Future of Jobs: मनुष्य के रोजगार पर रोबोट का प्रहार
वर्षों से विशेषज्ञ चेतावनियां देते आ रहे हैं कि ऑटोमेशन और रोबोट की वजह से करोड़ों की संख्या में नौकरियां जा सकती हैं। एआई के बढ़ते दखल के बाद अब ये चेतावनियां सच होती नजर आने लगी हैं।

Future of Jobs: मशीनों ने तो दशकों से रोजगारों और नौकरियों का संकट पैदा किया हुआ था। अब इनमें आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस भी जुड़ गया है। जब तक नौकरियां गंवाने का खतरा 'ब्लू कॉलर वर्कर्स' तक सीमित था, इलीट क्लास इसे बहुत हल्के में ले रहा था। पर एआई के बढ़ते प्रभुत्व ने इस खतरे को 'व्हाइट कॉलर जॉब्स' को भी इसकी जद में ला दिया है। इसीलिए प्रबुद्धवर्ग भी चिंतित दिखाई दे रहा है और 'जॉब लास' अब बड़े पैमाने पर चिंता का विषय बन गया है।
नौकरियों का भविष्य
पिछले हफ्ते वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की एक रिपोर्ट आई है, जिसने इस चिंता को और बढ़ा दिया है। चिंता वाजिब भी हैं। 'फ्यूचर ऑफ जॉब्स:2023' शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में बताया गया कि कैसे अगले पाँच सालों में एआई और टेक्नोलॉजी मिलकर लाखों वर्कर्स की नौकरियां खाने जा रहे हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, इस अवधि में लगभग 8.3 करोड़ लोग अपनी नौकरियां गंवा देंगे। इनमें सबसे ज्यादा एडमिन और एग्जीक्यूटिव सेक्रेटरी, कैशियर, डाटा एंट्री और टिकट क्लर्क, डाक सेवा क्लर्क, बैंककर्मी जैसे पदों पर काम कर रहे कर्मचारी होंगे।
नई संभावनाएं हैं, लेकिन आशंकाएं ज्यादा
आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस, मशीन लर्निंग व सस्टेनेबिलिटी स्पेशलिस्ट और बिजनेस इंटेलीजेंस व इन्फॉर्मेशन सिक्योरिटी तथा एनलिस्टों तथा फिनटेक इंजीनियरों के लिए नई-नई संभावनाओं के द्वार भी खुलेंगे और इन क्षेत्रों में नई नौकरियां पैदा होंगी। सतही तौर पर देखने से ऐसा लगता है कि अगर एक तरफ नौकरियां जा रही हैं, तो दूसरी तरफ से आ भी तो रही हैं। लेकिन सच्चाई ऐसी नहीं है। कॉरपोरेट जगत में कोई भी तकनीक तभी अपनी जगह बना पाती है, जब वह उद्योगपतियों के पक्ष में हो, मानव श्रम पर उनकी निर्भरता कम करने में सक्षम हो।
सच यही है कि टेक्नोलॉजी की वजह से नई नौकरियां पाने वालों और गंवाने वालों की संख्या में काफी फर्क होगा। इस संबंध में कुछ साल पहले चीन की एक घटना को याद किया जा सकता है। वहां एक वाहन निर्मात्री कंपनी ने ऑटोमेशन को अपनाया और 49 रोबोट को काम पर रखा। इसकी वजह से दस हजार लोगों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा। यानी एक मशीन ने 200 से ज्यादा इंसानों को बेरोजगार कर दिया। मैनुफैक्चरिंग, आईटी, कृषि और कंसट्रक्शन जैसे क्षेत्रों में रोबोट और ऑटोमेशन का बढ़ता चलन, करोड़ों नौकरियों के लिए खतरा बन चुका है।
इस असंतुलन को इस प्रकार से समझा जा सकता कि एआई के प्रादुर्भाव से मल्टीलिंगुअलिज्म, रीडिंग, राइटिंग व मैथ, सेंसरी प्रोसेसिंग आदि क्षेत्रों में मांग घटने से अगले पांच सालों में 8.3 करोड़ नौकरियां जा सकती हैं। वहीं क्रिएटिव थिंकिंग, एनेलेटिकल थिंकिंग, टेक्नोलॉजिकल लिटरेसी जैसे क्षेत्रों में सिर्फ 6.9 करोड़ नौकरियाँ ही पैदा होंगी। इसका मतलब है कि 1.4 करोड जॉब्स फिर भी नहीं रहने वाले और इसका पूरा श्रेय जाता है एआई को। इन्वेस्टमेंट बैंक गोल्डमैन साक्स की रिपोर्ट का दावा तो यह है कि एआई की वजह की तीस करोड़ नौकरियों पर खतरा मंडरा रहा है। मौजूदा दौर में सर्वाधिक लोकप्रिय एआई प्रोग्राम चैट जीपीटी को बनाने वाली कंपनी ओपेन एआई के सीईओ सैम ऑल्टमैन भी यही चिंता व्यक्त करते हैं कि एआई चैटबोट बहुत सारी मौजूदा नौकरियों को खत्म कर देंगे।
चैट जीपीटी रिप्लेस करेगा बीस जॉब
पिछले महीने रिज्यूमबिल्डर डॉट कॉम नाम की एक वेबसाइट ने एक हजार बिजनेस लीडर्स पर एक सर्वे किया था। इसमें पाया गया कि अमेरिका की आधी से ज्यादा कंपनियों ने अपने कर्मचारियों को एआई से रिप्लेस कर दिया है। चैट जीपीटी का एडवांस्ड वर्जन चैट जीपीटी-4 खुद बड़ी ईमानदारी से बताता है कि कौन-कौन सी जॉब हैं, जिन्हें वह रिप्लेस कर सकता है। इनमें डाटा एंट्री, कस्टमेयर केयर, प्रूफ रीडिंग, ट्रांसलेशन, ट्रैवल एजेंट, ई-मेल मार्केटिंग जैसी बीस जॉब शामिल हैं।
एक ऐसी दुनिया, जहाँ जनसंख्या लगातार बढ़ रही हो और काम के अवसर लगातार घटते जा रहे हों, किस संकट के मुहाने पर आ खड़ी हुई है, अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल नहीं है। आर्थिक विकास का एक सामान्य सा सिद्धांत है। वह यह कि लोग ज्यादा होंगे तो माँग ज्यादा बढ़ेगी। माँग बढ़ेगी तो उत्पादन बढ़ेगा और उत्पादन बढ़ेगा तो अधिक रोजगारों का सृजन होगा। लेकिन इस स्वाभाविक व्यवस्था में मशीनों की घुसपैठ ने उथलपुथल मचा दी है। मशीनें इसलिए आकर्षित करती हैं कि ये समय बचाती हैं, पैसा बचाती हैं, इन्हें लाकर बहुत सारी भावनात्मक, सामाजिक और कानूनी अड़चनों से बचा जा सकता है। दूसरे, इंसानों की तुलना में इनका आउटपुट भी कई गुना ज्यादा होता है।
मशीनों को नहीं है इंसानों की जरूरत
मशीनों के पक्ष में अक्सर एक तर्क दिया जाता है कि इन्हें ऑपरेट करने के लिए, इनके रखरखाव के लिए भी तो लोगों की जरूरत पड़ती है। इसलिए एक मशीन की वजह से जितने रोजगार कम होते हैं, उतने बढ़ते भी हैं। यह तर्क एक छलावे से ज्यादा कुछ नहीं है। अगर ऐसा होता भी है तो यह अनुपात बहुत कम होता है। और अब तो स्वयं ऑपरेट होने वाली, अपना रखरखाव व मरम्मत खुद ही कर लेने में सक्षम मशीनों का दौर है तो यह तर्क भी ज्यादा काम नहीं करेगा।
एआई की बढ़ती लोकप्रियता और स्वीकार्यता अगर किसी बौद्धिक कौशल वाले रोजगारों को कम कर रही है तो ऑटोमेशन ने शारीरिक दम-खम वाले जॉब्स पर ज्यादा असर डाला है। रोबोट में तो दोनों ही चीजें मौजूद हैं। वे सुरंग भी खोद सकते हैं और हजारों किमी लंबे रेल मार्ग की योजना भी तैयार कर सकते हैं।
इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रोबोटिक्स के मुताबिक इस समय दुनिया में तीस लाख से ज्यादा इंडस्ट्रियल रोबोट हैं। इनके अलावा लाखों रोबोट घरों, शॉपिंग मॉल जैसी जगहों पर सहायकों की भूमिका में सेवाएं दे रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि उद्योग ही नहीं बल्कि कृषि जैसे क्षेत्रों में भी परंपरागत श्रमिकों की जगह रोबोट को काम पर रखा जा रहा है।
ब्रिटेन और अमेरिका जैसे देशों में किसान तेजी से उन्हें अपना रहे हैं। अनुमान है कि वर्ष 2025 तक 20 प्रतिशत फसलों का उत्पादन ऑटोमेटेड हो जाएगा। ऑटोमेशन की बढ़ती लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले साल रोबोट के ऑर्डरों में 50 फीसदी की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई। एसोसिशन फॉर एडवांसिंग ऑटोमेशन के अनुसार रोबोट इंडस्ट्री का बाजार अभी लगभग साढ़े बारह हजार करोड़ रुपए का हो चुका है।
भारतीयों के लिए है धीमी गति
एक वेबसाइट है, विल रोबोट्स टेक माई जॉब डॉट कॉम। आप इस वेबसाइट पर विजिट करेंगे तो आपको रीयल टाइम डाटा मिलेगा। इससे आपको पता चलेगा कि एआई, ऑटोमेशन और रोबोट की वजह से किस सेक्टर की नौकरियों पर कितना खतरा है। हालांकि, ऑटोमेशन को अपनाने की इस दौड़ में भारत अभी काफी पीछे नजर आता है। सालाना इंस्टालेशन की दृष्टि से देखें तो वर्ष 2020 तक चीन , जापान, अमेरिका, कोरिया व जर्मनी जैसे देशों में इंडस्ट्रियल रोबोट की संख्या हमारी तुलना में पांच से पैंतीस गुना ज्यादा है। लेकिन अभी भी हम इस मामले में दुनिया के शीर्ष दस 10 देशों में शामिल हैं। ऑटोमेशन इंडस्ट्री के विकास के साथ-साथ हम भी तरक्की कर रहे हैं। वर्ल्ड रोबोटिक्स रिपोर्ट-2020 के मुताबिक भारत में साल 2020 की शुरुआत तक, 26,000 इंडस्ट्रियल रोबोट इन्स्टॉल किए जा चुके थे। वर्ष 2025 तक यह संख्या दोगुनी हो जाने का अनुमान है।
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देखने में यह रफ्तार धीमी जरूर है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि हमें निश्चिंत होकर बैठ जाना चाहिए। बेहतर है कि हमें जो यह अतिरिक्त समय मिला है, हम इसका उपयोग खुद को भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार करने में करें। इस दौरान हम वे स्किल्स सीखें, जिनकी हमें आगे चलकर आवश्यकता पड़ने वाली है। यह जरूरी है। क्योंकि हमारा मुकाबला मशीनों से होने वाला है, जिनमें भावनाएं नहीं होती, और न ही पीछे हटने की प्रवृत्ति।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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