Kashi Shabdotsav: फेक नैरेटिव के युग में काशी का सार्थक शब्दोत्सव
शब्द- शब्द को जोड़कर बनता है शब्दोत्सव। ज्ञान की नगरी काशी में उसकी ज्ञान परंपरा के उत्सव की कड़ी में दिनांक 10 ,11 एवं 12 फरवरी, 2023 को काशी शब्दोत्सव का आयोजन हुआ जो फेक नैरेटिव के युग में महत्त्वपूर्ण था।

Kashi Shabdotsav: विश्व की सबसे प्राचीन नगरी कही जाने वाली वाराणसी में 'काशी शब्दोत्सव' का आयोजन 'विश्व संवाद केंद्र' के तत्वावधान में हुआ। इस अवसर पर काशी में देशभर के विद्वान लेखक, पत्रकार, साहित्यकार, ब्लॉगर, भारतीय सिनेमा से जुड़ी हस्तियों का जुटान हुआ। 'रुद्राक्ष इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर' में आयोजित काशी शब्दोत्सव के तीन दिन असल में बौद्धिक विमर्श के तीन दिन साबित हुए।
शब्दोत्सव के लिए काशी
काशी की धरती पर शब्दोत्सव करने से पूर्व हुई चर्चा में आयोजकों के मन में काशी के गौरवपूर्ण इतिहास और समृद्ध परंपरा की भूमिका थी। शब्द ही शिव है। शिव ही सुंदर है। शिव ही आनंद है। काशी भगवान शिव का आनंदवन है। शिव शब्द के देवता हैं। काशी में शिव, राम नाम शब्द से ही मुक्ति देते हैं। शब्द ही ब्रह्म है और ब्रह्म से ही सृष्टि होती है इसलिए शब्द ही सत्य है, शब्द ही सुंदर है, शब्द ही आनंद है, शब्द ही मुक्ति है। शब्द की यह सभी विशेषताएं काशी से जुड़ी हैं, क्योंकि काशी का अर्थ है ज्ञान प्रकाशिका।
ज्ञान में शब्द के सभी रूप विद्यमान हो जाते हैं। इसलिए काशी शब्द प्रकाशिका भी है। इसके देव शिव हैं, जिनके डमरु निनाद से निकली 14 ध्वनियों से पाणिनी के व्याकरण सूत्र का निर्माण हुआ। शिव तंत्र शास्त्र के स्रोत हैं। संपूर्ण तंत्र शास्त्र शब्द आधारित है। ऐसे शब्द पति, ज्ञान पति शिव की नगरी काशी अनादिकाल से संपूर्ण विश्व में ज्ञान के लिए प्रसिद्ध है। काशी दुनिया में एकमात्र स्थान है जहां शब्द शक्ति इतनी बढ़ती है कि शिव, राम नाम शब्द की शक्ति से जीव को मुक्ति देते हैं, जिसके कारण काशी का नाम मुक्ति की नगरी हो जाता है।
शब्द सामर्थ्य की धरती काशी में जहां देव, दनुज, ऋषि, मुनि आदि सभी ज्ञान और मुक्ति की आशा में आए। आदि शंकराचार्य को यहीं चांडाल ने ज्ञान बोध कराया। यहीं दक्षिण से आए संत तैलंग स्वामी को ज्ञान प्रकाश मिला। यह माधवाचार्य की तपस्थली भी है। भक्ति आंदोलन का प्रकाश संत रामानंद, संत कबीर, संत रविदास के माध्यम से यहीं से प्रवाहित हुआ। भगवान बुद्ध के ज्ञान प्रकाश का केंद्र सारनाथ यहीं स्थित है। जैन धर्म के 4 तीर्थंकरों की ज्ञान भूमि भी काशी रही है।
इंद्रप्रस्थ लुप्त हुआ भगवतगीता आज भी है
आयोजन के उद्घाटन सत्र में अपने विचार रखते हुए केरल के राज्यपाल डॉ. आरिफ मोहम्मद खान ने कहा कि महाभारत काल में दानवों ने पांडवों के लिए जो इंद्रप्रस्थ बनाया था, वो आज लुप्त हो चुका है। वहीं कुरुक्षेत्र के मैदान में भगवान श्रीकृष्ण ने गीता का जो उपदेश दिया था, वो आज भी हमारे बीच है।
राज्यपाल ने कहा कि गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर ने शब्द के महत्व के बारे में बताते हुए कहा था कि भारत की संस्कृति ज्ञान पर आधारित है। शब्द अक्षर से बनता है। शब्द ही भारत की आत्मा और संस्कृति को परिभाषित करता है। स्वामी विवेकानंद ने भी कहा था कि हमारी संस्कृति भी आदिकाल से ज्ञान पर आधारित रही है। भारत की संस्कृति व आत्मा शब्द से ही परिभाषित होती है। हम शब्द की शक्ति का उत्सव मनाने के लिए शिव की नगरी काशी में एकत्र हुए हैं, जोकि सबसे उपयुक्त स्थान है। उन्होंने नई तकनीक के माध्यम से शब्दों को सहेजने पर जोर देते हुए कहा कि कंप्यूटर इसमें कारगर भूमिका निभा रहा है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने कहा कि राष्ट्र के विकास के लिए हर संभव प्रयास करते रहना होगा। भारतीय ज्ञान को प्रकट होने का यही उचित समय है।
विरोध उस बात पर जो तुलसीदास ने नहीं लिखा
लेखक, कवि मनोज मुंतशिर ने 'रामायण और महाभारत के शाश्वत मूल्य तथा जीवन दर्शन विषय पर बोलते हुए कहा कि वर्तमान में सनातन हिंदू समाज के प्रेरक गोस्वामी तुलसीदास पर आरोप लगाए जा रहे हैं, जबकि उन्होंने किसी समाज, किसी वर्ग के लिए ऐसा कुछ भी नहीं लिखा। ये केवल राजनीति का एक भाग है। गोस्वामी तुलसीदास पर आरोप लगाने वाले शिक्षा की दृष्टि से शून्य हैं। उन्होंने राष्ट्रगान का जिक्र करते हुए कहा कि इस देश में कुछ बुद्धीजीवी हैं जो कहते हैं कि राष्ट्रगान थिएटर में क्यों बजाते हो? हम वहां मनोरंजन के लिए गए हैं। आप वहां राष्ट्रगान बजाते हो और हमको खड़ा होना पड़ता है। यह गलत बात है। बड़ी बड़ी बात करने वाले जिन्हें 52 सेकेन्ड राष्ट्रगान पर खड़े होने में एतराज है, उसी थिएटर में समोसे की लाइन में आधे घंटे खड़े रहते हैं। उन्होंने शहरों के नाम बदले जाने का समर्थन किया और कहा- इनका नाम आक्रांताओं ने बदले थे। जिसे सही करना उचित है।
विविधता और मत भिन्नता से डरते हैं अब्राहमिक मजहब
'संस्कृति, हिन्दुत्व और आधुनिकता' पर बोलते हुए जवाहरलाल नेहरू विवि की कुलपति प्रो शांतिश्री धूलिपुड़ी पंडित ने कहा कि आधुनिक हिन्दूत्व और हमारी भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी ताकत हमारी इंटीग्रल यूनिटी है। वहीं अब्राहमिक मजहबों के पास सिंथेटिक यूनिटी है। इसलिए उन्हें धर्मांतरण की आवश्यकता पड़ती है। हमें इसकी आवश्यकता नहीं है। पश्चिम के अब्राहमिक मजहब विविधता और मत भिन्नता से डरते हैं। हिन्दुत्व और भारतीय परंपरा में हम इसके समर्थक हैं। जिसे छह डी से समझते हैं। डेवलपमेंट (विकास), डेमोक्रेसी (लोकतंत्र), डिफरेंस (अंतर), डिसेन्ट (असहमति), डायवर्सिटी (विविधता) और डायलॉग (संवाद)। हमने देखा है कि आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्रा के बीच शास्त्रार्थ हुआ। वहां मंडन मिश्रा की पत्नी निर्णायक बनी। मुझे नहीं लगता है कि पश्चिम को हमें महिला अधिकार और दूसरे विषयों पर शिक्षा देनी चाहिए।
आजादी के बाद भारतीय फिल्मों का इप्टा काल
वरिष्ठ पत्रकार फिल्म समीक्षक अनंत विजय ने 'भारतीय सिनेमा के विभिन्न दौर' विषय पर कहा कि हिन्दी फिल्मों का काल विभाजन करें तो हमारा प्रारंभिक सिनेमा का काल भक्ति काल के तौर पर याद किया जाएगा। ऐसे तमाम पौराणिक चरित्रों को पर्दे पर जीवंत किया हमारे पूर्व फिल्मकारों ने जिनकी वजह से आज सिनेमा के लोग पुन: उस दिशा में जाने का प्रयास करते हैं। अनंत विजय ने आगे कहा: 'जिनको लगता है कि फिल्मों का सामाजिक प्रभाव नहीं है, वह सिर्फ मनोरंजन के लिए देखा जाता है। उन्हें गांधी और पटेल के संबंध में पढ़ना चाहिए कि गांधी किस तरह से फिल्मों को स्वतंत्रता प्राप्ति की राह में बाधा मानते थे। इसलिए उन्होंने अपने जीवन काल में कोई भी फिल्म नहीं देखी। लोग कहते हैं कि रामराज्य देखी लेकिन उसका प्रमाण कहीं उपलब्ध नहीं है। दूसरी तरफ सरदार पटेल फिल्मों को ना सिर्फ संरक्षण दे रहे थे बल्कि फिल्मों के प्रदर्शन में किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न ना हो, इसकी व्यवस्था भी करते थे। जब एक पत्रिका के संपादक ने व्ही शांताराम की एक फिल्म रूकवाने के लिए दिल्ली में अपने समर्थकों से पोस्टर लगवाए थे तो इस बात का प्रमाण नेशनल फिल्म अर्काव्स आफ इंडिया की पत्रिकाओं में है कि सरदार पटेल ने दिल्ली पुलिस कमिश्नर को फोन कर कहा कि यह सारे विरोध के पोस्टर हट जाने चाहिए और फिल्म प्रदर्शन निर्बाध गति से होना चाहिए।'
अनंत विजय ने आजादी के बाद फिल्मों पर वामपंथी संस्था इप्टा (Indian People's Theatre Association) के प्रभाव का जिक्र करते हुए आगे कहा कि 'आजादी के बाद इप्टा के प्रभाव में फिल्में बननी शुरू हुई। ख्वाजा अहमद अब्बास, कैफी आजमी जैसे लोगों ने जिस तरह की फिल्में बनानी और संवाद लिखने प्रारंभ किए, उसमें खास तौर से ऊर्दू को लेकर एक रोमांटिसिज्म पैदा किया गया और कहा गया कि ऊर्दू के अल्फाज जब फिल्मों में आते हैं तो लोगों दिलों को छूकर जाते हैं। वहां हिन्दी की चर्चा नहीं की गई।'
शब्दोत्सव जैसे आयोजन अपने पीछे विमर्श के कई बिन्दु छोड़ जाते हैं। इस दौर में जब हम नैरेटिव और इको सिस्टम जैसे शब्द बार बार सुन रहे हैं। शब्दोत्सव जैसे आयोजन नैरेटिव गढ़ने और फेक न्यूज का जो इको सिस्टम खड़ा हुआ है, उसे ध्वस्त करने में भी मददगार साबित हो सकते हैं।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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