह इलाका नेहरू के समय से चीन के कब्जे में है, लेकिन भारत हमेशा इस इलाके को अपना बताता रहा है|

दूसरी तरफ भारत के पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश पर चीन कई वर्षों से अपनी नजर गड़ाए है| इसी साल अप्रेल में चीन ने अरुणाचल प्रदेश के 11 स्थानों के नाम बदलने का दावा किया था, तो भारत सरकार ने इसे हास्यास्पद करार दिया था| इससे पहले चीन ने अरुणाचल के नागरिकों को स्टेपल वीजा जारी किया था, जिसका भारत ने कड़ा विरोध किया था, और भारत ने अरुणाचल के उन नागरिकों को चीन जाने नहीं दिया था|

चीन ने 28 अगस्त को अपना नया स्टेंडर्ड मेप इसलिए जारी किया है, क्योंकि भारत सरकार ने जी-20 के मौके पर जारी भारत के राज्यों के बारे दिए गए विवरण में अरुणाचल प्रदेश का भी 11 पेज का विस्तृत विवरण दिया है| इस पूरे विवरण को पिछले एक साल से जी-20 देशों के साथ शेयर किया जा रहा था, और अब सितंबर में जी-20 का सम्मेलन होने वाला है| ऐसे समय में चीन ने दुनिया के सामने अरुणाचल पर अपना दावा ठोका है|

सिर्फ भारत क्यों, चीन का अपने सभी पड़ोसी देशों के साथ भी सीमा विवाद है। 1947 में उस समय के रिपब्लिक ऑफ चाइना ने दक्षिण चाईना समुद्र के अधिकांश भाग को अपना बता दिया था| 1949 के सिविल वार के बाद बनी कम्युनिस्ट सरकार भी पूर्व सरकार के इस दावे पर कायम रही। तब से चीन का ताइवान, ब्रुनेई, मलेशिया, फिलिपीन्स और वियतनाम के साथ स्थाई विवाद बरकरार है|

इसी तरह चीनी गणराज्य ने हैनान के अधिकार क्षेत्र वाले स्प्रैटली और पैरोसेल्स द्वीपों पर भी दावा किया था। 1939 में जापान ने स्प्रैटली और फ्रांस ने पैरोसेल्स द्वीप को जीत लिया था, लेकिन चीन की कम्युनिस्ट सरकार का इन द्वीपों पर दावा है| इसी तरह उसका भारत के अरुणाचल प्रदेश पर दावा है| 1962 का युद्ध अरुणाचल प्रदेश की इसी धरती पर लड़ा गया था, जहां से चीन वापस लौट गया था|

1972 तक अरुणाचल प्रदेश को नेफा (नार्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी) कहा जाता था। 21 जनवरी 1972 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समय भारत ने इस क्षेत्र को अरुणाचल प्रदेश नाम देते हुए केंद्र शासित क्षेत्र बना दिया था| 20 फरवरी 1987 को राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में अरुणाचल प्रदेश को पूर्ण राज्य बना दिया गया। तब से वहां बाकायदा एक 60 सदस्यीय विधानसभा है, जिसके सदस्यों का हर पांच साल बाद चुनाव होता है, दो सांसद लोकसभा में चुन कर आते हैं और एक सांसद विधानसभा से राज्यसभा में आता है|

अरुणाचल प्रदेश की दक्षिण सीमा भारत के असम प्रांत से, दक्षिण-पूर्व सीमा नगालैंड से, पूर्व सीमा म्यांमार ( बर्मा) से पश्चिम सीमा भूटान से और उत्तर सीमा तिब्बत से लगती है| इसी तरह चीन ने तिब्बत पर दावा किया और 1951 में चीन की कम्युनिस्ट सेना ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया| चीन का मानना है कि भारत का अरुणाचल प्रदेश दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा था, इसलिए वह उसका भूभाग है|

इसमें क्या नया है, जो विपक्ष ने देश में हाय तौबा मचा दी है| इस नक्शे का जिक्र करते हुए कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर झूठ बोलने का आरोप लगाया है| उन्होंने कहा कि वह वर्षों से कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री का यह दावा झूठा है कि लद्दाख में एक इंच ज़मीन नहीं गई, पूरा लद्दाख जानता है कि चीन ने अतिक्रमण किया है| अभी हाल ही में वह 15 दिन के दौरे से लद्दाख से लौटे हैं। लद्दाख में भी उन्होंने यही दावा किया था, जिसे एक बाईकर ने सीमान्त क्षेत्रों का दौरा करके अपना वीडियो जारी करते हुए खारिज किया है| लेकिन राहुल गांधी ने अरुणाचल पर चीन के दावे में लद्दाख को जोड़ दिया है|

चीन ने अपने नक्शे में अरुणाचल पर अपना पुराना दावा दोहराया है, जबकि राहुल गांधी ने इसी नक्शे पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि चीन ने भारत की ज़मीन छीन ली है, इसलिए प्रधानमंत्री को इस बारे में कुछ कहना चाहिए| बात अरुणाचल प्रदेश की हो रही है, लेकिन राहुल गांधी ने लद्दाख पर बयान दे दिया| राहुल गांधी का यह बयान तब आया है, जब विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता और विदेश मंत्री एस जयशंकर का चीन के खिलाफ कड़ा बयान आ चुका था|

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने बताया था कि भारत ने कूटनीतिक चैनल के माध्यम से नक्शे पर कड़ी आपत्ति दायर कर दी है| विदेशमंत्री एस. जयशंकर ने कहा था कि यह चीन की पुरानी आदत है, वह इस तरह के आधारहीन दावे करता रहता है| एस जयशंकर ने कहा कि यह भारत का क्षेत्र क्या है, इसको लेकर भारत पूरी तरह से स्पष्ट है| भारत को अपने क्षेत्र की रक्षा करने के लिए क्या करना है इसको लेकर भी सरकार पूरी तरह से स्पष्ट है| इसे कोई भी बॉर्डर पर देख सकता है, निराधार दावा करने से दूसरे का क्षेत्र आपका नहीं हो जाता है| विदेश मंत्री ने यह भी बताया कि यह पहली बार नहीं है, ना ही यह कुछ नया है| मैप का यह विवाद 1950 से शुरू हुआ था, एक मैप में भारत के हिस्से को अपना बता देने से कुछ नहीं बदलने वाला है|

दूसरी तरफ विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने जहां तिल का ताड़ बना कर पेश करने की कोशिश की है, वहीं कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य शशि थरूर ने भारतीय परंपराओं के अनुसार प्रतिक्रिया जाहिर की है| जैसे लंबे समय तक अटल बिहारी वाजपेयी विपक्ष के नेता के तौर पर विदेश नीति के मामलों में कांग्रेस सरकारों का समर्थन करते रहे थे, उसी तरह संयुक्त राष्ट्र में उप सचिव रहे शशि थरूर ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर के बयान का समर्थन करते हुए कहा कि वह सही कह रहे हैं, यह चीन की पुरानी आदत है|

अलबत्ता शशि थरूर ने तो सरकार को सकारात्मक सुझाव भी दिया है कि जिस तरह से चीन ने अरुणाचल प्रदेश और अक्साई चिन को अपने मैप में शामिल किया है उसके जवाब में तिब्बत के जिन लोगों के पास चीन का पासपोर्ट है, उन लोगों को भारत की ओर से स्टैपल वीजा जारी करना चाहिए और चीन की वन चायना पॉलिसी का विरोध करना चाहिए|

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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