India and Bharat: वह इंडिया जो भारत नहीं है
बात 2015 की है। केन्द्र में मोदी सरकार बन चुकी थी। संयोग से उन्हीं दिनों सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल हुई।
महाराष्ट्र के सामाजिक कार्यकर्ता निरंजन भटवाल ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया था कि इंडिया नाम हटाकर देश के नाम के रूप में सिर्फ भारत रहने दिया जाए। उस समय के चीफ जस्टिस एचएल दत्तू और जस्टिस अरुन मिश्रा ने इस केस पर सुनवाई की थी।

केन्द्र सरकार को नोटिस जारी हुआ। कुछ समय बाद केन्द्र सरकार के सॉलिसिटर जनरल की ओर से हलफनामा दाखिल किया गया कि अगर ऐसा किया जाता है तो स्टेशनरी का खर्चा बहुत अधिक आयेगा, लिहाजा इंडिया और भारत दोनों नामों को रहने दिया जाए। केस में आगे क्या हुआ यह तो पता नहीं लेकिन 2020 में दिल्ली के 'नमह' द्वारा एक बार फिर जब ऐसी ही याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हुई तो चीफ जस्टिस एसएस बोबड़े ने याचिका को ही रिप्रेजेंटेशन बनाकर केन्द्र सरकार के पास भेज दिया कि जो निर्णय करना हो केन्द्र सरकार करे।
अब तीन साल बाद मानों सुप्रीम कोर्ट द्वारा भेजे गये रिप्रेजेंटेशन पर हलचल हुई है। मंगलवार को जब कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने "द प्रेसिडेन्ट ऑफ भारत" की ओर से छपे निमंत्रण पत्र पर सवाल उठाया तो चर्चा शुरु हुई कि क्या केन्द्र की मोदी सरकार इंडिया शब्द को हटाकर सिर्फ भारत को ही आधिकारिक नाम के तौर पर रखना चाहती है? इस कयास को बल इस बात से भी मिला क्योंकि इसी महीने मोदी सरकार संसद का विशेष सत्र बुलाने की घोषणा कर चुकी है। तो क्या संसद का यह विशेष सत्र इसी काम के लिए बुलाया गया है?
यह सब तो कयास है और कयास कुछ भी लगाया जा सकता है। लेकिन जब से कांग्रेस की अगुवाई में 'इंडिया' नामक विपक्षी दलों का गठबंधन हुआ है भाजपा के भीतर एक बेचैनी तो दिख रही है। प्रधानमंत्री मोदी जिनके लिए इंडिया शब्द से कोई परहेज नहीं था वो भी अब 'प्राइम मिनिस्टर ऑफ भारत' के रूप में इंडोनेशिया के दौरे पर जा रहे हैं। पार्टी के दूसरे नेता भी इंडिया गठबंधन को कभी इंडी गठबंधन, कभी आईएनडीआईए गठबंधन तो कभी घमंडिया गठबंधन कहकर संबोधित कर रहे हैं। यह इस बात का संकेत है विपक्ष के 'इंडिया' गठबंधन ने उन्हें व्यावहारिक ही नहीं प्रतीकात्मक रूप से भी असहज किया है।
ऐसे में अगर सचमुच संसद के विशेष सत्र में विधेयक लाकर संविधान के अनुच्छेद-एक में संशोधन कर सकती है, तो ये एक बड़ी घटना होगी। संविधान के इसी अनुच्छेद में "इंडिया दैट इज भारत" का उल्लेख आता है। अभी संवैधानिक रूप से दोनों नामों का इस्तेमाल किया जा सकता है इसलिए आमतौर पर सरकारी कामकाज के दौरान अंग्रेजी में इंडिया तथा हिन्दी में भारत शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। जी-20 के लिए राष्ट्रपति की ओर से अंग्रेजी में निमंत्रण भले ही 'प्रेसिडेन्ट ऑफ भारत' की ओर से गया हो लेकिन जी-20 शिखर सम्मेलन में हर जगह हिन्दी में भारत तो अंग्रेजी में इंडिया शब्द का प्रयोग ही हुआ है।
लेकिन सवाल यह यह है कि क्या इंडिया शब्द कभी भारत का पर्यायवाची बन पाया या नहीं? प्राचीन काल में यूरोपीय लेखकों के बाद इंडिया शब्द का उल्लेख सोलहवीं सदी में मिलता है जब ब्रिटेन में ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना होती है। ईस्ट इंडिया कंपनी ब्रिटेन की एक ताकतवर कॉरपोरेशन थी जिसके पास ब्रिटेन से बड़ी आर्मी थी। 1599 में पहली बार ब्रिटेन के कुछ व्यापारी और ताकतवर राजनीतिज्ञों ने ऐसी कोई कारपोरेशन बनाने पर विचार शुरु किया जो ईस्ट इंडीज में व्यापार करे। 1601 में जेम्स लेसेस्टर व्यापारिक संभावनाओं को तलाशते हुए पहली बार भारत आया। इसके आठ साल के भीतर 1608 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपना पहला डॉकयार्ड सूरत में बना लिया था।
खैर, इसके बाद से ही भारतीयों द्वारा इंडिया शब्द का उल्लेख शुरु होता है। कुछ खोजकर्ता मानते हैं कि यूरोपीय लोग क्योंकि सिन्धु नदी को इंडोस या इंडस रिवर कहते थे इसलिए उन्होंने उसके इस पार वाले हिस्से को इंडिया कहना शुरु कर दिया। लेकिन यहां यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि ग्रीक लेखक मेगास्थनीज ने मौर्य साम्राज्य के दौरान तीन सौ ईस्वी पूर्व भारत का भ्रमण किया था। भ्रमण के बाद मेगास्थनीज ने इंडिका नाम से एक किताब लिखी थी जो भारत के बारे में थी। पश्चिमी जगत का भारत से मेगास्थनीज के जरिए जो परिचय हुआ वह इंडिका के रूप में ही हुआ। मेगास्थनीज के लिए इंडिका से आशय चावल की एक ऐसी उन्नत प्रजाति से था जो चिपचिपा नहीं था। संभवत: मेगास्थनीज चावल की उस उन्नत प्रजाति से बहुत प्रभावित थे इसीलिए उन्होंने अपने यात्रा विवरण में इंडिका शब्द का प्रयोग किया होगा।
कई लोग मानते हैं कि इंडिया भी इसी इंडिका शब्द से निकला बताया जाता है। लेकिन अनेक यूनानी लेखक भारत के लिए इंडिया नाम का उपयोग करते थे। कुछ अध्ययनकर्ता इंडिका को ग्रीक शब्द बताते हुए कहते हैं कि इंडिया का रूट वर्ड यही इंडिका है।
खैर, ब्रिटिशकाल में इंडिया ही भारत बन गया था। जब देश स्वतंत्र हुआ उसके बाद नेहरु कैबिनेट में उद्योग और वाणिज्य मंत्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 15 सितंबर 1949 को कांग्रेस संसदीय दल में प्रस्ताव किया था कि अकेले इंडिया के बजाय भारत शब्द को भी संविधान के पहले अनुच्छेद में समाहित किया जाए। सरकारी काम काज के समय अंग्रेजी में इंडिया तो हिन्दी में भारत शब्द लिखा जाना चाहिए। जवाहरलाल नेहरू सहित सभी कांग्रेसियों ने इस प्रस्ताव का स्वागत किया और 18 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने सर्वसम्मति से इस प्रस्ताव को स्वीकार भी कर लिया।
इस तरह संविधान के पहले ही अनुच्छेद में 'इंडिया दैट इज भारत' लिख दिया गया। आमतौर पर इंडिया को भारत के अंग्रेजी पर्यायवाची के रूप में सरकारी और गैरसरकारी स्तर पर प्रयोग भी किया जाता है लेकिन न तो 1947 से पहले इंडिया भारत था और न उसके बाद इंडिया कभी भारत बन पाया। इंडिया वही रहा जिसे ब्रिटिश बनाकर गये थे। भाषा, विचार और व्यवहार में इंडिया भारत के विपरीत ही खड़ा रहा। इस इंडिया की वजह से भारत एक ऐसा विरोधाभासी देश बनता चला गया जहां का इलिट क्लास यहां के साधारण समाज से बिल्कुल कटा हुआ था।
संसार के किसी भी देश में यह विरोधाभास नहीं मिलेगा जो भारत में मिलता है। हमारे यहां का साधारण और विशिष्ट दो अलग ध्रुव पर रहते हैं। हमारे यहां का जो विशिष्ट है वह जन साधारण से भाषा, विचार और व्यवहार के स्तर पर पूरी तरह से कटा हुआ होता है। नौकरशाही, ज्यूडिशियरी, बिजनेस बिरादरी, शिक्षा व्यवस्था सब ओर मानों भारत की जड़ों से कटकर ही इंडिया के इलिट क्लब से जुड़ने का रिवाज है। भारत और इंडिया के इस विभाजन को ब्रिटिश काल से ही पैदा किया गया और स्थापित किया गया कि इंडिया के इलिट क्लास में प्रविष्ट होना है तो भारत की मुख्यधारा से अपने आप को अलग करना होगा।
भारत के पहले गवर्नर जनरल बिलियम बेन्टिक ने कलकत्ता के फोर्ट विलियम का गवर्नर रहते हुए ही 1834 में यह कह दिया था कि ऐसा लगता है हम सफल हो रहे हैं क्योंकि भारत के विशिष्ट लोग अपने लोगों के बीच जाने की बजाय हमारी पार्टियों में आकर गर्व का अनुभव करने लगे हैं। उस समय से ब्रिटिश तौर तरीकों के अनुसार जीवन जीनेवाला या उनकी भाषा बोलनेवाला या फिर उनके जैसा व्यवहार करनेवाला स्वत: ही अपने आपको विशिष्ट समझने लगता था। यही वो लोग थे जो भारत में इंडिया का प्रतिनिधित्व करते थे। आज भी कर रहे हैं।
भाषा के तौर पर आज अंग्रेजी संसार की संपर्क भाषा है। इसलिए उससे अलग होकर तो समकालीन विश्व में हमारे लिए खड़े होना मुश्किल हो जाएगा लेकिन भारत में अंग्रेजी से उपजा संकट यह है भी नहीं। अंग्रेजी और ब्रिटिश तौर तरीकों ने भारत के भीतर जो इंडिया क्लास पैदा किया है वो भारत का उपहास करता है। उसे हीन समझता है। उसे लगता है कि भारत में पैदा होनेवाले हर व्यक्ति को इंडिया क्लब का सदस्य बन जाना चाहिए तभी वह आधुनिक कहा जाएगा। जो ऐसा नहीं करता वह भारत में रह जाता है और पिछड़ा समझा जाता है।
कभी बहुत विशिष्ट वर्ग से हुआ यह विभाजन अब समाज के निचले हिस्से तक पहुंच गया है। गली मोहल्ले तक में इंडियन इलिट बनाने का स्वप्न बेचा जा रहा है। इसलिए स्वतंत्रता के 75 साल पूरा होने के मौके पर अगर इंडिया और भारत की इस विभाजक रेखा को काट दिया जाता है तो यह भारत में नयी आजादी की शुरुआत होगी। हालांकि गवर्नमेन्ट आफ इंडिया के लिए इसे कर पाना इतना आसान नहीं होगा फिर भी अगर ऐसा होता है तो भारत के 45 लाख करोड़ के बजट से कुछ सौ करोड़ रूपये स्टेशनरी के खर्चे के लिए अलग निकाल देना घाटे का सौदा नहीं कहा जाएगा।












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