Farm Crisis: कैसे दूर होगा किसानों का संकट?
किसानों का संकट अगर उनकी कम आय है तो उन्हें बताया जाता है कि अधिक उत्पादन करके वो अपनी आय बढ़ा सकते हैं। लेकिन अधिक उत्पादन होते ही कीमतें गिर जाती हैं तो फिर किसानों का संकट कैसे दूर होगा?

देश में जब भी खेती किसानी पर बात होती है तो सारी बातचीत किसानों की आर्थिक स्थिति के इर्द-गिर्द ही सिमट कर रह जाती है। किसानों को अधिक आमदनी का यह विमर्श कृषि संबंधित नीति निर्माताओं के भीतर ऐसा घर कर चुका है कि कृषि को टिकाऊ बनाने की फिक्र से लगभग सभी ने अपना अपना पल्ला झाड़ लिया है। स्वस्थ जीवन के लिए मिलेट्स का प्रयोग बढ़ाने के नारे के साथ फसलों की विविधता की बात हो रही है लेकिन ऐसी फसलों के लिए कीमतों के बारे में कोई वाजिब रास्ता नहीं तैयार किया जाता। सरप्लस उत्पादन होते ही बाजार धराशाई हो जाता है और कीमतों पर नियंत्रण खो देता है। इसका सीधा खामियाजा किसानों को उठाना पड़ता है।
अभी देश में 'फार्म टु फॉर्क' यानी की 'खेत से चम्मच तक' की चर्चा खूब हो रही है। इस नीति के तहत सभी के लिए स्वस्थ भोजन की प्रचुर आपूर्ति सुनिश्चित करने की बात कही जा रही है। बताया जा रहा है कि कैसे आपूर्ति श्रृंखला में सुधार लाकर सभी की थाली तक अनाज के साथ-साथ फल, सब्जियां पहुंचाई जा सकती है। मगर किसान जिस संकट से जूझ रहे हैं उसे देखते हुए हम इसे 'फार्म टु फ्लॉप' ही कह सकते हैं। क्योंकि अच्छी फसल के लिए किसानों ने जिस स्तर का पसीना बहाया, उन्हें उनकी मेहनत का फल बंपर पैदावार के रूप में तो मिला लेकिन जब वे उन फसलों को लेकर मंडी पहुंच रहे हैं तो उन्हें दाम नहीं मिल रहा है।
भारत में कृषि और किसानों की स्थिति अन्य देशों की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण है। भारत के किसानों ने अपने श्रम बल से प्रमुख रूप से गेहूं और चावल में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने, कठिन वक्त के लिए अनाजों का पर्याप्त भंडार उपलब्ध करवाने और अर्थव्यवस्था में मंदी के समय में भी सामान्य कृषि उत्पादन बनाए रखने में सफलता प्राप्त की है। इससे हमारी अर्थव्यवस्था, आत्मनिर्भरता और खाद्य सुरक्षा को बहुत अधिक बल मिला है। इसके बावजूद किसानों का संकट गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है। कीमतों की अनिश्चितता आदि की तस्वीर निराशा को जन्म देने वाली ही है। कीमतों की अव्यवस्था से किसानों की आजीविका प्रभावित होती है। तमाम आर्थिक पंडित महंगाई की खूब चर्चा करते हैं पर किसानों की रोजी रोटी से जुड़े इस मुद्दे पर चुप्पी साध लेते हैं।
कृषि के तौर-तरीकों को लेकर बदलाव की बात भी अक्सर होती रहती है। बीते वर्षो में केंद्र की सरकार ने कृषि को ठीक करने की गरज से नए कृषि कानूनों का प्रारूप पेश किया था हालांकि किसानों के विरोध के कारण उसे वापस लेना पड़ा था। लेकिन आज सबसे जरूरी सवाल है कि कृषि में किस तरह के बदलाव वास्तव में बहुत ही आवश्यक है। दुनिया के पैमाने पर देखें तो हाल के वर्षों में मौजूदा कृषि तकनीकों से जुड़े पर्यावरण विनाश पर चिंता बढ़ गई है। रासायनिक खाद और कीटनाशक रसायनों से मिट्टी के उपजाऊपन पर प्रतिकूल असर पड़ा है। किसानों के मित्र सूक्ष्मजीव, केंचुए आदि तेजी से कम हुए हैं और खाद्य चक्र में विषैलापन बढ़ा है। वैज्ञानिकों के मुताबिक नाइट्रोजन और फास्फोरस का चक्र खतरनाक हद से बाहर जा रहा है। इसके अतिरिक्त भूजल की कमी और गांव के जल स्रोत भी अत्यधिक प्रदूषित हुए हैं। अनुचित किस्म के मशीनीकरण और अनुचित फसल चक्र के कारण प्रदूषण की समस्या खतरनाक स्तर पर बढ़ी है। जलवायु के बदलाव में भी इनका योगदान बढ़ा है। इस समस्या की गंभीरता को समझते हुए ही कृषि के जानकारों ने सुधार की मांग की है, जिनसे पर्यावरण रक्षा और किसानों के आर्थिक संकट को दूर करने के उद्देश्य एक साथ प्राप्त किए जा सकें।
अनेक स्थानों पर इस बदलाव के बेहतर प्रयोग हुए हैं। किसानों के अनावश्यक खर्चों को कम किया गया है और साथ में पर्यावरण रक्षा के उद्देश्य भी प्राप्त किए गए हैं।उदाहरण के लिए क्यूबा में वर्ष 1988 की तुलना में वर्ष 2022 में सब्जियों का उत्पादन 142% रहा जबकि कृषि रसायनों की खपत में 70% की कमी लाई जा सकी।भारत के कई हिस्सों में भी छोटे स्तर पर इस तरह के प्रयोग देखे गए, जहां रासायनिक खाद और कीट खरपतवार नाशक रसायनों का कम से कम उपयोग करते हुए अधिक से अधिक उत्पादन प्राप्त किया गया। इसे गति मोड में बढ़ावा देने की जरूरत है, क्योंकि यह तय है कि अगर ऐसा होता है तो इस कृषि में खर्च भी कम होगा, उत्पादन बढ़ेगा तो अपने आप किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार होगा।साथ ही रासायनिक खाद और कीट खरपतवार नाशक का उपयोग कम होने से पर्यावरण में सुधार होगा, भूमि का प्राकृतिक उपजाऊपन बढ़ेगा और देश में टिकाऊ कृषि विकास की बुनियाद मजबूत होगी।
फसल चक्र, मिश्रित खेती पशुपालन और कृषि के लिए स्थानीय अवशेषों से खाद निर्माण ऐसे तरीके हैं जो स्थानीय पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बगैर खेती को लाभ दायक बनाने में मदद देते हैं।ऐसे ही प्राकृतिक प्रक्रियाओं द्वारा हानिकारक कीड़ों और जंतुओं को दूर करने का इंतजाम किया जाता है। इसमें मेहनत, समझ और रचनात्मकता अधिक है, पर खर्चा बहुत ही कम। क्योंकि भारत के किसानों की जोत छोटी है, वैसे में इस तरह की एग्रो इकोलॉजी छोटे किसानों, और महिलाओं के अधिक अनुकूल होती है।यह सोच छोटे किसानों के लिए अनुकूल है। यदि भूमिहीनों को थोड़ी सी भी भूमि मिलेगी तो वे इस तरह की खेती से अपनी खाद्य सुरक्षा के लिए बहुत अच्छे परिणाम प्राप्त कर सकते हैं।
वर्ष 2014 में राजग की सरकार जब केंद्र की सत्ता में आयी थी, तब किसानों को उससे भारी उम्मीद थी। उन्हें लग रहा था कि उनकी अनेक समस्याओं का शीघ्र समाधान हो जाएगा। सरकार का नारा भी था कि सन 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी हो जाएगी। सरकार ने इस बाबत कोशिश भी की। बिचौलियों से छुटकारे के लिए नए कृषि कानून पेश किए गए। पहले किसान संगठनों के भारी विरोध और फिर दुनिया भर में आई करोना महामारी के कारण लक्ष्य हासिल करने में बाधा उत्पन्न हुई।
अधिक उत्पादन और अधिक कमाई की होड़ में किसानों ने खूब उपज पैदा की लेकिन अब आलम यह है कि कीमत न मिलने के कारण किसान अपनी पैदावार को सड़कों पर फेंक रहे हैं। पश्चिम बंगाल से लेकर पंजाब तक खेती का जो रकबा है उसमें आलू के किसानों की कमोबेश यही स्थिति है। टमाटर, प्याज के साथ-साथ बैंगन, गोभी, धनिया जैसी तमाम फसलों के किसान भी बेहाल हैं। बाजार में उन्हें किसी न किसी कारण से कीमत नहीं मिल रही है।
ऐसे में हमें किसानों की आय बढ़ाने के मामले पर एक बार ठहर कर सोचना चाहिए तथा इससे भी बड़े विषय कृषि को टिकाऊ बनाने के बारे में गंभीरता से विचार करना चाहिए। सनातन काल से चली आ रही पारंपरिक कृषि प्रणाली को अपनाकर ही जल, जमीन और जीवन को सुरक्षित रखते हुए हम किसानों को आर्थिक रूप से समृद्ध भी बना पाएंगे।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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