2024 Elections: बीजेपी के लिए 2019 से अलग होगा 2024 का चुनाव
2024 Elections: 2024 के लोकसभा चुनाव का दंगल 'आर-पार' का नहीं बल्कि 'पार-पार' का होता जा रहा है।

विपक्षी गठबंधन जहां नेतृत्व की उठापटक से जूझ रहा है, वहीं भारतीय जनता पार्टी यह मान कर काम कर रही है कि 2024 की जीत उसके लिए एक नए युग का द्वारा खोलेगी जो अगले एक दशक के लिए पार्टी को देश के राजनीतिक दलों की कतार में सबसे आगे खड़ा कर देगी।
सवाल है कि यह चुनाव 2019 के आम चुनाव से किन मायनों में अलग होगा? एक बड़ा अंतर यही है कि उस समय विपक्ष हालांकि कमजोर ही था लेकिन लोकसभा चुनाव के पहले हुए पांच विधानसभा चुनाव में विपक्ष को हिंदी हॉट लैंड के प्रमुख तीन राज्यों में जीत की संजीवनी मिली थी। तब जीत से उत्साहित कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी राफेल सौदे, जीएसटी, नोटबंदी, बेरोजगारी, महंगाई आदि मुद्दे पर कुछ अधिक मुखर थे, चौकीदार चोर है का नारा लगाते हुए सत्ता प्रतिष्ठान को घेरने की नाकामयाब कोशिश कर रहे थे। लेकिन आज पांच राज्यों के चुनाव परिणाम बिल्कुल अलग स्थिति बयान कर रहे हैं।
राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में मिली करारी हार के बाद देश की हिंदी पट्टी में कांग्रेस बैकफुट पर है। हालांकि चुनाव में मत प्रतिशत बढ़ने की बात कह कर कांग्रेसी खुद को संतोष दे रहे हैं और अपनी पीठ भी थपथपा रहे हैं लेकिन जमीनी सच्चाई है कि हाल की हार ने कांग्रेस पार्टी को ऊर्जाहीन कर दिया है। ऐसे में गठबंधन करके चलना उसकी मजबूरी है, लेकिन गठबंधन के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती नेतृत्व की है। आखिर इसका नेता कौन हो? उसकी नीतियां क्या हो? साथ बनाए रखने के लिए न्यूनतम साझा कार्यक्रम क्या हो?
इस बार कांग्रेस का इंडिया गठबंधन कायम भी रहता है तो उसका मुकाबला संगठित और शक्तिशाली भारतीय जनता पार्टी से है जिसमें लीडरशिप को लेकर कोई दुविधा नहीं है। सबका साथ और सबका विकास के एजेंडे के साथ भाजपा की धार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक नीति स्पष्ट है। भारत को दुनिया की बड़ी आर्थिक ताकत बनाने के साथ-साथ वर्ष 2047 तक, जब भारत की आजादी के 100 साल पूरे होंगे, भारत को विकसित भारत बनाने का सपना है।
जहां तक चुनावी रणनीति का प्रश्न है तो विपक्षी गठबंधन ने सही अर्थों में अभी तक कोई पहलकदमी नहीं की है जबकि भारतीय जनता पार्टी दौड़ की निर्णायक सीमा रेखा के पार पहुंचने को बेताब है। अबकी बार 400 के पार, तीसरी बार मोदी सरकार जैसे नारों के साथ भाजपा विपक्षी गठबंधन की तरफ से आने वाली हर चुनौती को पूरी सतर्कता और अति गंभीरता के साथ ले रही है। भाजपा की चुनाव प्रबंधन रणनीति में विपक्ष के हर हमले का चाहे वह छोटा ही क्यों ना हो मुंहतोड़ जवाब देने की हर स्तर पर कोशिश की जा रही है। भाजपा की तरफ से ग्रामीण व शहरी गरीबों, महिलाओं, किसानों और दलितों को लक्षित ढंग से जोड़ने की लगातार कोशिश चल रही है।
दूसरी तरफ मल्लिकार्जुन खड़गे और तीनों गांधी (सोनिया, राहुल और प्रियंका) के संयुक्त नेतृत्व में भी खड़ी नहीं हो पा रही कांग्रेस पार्टी कमजोर आत्मविश्वास के चलते धूमिल संभावनाएं और अस्तित्व पर मंडरा रहे संकट के कारण आप, तृणमूल कांग्रेस, जदयू, राकांपा, द्रमुक, शिवसेना और अन्य 22 दलों के साथ मिलकर बीजेपी को हराने का रास्ता तलाश रही है।
विडंबना तो यह है कि आजाद भारत में पहली बार 18वीं लोकसभा के लिए होने वाले चुनाव में देश की ग्रैंड ओल्ड कांग्रेस पार्टी 300 से भी कम सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए अभिशप्त हो गई है। पिछले दिनों मुकुल वासनिक के आवास पर हुई बैठक में पार्टी की उच्च स्तरीय टीम के सदस्यों ने पार्टी के मौजूदा हालात पर निराशा व्यक्त की और कहा कि कांग्रेस आज इस स्थिति में भी नहीं है कि वह गठबंधन के सहयोगियों से 300 सीटें मांग सके। एक विश्लेषण के मुताबिक राहुल गांधी की आगामी भारत न्याय यात्रा जिन राज्यों से गुजरेगी उन राज्यों की 345 संसदीय सीटों में से केवल 15 सीटों पर ही कांग्रेस के सांसद हैं।
दबी जुबान से कई कांग्रेसी नेता राहुल की दूसरे चरण की यात्रा को निरर्थक और संसाधनों की कमी से जूझती पार्टी के लिए हानिकारक मान रहे हैं।
लेकिन दूसरी तरफ प्रधानमंत्री मोदी अपनी पार्टी के नेताओं से लगातार कह रहे हैं कि उन्हें भारत के विकास की कहानी को लेकर जल्द से जल्द जनता तक पहुंचना चाहिए, और विपक्षी दलों की किसी भी हरकत को हल्के में नहीं लेना चाहिए। यहां तक की 15 राज्यों की उन 100 लोकसभा सीटों से गुजरने वाली राहुल गांधी की नई यात्रा की धार भी कुंद करने की तैयारी समय पर की जानी चाहिए। भाजपा के संतुलनकार पूरी ताकत के साथ लाभार्थियों को बांधे रखने तथा अधिक से अधिक संख्या में लोगों को जोड़ने के लिए दिन रात काम कर रहे हैं।
दरअसल भाजपा तीसरी बार सत्ता में लौटने के लिए हर मतदाता और हर राज्य को महत्वपूर्ण मान रही है। यही कारण है कि पार्टी की कमान थामने वाले नरेंद्र मोदी उन जगहों पर भी जाने में गुरेज नहीं कर रहे जहां भाजपा के लिए संभावनाएं अपेक्षाकृत कम है। तमिलनाडु के त्रिची और केरल के त्रिशूर में जाकर सभा करना, वहां के मतदाताओं का मन टटोलना, पार्टी के पक्ष में एकजुट करना आदि को इसी कड़ी में देखा जाना चाहिए।
ऐसे में चुनावी विश्लेषक 2024 के लोकसभा चुनाव को कांग्रेस के लिए अस्तित्व की लड़ाई मान रहे हैं। 2019 में भाजपा अपने दम पर 303 सीटें जीती थी जो 2014 की 282 सीटों से 21 अधिक थी। कांग्रेस को केवल 52 सीटें मिली थी। इससे पूर्व 2014 के चुनाव में कांग्रेस पार्टी को केवल 44 सीट मिली थी। वर्ष 2019 में एनडीए के पास 332 सांसद थे जबकि इंडिया गठबंधन के मौजूदा 28 दलों के पास 144 सीटें थी। अन्नाद्रमुक, जदयू और अकाली दल के निकल जाने के बाद भी एनडीए 139 सीटों वाले इंडिया गठबंधन से बहुत आगे है।
भाजपा का इरादा आगामी लोकसभा चुनाव में 360 से ज्यादा सीट जीतने और और लगभग 50% वोट शेयर पाने का है। अगर पार्टी अपने इरादे को हासिल करने में कामयाब होती है तो निश्चित रूप से 2024 की यह जीत भाजपा के लिए एक नए युग का द्वार खोलेगी, जिसकी हनक अगले एक दशक तक जारी रहेगी और पार्टी का आभामंडल नई चमक के साथ बदलावों के अग्रदूत के रूप में देखा जाएगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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