Congress: चिदंबरम की खरी बात से कितनी सहमत है कांग्रेस?
साल 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद हुए अधिकांश चुनावों में कांग्रेस को हार का मुंह देखना पड़ा है, लेकिन मजाल है कि उसके जिम्मेदार नेताओं ने कभी अपनी कमजोरी और गलतियों को स्वीकार किया हो। ऐसे में पार्टी के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम का खुले तौर पर यह स्वीकार करना कि 2024 की चुनावी हवा भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में है, मामूली बात नहीं है। चिदंबरम की यह स्वीकारोक्ति इस बात का प्रतीक है कि कांग्रेस के जिम्मेदार नेता अपनी कमियों को कम से कम खुले तौर पर स्वीकार करने लगे हैं। ऐसे में उसके समर्थकों की ओर से यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या पार्टी अपनी असल कमियों की ओर ध्यान देगी और अपनी खोई हुई राजनीतिक प्रतिष्ठा हासिल करने की गंभीरता से कोशिश करेगी?

भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में नरेंद्र मोदी के उभार और उसके बुनियादी आधार को कांग्रेसी नेतृत्व ने कभी स्वीकार नहीं किया। आज का दलीय तंत्र जिस तरह विकसित हुआ है, उसमें नेतृत्व की बात को जमीनी स्तर तक के कार्यकर्ता के लिए आंख मूंदकर भरोसा करना राजनीतिक मजबूरी है। कई बार जमीनी स्तर के कार्यकर्ता और मंझला-निचला नेतृत्व तक आलाकमान की सोच से सहमत नहीं भी होता तो दलीय अनुशासन के नाम पर उसे आलाकमान की गलत और आसमानी सोच को ही स्वीकार करना पड़ता है। ऐसे में कभी जमीनी राजनीतिक हकीकत का तथ्य कम से कम खुले तौर पर सामने आ ही नहीं पाता। इन्हीं संदर्भों में चिंदबरम की स्वीकारोक्ति गंभीर और महत्वपूर्ण हो जाती है।
याद कीजिए, साल 2013 में दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में हुए कांग्रेस महाधिवेशन को। तब पार्टी केंद्र की सत्ता में थी। तब भारतीय राजनीतिक क्षितिज पर कांग्रेस को चुनौती के रूप में नरेंद्र मोदी उभर रहे थे। इसे लेकर जब कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर से पूछा गया तो उन्होंने मोदी की हैसियत और भावी चुनौती को ना सिर्फ नकार दिया, बल्कि उन्हें तालकटोरा के बाहर चाय का ठेला लगाने के लिए जगह देने का ऐलान कर दिया। लेकिन करीब छह महीने बाद हुए आम चुनाव के नतीजों ने बता दिया कि विदेश सेवा के अधिकारी रहे मणिशंकर अय्यर की सोच और उनका आकलन कितने हवा हवाई थे।
लगातार दो संसदीय चुनावों में बड़ी हार के बावजूद कांग्रेस नेतृत्व ने मोदी को चुनौती रूप में स्वीकार ही नहीं किया। भाजपा की जीत के खिलाफ कांग्रेस अपनी पारंपरिक और घिसीपिटी सोच के मुताबिक नैरेटिव गढ़ती रही। हिंदू बनाम मुसलमान का हौव्वा खड़ा करती रही, सांप्रदायिकता के पुराने सवाल को काठ की हांड़ी की तरह लगातार बार-बार सियासी आंच पर चढ़ाती रही। लेकिन वह जमीनी हकीकत से दूर भागती रही। इसका उसे कभी-कभी फायदा भी मिला। 2018 में उसे मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में जीत मिली तो 2023 में कर्नाटक और हिमाचल में। इसके अलावा उसे कभी कोई बड़ी चुनावी जीत नहीं मिली। फिर भी कांग्रेस आलाकमान की केंद्रीय धुरी राहुल गांधी और प्रियंका गांधी सिर्फ नैरेटिव की लड़ाई लड़ते रहे। उनके प्रवक्ता गलाफाड़ प्रतियोगितायों में शामिल होते हुए नैरेटिव के ही तर्क गढ़ते रहे।
दिल्ली के अभिजात्य इलाके में रहने वाले मीडिया कर्मियों, प्रोफेसरों और अतीत में सत्ता पोषित रहे बुद्धिजीवियों का एक वर्ग कांग्रेस आलाकमान के नैरेटिव केंद्रित विचारों को 'भारत के विचार' के तौर पर प्रचारित करता रहा। कांग्रेसी इकोसिस्टम इस आभासी कोलाहल को भारतीय जनता का बुनियादी विचार मानता रहा। जमीनी राजनीतिक हकीकत से यह सोच जितनी दूर है, कांग्रेस के लिए चुनावी जीत उतनी ही दूर होती रही।
कांग्रेसी इकोसिस्टम चुनावी जीत को लेकर जो माहौल बनाता है, उसका केंद्र महानगरों के वे अभिजात्य इलाके होते हैं, जिसके हर पोर से समृद्धि चू रही होती है। लेकिन उसकी परिधि कुछ किलोमीटर तक ही होती है। इकोसिस्टम के इस छद्म वाले कोलाहल में कांग्रेसी तंत्र यह भूल जाता है कि भारत बहुत विशाल है। तमाम तरह की सोच, पहनावे और खानपान, माहौल और मिजाज वाला देश भला अभिजात्य की सोच को ही क्यों आत्मसात करेगा।
जबकि भारतीय जनता पार्टी इसके ठीक उलट जमीनी हकीकत की बुनियाद पर चुनाव लड़ती है। वह स्थानीय स्तर पर स्थानीय मुद्दों और सोच के लिहाज से रणनीति बनाती है, जनता को लुभाने की कोशिश करती है। बेशक उसकी यह रणनीति दक्षिण भारत के चार राज्यों आंध्र, तेलंगाना, तमिलनाडु और केरल में अपना असर नहीं दिखा पा रही है। फिर भी भाजपा ने अपनी उम्मीद नहीं खोई है। काशी को तमिलनाडु से जोड़ने जैसे विचार स्थानीयता की बुनियाद पर अपने सियासी पांव बढ़ाने की इसी सोच और कोशिश का नतीजा है। फिर भी वह अपना हर चुनाव युद्धस्तर पर लड़ती है। शायद यही वजह है कि अब चिदंबरम भी स्वीकार करने लगे हैं कि भारतीय जनता पार्टी अपना हर चुनाव उसे आखिरी मानकर लड़ती है।
कांग्रेसी इकोसिस्टम के कोलाहल से उपजा विजय का छद्म कांग्रेसी नेतृत्व की दृष्टि को किस कदर कमजोर कर देता है, इसका उदाहरण बीते विधानसभा चुनाव हैं। इसी कोलाहल के चलते पार्टी और उसका आलाकमान इतने अहंकार में रहा कि उसने उस इंडी गठबंधन के दलों के साथ प्रतीकात्मक ही सही, सीटों का बंटवारा करने में दिलचस्पी नहीं दिखाई, जिसका अगुआ होने का वह खुद को स्वाभाविक दावेदार मानती है।
मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में समाजवादी पार्टी समेत दूसरे दलों से उसका प्रतीकात्मक गठबंधन चुनाव के आखिरी दौर तक अनिर्णय की स्थिति में रहने वाले मतदाताओं के एक हिस्से को लुभा सकता था। लेकिन जब चुनाव नतीजे पक्ष में नहीं आए तो पार्टी को शायद अपनी भूल का अहसास हुआ और इंडी गठबंधन की फौरन बैठक बुला डाली। यह बात और है कि तब ममता बनर्जी, नीतीश कुमार और अखिलेश यादव जैसे अपने-अपने क्षेत्रों के कद्दावर नेताओं ने कांग्रेस को ही एक तरह से औकात बता दी और बैठक को 19 दिसंबर तक के लिए टालना पड़ा।
चिदंबरम ने यह भी स्वीकार किया है कि विपक्ष समेत कांग्रेस को बीजेपी की ताकत को समझना होगा। उसको उसी की भाषा में मुद्दों की बुनियाद पर आक्रामक जवाब देना होगा। भाजपा की ही तरह रणनीतिक तौर पर चुनावी मैदान में उतरना होगा। पूरी तैयारी करनी होगी। चिदंबरम की इस स्वीकारोक्ति का एक मतलब यह भी है कि कांग्रेस को अब यह मानकर चलने वाली सोच से आगे बढ़ना होगा कि सांप्रदायिकता के खिलाफ देश की जनता उठ खड़ी होगी और उसे जिता देगी। कांग्रेस को यह भी मानना होगा कि नरेंद्र मोदी की भाजपा अतीत की भाजपा से कहीं आगे निकल गई है।
सांप्रदायिकता के ही इर्द-गिर्द उसकी ताकत को बांधने या आंकने की भूल नहीं करनी चाहिए। लेकिन लाख टके का सवाल है कि क्या कांग्रेस अपने इस अनुभवी नेता की सोच के अनुरूप आगे बढ़ने और हकीकत के कठोर धरातल पर असल मुद्दों पर आगे बढ़ने की कोशिश करेगी?
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