G20 Summit: कूटनीतिक जगत का महारथी बनकर उभरा भारत

G20 Summit: जी 20 का ऐतिहासिक आयोजन भारत के लिए कई प्रकार की कूटनीतिक सफलताओं के साथ संपन्न हो गया। नई दिल्ली में आयोजित दो दिवसीय जी20 शिखर सम्मेलन का आयोजन जिस भव्य स्तर पर किया गया था उसकी कूटनीतिक उपलब्धियां भी उससे कमतर नही हैं।

यह वह समय है जब रूस और अमेरिका के संबंध बेहद बुरे दौर में है। चीन की आक्रामक आर्थिक नीति के कारण अमेरिका और भारत दोनों चीन को चुनौती के रूप में देख रहे हैं। तब जी20 के संयुक्त घोषणा पत्र के लिए रूस, अमेरिका, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस का एक साथ आना और 37 पेज के संयुक्त व्यक्तव्य के सभी 87 पैरेग्राफ से सभी का सहमत हो जाना इस बात को दर्शाता है कि भारत ने केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आयोजन करने में ही नहीं, कूटनीतिक स्तर पर भी नई ऊंचाई हासिल कर ली है।

G20 Summit: India emerged as a master of diplomacy

जी20 के 37 पेज के संयुक्त व्यक्तव्य के लिए मोदी की टीम ने कितनी मेहनत की इसे इस बात से समझा जा सकता है कि इसके लिए सभी देशों को सहमत करने के लिए 300 बैठकें और 200 घंटे से ज्यादा बातचीत की गयी। सभी ताकतवर और परस्पर विरोधी देशों को एक एजेंडे में शामिल करने के लिए अतीत के उन मुद्दों को ध्यान से पढ़ा गया जिस पर कभी न कभी विपरीत देश सहमत हुए थे, या उन्होंने कभी सुरक्षा परिषद और मानव अधिकार परिषद में व्यक्तव्य दिए थे। उनके दिए बयानों के आधार पर टीम मोदी ने नई शब्दावली तैयार की।

जी20 की अध्यक्षता कर रहे भारत के सामने चुनौती थी कि पिछले साल बाली में जिन मुद्दों पर सहमति नहीं बन सकी थी या तो उन्हें छोड़ दिया जाए या उन्हें नए सिरे से नई शब्दावली के साथ पेश कर सर्व सहमति बनाई जाए। भारत ने नई शब्दावली का मार्ग चुना और मोदी मैजिक के दम पर भारत के तैयार किए हुए प्रस्ताव को सर्वसहमति से स्वीकार कर लिया गया।

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के न आने से जी20 शिखर सम्मेलन के महत्व को कम करके दिखा रहेे चीन को भारत, यूरोप और मिडिल ईस्ट की इकोनॉमिक कॉरिडोर डील ने तगड़ा जवाब दिया है। चीन लगातार पश्चिमी एशिया में अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। गौरतलब है कि चीन के नेतृत्व में कुछ समय पहले ही सउदी अरब और ईरान के बीच समझौता हुआ था। यह समझौता पश्चिम एशिया में भारत के हित को प्रभावित करने के रूप में देखा जा रहा था। जी20 बैठक में भारत ने मोदी की मौजूदगी में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन और सउदी अरब के क्राउन प्रिंस की गर्मजोशी भरी मुलाकात करवाकर कूटनीतिक बढ़त हासिल कर ली है।

चीन के बढ़ते प्रभाव और दुनिया को उससे मिल रही चुनौती से सामना करने के लिए भारत ने अपनी कूटनीतिक पहल से इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनामिक कॉरिडोर प्रोजेक्ट पर महत्वपूर्ण देशों को शामिल कर एक बड़ी सफलता हासिल की है। भारत, यूएई, सउदी अरब, अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, इटली के साथ यूरोपियन यूनियन के इस प्रोजेक्ट का फायदा इजराइल और जॉर्डन को भी मिलेगा। इस कॉरोडोर के बनने के बाद भारत से यूरोप तक सामान के आवागमन में करीब 40 प्रतिशत समय की बचत होगी। अभी भारत से किसी भी कार्गो को शिपिंग से जर्मनी पहुंचने में 36 दिन लगते हैं। इस रूट के बनने के बाद 14 दिन की बचत होगी। भारत के पहल से बने इस इंडिया- मिडिल ईस्ट- यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर प्रोजेक्ट को चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव प्रोजेक्ट के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।

इस सम्मेलन की सफलता की बात की जाए तो 37 पेज के घोषणा पत्र में 83 पैराग्राफ को पूर्ण रूप से सभी सदस्यों का स्वीकारना एक बड़ी उपलब्धि रही है। इसके अलावा जो बाइडेन, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक और 15 से ज्यादा राष्ट्राध्यक्षों के साथ प्रधानमंत्री मोदी की द्विपक्षीय बातचीत के बाद भारत की आर्थिक स्थिति को गति और रक्षा क्षेत्र में बड़ी डील की संभावना बढ़ गई है। ब्रिटेन से भारत फ्री ट्रेड एग्रीमेंट जल्द से जल्द चाहता है। इस बैठक के बाद उम्मीद है कि भारत ब्रिटेन मुक्त व्यापार समझौते पर नवंबर या दिसंबर तक मुहर लग सकती है।

अफ्रीकी यूनियन को जी20 के स्थायी सदस्य के रूप में शामिल करवाने में भारत के प्रस्ताव को सर्वसम्मति से स्वीकार करवाना भारत की सधी हुई कूटनीति की मिसाल है। अफ्रीकी यूनियन के 55 देश भारत को इस बात का श्रेय दे रहे हैं। चीन अफ्रीकी देशों में जिस तेजी से पैर पसार रहा था, उसे रोकने के लिए भारत ने अफ्रीकन यूनियन को जी20 में शामिल कर चीन को तगड़ा झटका दिया है। हालांकि चीन ने भी भारत के इस प्रस्ताव पर सहमति दर्शाई थी।

मोदी जिन चुनौतियों को दुनिया के लिए सबसे बड़ी समस्या मानते हैं, उन चुनौतियों पर जी20 के देशों को राजी करने पर सफल रहे हैं। मोदी की पहल का परिणाम है कि सभी देश सस्टेनेबल डेवलेपमेंट पर काम करने पर सहमत हो गये। यूएन चार्टर के मुताबिक काम करने तथा पेट्रोल और डीजल पर निर्भरता कम करने के साथ बायोफ्यूल एलांयस बनाने पर भी सहमति बनी, जिसमें भारत, अमेरिका और ब्राजील फाउंडर मेम्बर के रूप में शामिल हुए हैं। सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास के रूप में विकासशील देशों को विकसित देशों के साथ जोड़ने में भारत सफल रहा है।

जी20 के इस शिखर सम्मेलन में भारत की एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक सफलता यह रही कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमिर पुतिन की अनुपस्थिति के बाद भी भारत ने अमेरिका को हावी होने का मौका नहीं दिया और न ही भारत का पलड़ा अमेरिका की और झुका हुआ नजर आया। भारत इस बात को समझता है कि चीन वह देश है जिसके कारण अमेरिका भारत को रिझा रहा है और भारत का सबसे भरोसेमंद दोस्त बताने की कोशिश कर रहा है। आक्रामक चीन अमेरिका और उसके दोस्तों के लिए एक खतरा बन गया है। इसी वजह से अमेरिका को जापान से लेकर ताइवान तक और आस्ट्रेलिया से लेकर दक्षिण कोरिया तक अपने सहयोगी देशों की हिफाजत करने के लिए भारत के सहयोग की जरूरत है। चीन को सबसे बड़ी चुनौती मान रहा अमेरिका यह पक्का करना चाहता है कि चीन को संतुलित करने के लिए एक असरदार देश उसके पास हो जिस वजह से अमेरिका भारत की और देख रहा है।

कूटनीति की भाषा में इसे "कॉस्टली सिग्नलिंग" कहते हैं। भारत भी इस बात को समझता है कि चीन हमारे लिए भी उतनी ही चिंता का विषय है, जितना अमेरिका के लिए। भारत यह भी मानता है कि अमेरिका से उसके रिश्ते जितने करीब होंगे, चीन के खिलाफ उसकी ताकत उतनी ही अधिक होगी। यह हितों का टकराव है जहां भारत बेहद संतुलित होकर चल रहा है। भारत अमेरिका से रिश्ते जरूर बना रहा है लेकिन रूस को भी यह जता रहा है कि भारत के रिश्ते रूस से भी अटूट हैं और अमेरिकी से करीबी का अर्थ रूस से दूरी नहीं है।

बहरहाल वसुधैव कुंटुंबकम् की भावना से एक वर्ष तक जी20 के अध्यक्ष रहे भारत ने अगली अध्यक्षता ब्राजील को सौंप दी है। इस बहाने भारत ने अपनी डेमोक्रेसी, डेमोग्राफी, डेवलपमेंट और डाइवर्सिटी से दुनिया को अवगत करा दिया है। भारत आर्थिक विकास को जीडीपी केन्द्रित बनाने की बजाय मानव केन्द्रित रखने की वकालत कर रहा है।

पिछले साल इंडोनेशिया के बाली में हुए जी20 शिखर सम्मेलन के समापन सत्र में जी20 की अध्यक्षता ग्रहण करते हुए नरेन्द्र मोदी ने विश्व नेताओं से कहा था कि "कोविड के बाद के दौर के लिए नई व्यवस्था बनाने की जिम्मेदारी अब हमारे कंधों पर है। मैं पूरे विश्व को भरोसा दिलाना चाहता हूं कि भारत की जी20 की अध्यक्षता समावेशी, महत्वाकांक्षी, निर्णायक और कार्रवाई उन्मुख होगी। हम साथ मिलकर जी20 को वैश्विक बदलाव का उत्प्रेरक बनाएंगे।" निश्चित रूप से सालभर में मोदी इसमें सफल हुए हैं।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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