Gandhi Jayanti: सबको जोड़नेवाले और सबसे जुड़नेवाले महात्मा गांधी

Gandhi Jayanti: आज अगर महात्मा गांधी जिंदा होते तो 154 साल के होते। हाड़ मांस का कोई इंसान इतने साल जिंदा नहीं रह सकता। गांधी भी नहीं रहते। लेकिन गांधी जी 125 साल जिंदा रहना चाहते थे। गांधी के 125 साल जिंदा रहने और देश सेवा करने की सोच सर्वविदित है। लेकिन इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि स्वतंत्र भारत अपने बापू को महज 169 दिन सुरक्षित रख पाया। संयोग से उस दौरान उनकी एक वर्षगांठ भी पड़ी। 2 अक्टूबर 1947।

उस दिन गांधी ने कहा था, 'आज मेरा जन्मदिन है लेकिन मुझे लगता है कि आज तो मेरे लिए मातम बनाने का दिन है। मैं अभी तक जिंदा हूं, इस पर मुझे शर्म आती है। मैं वही शख्स हूं जिसकी बातें सभी सुनते थे लेकिन आज कोई नहीं सुनता। सुनकर भी आज मेरी बातों को अनसुना कर दिया जाता है। ऐसी हालत में मेरे लिए हिन्दुस्तान में जगह कहां है और मैं उसमें जिंदा रहकर क्या करूंगा? आज मेरे से 125 वर्ष की बात छूट गई है। 100 वर्ष की बात छूट गई है और 90 वर्ष की भी। आज मैं 79 वर्ष में तो पहुंच जाता हूं लेकिन वह भी मुझको चुभता है। मेरे सभी साथी मेरा साथ छोड़ रहे हैं। मेरी बाते कल तक उनको आदर्श लगती थी, आज बोझ लगती है। कांग्रेस ने मुझे छोड़ दिया हैै। मैं अकेला हूं और मेरे साथ कोई नहीं है।"

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उस भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने महात्मा गांधी को छोड़ दिया था, जिस कांग्रेस को देश के आमजन से महात्मा गांधी ने ही जोड़ा था। 1885 में बना यह राजनीतिक दल लगभग दो दशकों तक अंग्रेजी सभ्यता व शिक्षा के अभिजात्य भद्रलोक का उत्सवधर्मी संगठन था जो साल में एक बार क्रिसमस की छुट्टियों पर किसी जगह एकत्रित होता और ब्रिटिश सरकार के सम्मुख अपनी कुछ आपत्तियां, कुछ प्रार्थनाएं प्रस्तुत करके सालभर के लिए विसर्जित हो जाता था।

ब्रिटिश सरकार कांग्रेस की मांगों का डस्टबिन में फेंक देती थी। 1885 से लेकर 1915 तक कांग्रेस ने ब्रिटिश सरकार के सामने 56 मांगे रखी थी और ब्रिटिश सरकार ने इन 30 सालों में कांग्रेस की एक भी मांग नहीं मानी थी। कारण स्पष्ट था। गांधी से पहले कांग्रेस के पास कोई जननेता नहीं था जिसके पास देश की जनता का अथाह समर्थन हो। 1915 में गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे और कांग्रेस से जुड़ गए थे। भारत का भ्रमण और कांग्रेस की हालत देखकर गांधी समझ गए थे कि कांग्रेस को ब्रिटिश संविधान में आस्था रखने वाले दल से बाहर निकालकर देश के आमजन का दल बनाना होगा।

गांधी ने कांग्रेस के पूरे संगठनात्मक ढांचे, संविधान, उद्देश्य और कार्यशैली को बदला। कांग्रेस को क्रिसमस की छुुट्टियों वाले अभिजात्य वर्ग की बैठकोें से बाहर निकालकर राष्ट्रीय, प्रांतीय, जिला और गांव गांव तक अंतिम मनुष्य से जुड़ने वाला जुझारू संगठन बना दिया। कांग्रेस को ब्रिटिश शासन के सामने रेंगने वाले याचक दल से अंग्रेजो के सामने रीढ़ की हड्डी सीधी रखकर आंख में आंख डालकर बात करने वाले दल में तब्दील कर दिया।

गांधी ने ब्रिटिश शासन से संघर्ष करने के लिए अंहिसा और सत्याग्रह जैसे अचूक हथियारों का प्रयोग किया। नेहरू ने 'डिस्कवरी आफ इंडिया' में लिखा है कि 'ऐसे समय मे जब ब्रिटिश शासन घबराहट, डर, दमन और हिंसा का माहौल बना रहा था, गांधी ने देश को मंत्र दिया डरो मत और डराओ मत। गांधी ने आमजन को बिना किसी डर के अपने विवेक से काम करने को प्रेरित किया।'

गांधी ने अपनी जड़ें भारतीयता में मजबूत की थी। उनका धर्म, समाज, नैतिकता, जीवनमूल्य निपट भारतीय थे। अंतिम व्यक्ति भी गांधी की भाषा, भावनाएं, संदेश समझ सकता था। उसे अपने बीच के व्यक्ति के रूप में पाता था। उनके आत्मीय जुड़ाव महसूस करता था। गांधी की पारदर्शिता असंदिग्ध थी। सब कुछ सार्वजनिक था।

धर्म, नैतिकता, अंहिसा, सत्याग्रह, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य, शांति जैसी पारस्परिक सुधारवादी व नैतिकतावादी धार्मिक शब्दावली का तत्कालीन राजनीति में प्रवेश एक नई घटना थी, जिसे गांधी ने निरंतर विकसित किया, स्थापित किया, जीवन में प्रयुक्त किया। इस शब्दावली में सबकुछ भारतीय था। भारत की पंरपराओं में, इतिहास में, चेतना में उसके विकास में, जड़ों में था। यही कारण था कि तमाम असहमतियों के बाद भी गांधी देश में चुनौती विहीन नेतृत्व करते रहें, क्योंकि देश की आम जनता उनके साथ थी।

गांधी ने देश की आजादी की लड़ाई में सबको जोड़ा और गांधी से पूरा देश जुड़ा। गांधी के साथ देश का सबसे बड़ा समुदाय हिन्दू जुड़ा था। देश का सबसे बड़ा मध्यम वर्ग गांधी के साथ था। जाति व्यवस्था के समर्थक और विरोधी दोनों वर्ग गांधी में अपना हित देखते थे। देश का सबसे दरिद्रतम वर्ग गांधी के साथ सुरक्षित महसूस करता था, क्योकि गांधी उसके जैसा ही जीवन जीते थे। त्यागमय उनका जीवन था। वह आश्रम में रहते थे। उन्होंने समस्त भौतिक सुख साधनों को त्याग दिया था। उनकी प्रार्थना सभाओं में सब धर्मो की प्रार्थना होती थी। अंतत: वे सबके बापू बन गए थे। यह वही भारतीयता थी जिसे गांधी ने समझा और आत्मसात कर लिया।

गांधी के जीवन में धर्म हमेशा केन्द्र में रहा। गांधी का समस्त चिंतन, नीतियां, जीवनशैली धर्म आधारित थे। गांधी का धर्म, सभी धर्मों को जगह देने के बाद भी अपने आधार रूप में एक सनातनी हिंदू का धर्म था। गांधी के जीवन में, राजनीति में और जीवन के हर क्षण में धर्म प्रच्छन्न था। गांधी के जीवन में धर्म विहीन कुछ नहीं था। गांधी का यह धर्म पूरी तरह ईश्वर, आध्यात्मिकता, आत्मा और नैतिकता से परिपूर्ण था।

गांधी में अविश्वसनीय आत्मविश्वास था। इच्छाशक्ति थी, स्वंय को निरंतर परीक्षाओं में ढकलने की, प्रयोग करने की क्षमता थी। गांधी को हम बुद्ध, ईसा, जैन मुनियों आदि की पंरपरा में देख सकते हैं। वह चाहते थे कि जब भारत स्वतंत्र हो तो भारत का हर नागरिक कह सके कि ऐसा होने में उसका भी योगदान शामिल है।

आजादी सबके लिए और सबके प्रयासों से मिली। गांधी विभाजन के समय भी स्वतंत्रता दस साल टालने को तैयार थे, जिससे देश को विभाजन से बचाया जा सके। लेकिन देश का दूसरा कोई नेता इसके लिए तैयार नहीं था। गांधी के अपने नेहरू और पटेल भी साथ नहीं थे। गांधी की इच्छा के खिलाफ कांग्रेस कार्यसमिति ने विभाजन स्वीकार कर लिया।

भारत ने ऐसे गांधी को खो दिया। अब हमें गांधी को फिर से पाना असंभव है। क्योकि गांधी को खोने का मतलब व्यक्ति गांधी नहीं, विचार और भाव का वह संसार था, जिसमें भारतीय अपने होने को फिर से जांच रहे थे, बना रहे थे। गांधी के जाने के बाद देश की जनता अपना वह चेहरा भी खो चुकी है, जिसे गिरमिटिया मजदूर ने सुदूर दक्षिण अफ्रीका में और चंपारण से लेकर बारडोली तक की धूसरित राहों में एक गरीब मुल्क ने पहचानना शुरू किया था।

गांधी हमारे सम्मान, राष्ट्रीय गर्व और गौरव के प्रतीक है। यही कारण है कि जी20 के सफल आयोजन करने वाले प्रधानमंत्री मोदी दुनिया के तमाम राष्ट्राध्यक्ष को राजघाट लेकर जाते हैं और बताते हैं कि हमारे पास गांधी है। गांधी से नफरत करने वाले भी गांधी के सामने सिर झुकाते हैं। यही मोहन दास करमचंद गांधी का करिश्मा है। महात्मा गांधी के उस वाक्य को हमें याद रखना चाहिए कि मृत्यु के मध्य, जीवन कायम रहता है, असत्य के बीच सत्य का अस्तित्व रहता बना रहता है, अंधेरे के बीच प्रकाश बना रहता है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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