Desertification: धरती पर बढ़ता जा रहा है मरुभूमि का दायरा
Desertification:धरती धीरे धीरे क्रमिक रुप से मरुभूमि या रेगिस्तान में परिवर्तित होती जा रही है। धरती पर मिट्टी का नष्ट होना और मरुभूमि का बढ़ते जाना निरंतर जारी है। इसे रोकने के लिए वैश्विक स्तर पर प्रयास किये जा रहे हैं लेकिन प्रभाव उतना नहीं है जितना आवश्यक है। अरब, चीन, अफ्रीका और भारत में भी मरुभूमि को हरिभूमि में बदलने के प्रयास हो रहे हैं। लेकिन भारत जैसे देश में ये प्रयास वास्तविक न होकर सरकारी खानापूर्ति जैसे ही हो गये हैं।
धरती पर बढ़ते मरुक्षेत्र की समस्या पर 1977 में पहली बार नैरोबी में चर्चा की गई थी। इस आयोजन का नेतृत्व संयुक्त राष्ट्र कर रहा था। उसकी ओर से बढ़ते रेगिस्तान की समस्या से निपटने के लिए लगातार कई तरह के कार्यक्रम चलाए जाते रहे हैं। बावजूद इसके हम आज भी मिट्टी के क्षरण को रोकने में कामयाब नहीं हो पाये हैं। बढ़ता रेगिस्तान एक बड़ी समस्या बनकर आज भी हमारे सामने है।

चीन में आयोजित सीओपी-13 में कहा गया था कि पृथ्वी शिखर सम्मेलन के 25 वर्षों के बाद भी मरुस्थलीकरण दुनिया भर के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। पृथ्वी सम्मेलन 3 जून से 14 जून 1992 तक रियो डी जनेरियो (ब्राज़ील) में आयोजित किया गया था। पृथ्वी सम्मेलन में वैश्विक जलवायु परिवर्तन और जैविक विविधता की रक्षा के लिए एक संधि पर सहमति बनी जिसे 'युनाइटेड नेशन्स फ़्रेमवर्क कन्वेन्शन ऑन क्लाइमेट चेंज' या यूएनएफसीसीसी कहते हैं।
मरुस्थलीकरण का बढ़ता प्रभाव
चिंता की बात यह है कि दुनिया के 33 फीसदी भू-भाग में रहने वाले 3.2 अरब लोग मरुस्थलीकरण से प्रभावित हैं। अकेले भारत की बात करें तो थार रेगिस्तान कुल 2 लाख 38 हजार 254 वर्ग किलोमीटर से अधिक का क्षेत्र कवर करता है। यह रेगिस्तान भारत- पाकिस्तान के बीच एक प्राकृतिक सीमा बनाता है। थार रेगिस्तान समूचे भारत में करीब पौने दो लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में राजस्थान, गुजरात, पंजाब व हरियाणा तक में फैला हुआ है। भारत के उत्तर पश्चिमी हिस्से में मरुस्थलीकरण की समस्या अधिक गंभीर है, जिसमें भारत की सीमा में आने वाला थार रेगिस्तान भी आता है। आज के समय में पूरी दुनिया के लिए रेगिस्तान का बढ़ता क्षेत्रफल एक बड़ी चुनौती बन गया है। उसे रोकने के लिए रेत से प्रभावित सभी देश एक हो रहे हैं। निजी और सामूहिक प्रयासों से कई तरह की योजनाएं बन रही हैं।
इसरो द्वारा 2016 में प्रकाशित एटलस के अनुसार, मरुस्थलीकरण के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार जल क्षरण (10.98 फीसदी क्षेत्र में) है। इसके बाद वनस्पति क्षरण (9.91 प्रतिशत क्षेत्र में) है। फिर वायु क्षरण (5.55 प्रतिशत क्षेत्र में), बंजर और चट्टानी भूमि (2.07 प्रतिशत), लवणता (1.12 प्रतिशत) और अन्य कारणों जैसे जलभराव, अत्यधिक पाला, लोगों का दखल जैसी वजहें भी इसके लिए जिम्मेदार हैं।
भारत ने 2005 से 2015 के बीच में घास के क्षेत्र का 31 प्रतिशत हिस्सा खो दिया है। हमारी सामुदायिक भूमि और चारागाह कम हुए हैं। दूसरे शब्दों में 2005 से 2015 के दौरान घास के इन मैदानों का 56.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र घट गया है, जो चिंता की बात है। यह आंकड़े वर्ष 2019 में संयुक्त राष्ट्र के कॉन्फ्रेंस ऑफ द पार्टीज यानी कॉप के 14वें अधिवेशन (कॉप-14) में संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन टू कॉम्बैट डेजर्टिफिकेशन (यूएनसीसीडी) के समक्ष प्रस्तुत किये गए हैं। करीब 29 प्रतिशत क्षेत्र में किसी न किसी तरह से भूमि की गुणवत्ता खराब हो रही है। एक तरफ चारागाह कम हुए, वहीं दूसरी तरफ खेती की भूमि में वृद्धि हुई है लेकिन इस वृद्धि और कमी में असंतुलन की स्थिति का खतरा है।
जनसहभागिता से सार्थक प्रयास
रेगिस्तान का विस्तार और न हो इसके लिए हर बार सरकारी स्तर पर कई योजनाएं बनती रही हैं। लेकिन बड़ी समस्या यह है कि एक तरफ हम रेगिस्तान को रोकने का प्रयास कर रहे हैं और वहीं दूसरी तरफ रेगिस्तान के विस्तार के लिए अनुकूल वातावरण भी बना रहे हैं। मरुस्थलीय क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों को पुन: जीवित कर मरुस्थल विकास कार्यक्रम (1977-1978) पर कार्य करने की आवश्यकता है। यह कार्यक्रम केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय कृषि आयोग की सिफारिशों के बाद शुरू किया गया था। इसके अन्तर्गत प्रतिकूल जलवायु परिस्थितियों के प्रभाव को कम करने के लिए प्राकृतिक संसाधनों की मदद से पारिस्थितिक संतुलन बहाल करने की दिशा में कार्य किया जाता है। अफ्रीकी यूनियन के ग्रेट ग्रीन वॉल कार्यक्रम को भी इन्हीं प्रयासों का हिस्सा कहा जा सकता है।
धरती पर बढ़ते रेत के क्षेत्रफल को नियंत्रित करने के लिए जमीन क्षरण रोकने के प्रयासों के साथ-साथ आमजन की सहभागिता से बड़े स्तर पर पौधारोपण करना होगा। इससे न केवल वन क्षेत्र संरक्षित होगा, बल्कि नए वन क्षेत्र भी तैयार होंगे। कृषि में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल भी फलदायी साबित होगा, क्योंकि जब जैविक उर्वरकों का उपयोग होगा और कम जल से खेती होगी, तो मिट्टी की उर्वरता भी बढ़ेगी। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यही है कि जनसहभागिता से सार्थक प्रयास करने से ही मरुस्थल का फैलाव रोका जा सकता है। सारी बातों को देखते समझते यही लगता है कि इस समय सबसे बड़ी जरूरत जल संरक्षण की है। साथ ही हमें अपनी खेती में सिंचाई की विधियों में भी सुधार करना होगा। इसके अलावा पारिस्थितिकी तंत्र को पुन: मजबूत करने की दिशा में भी काम करने की आवश्यकता है।
समाधान की राह
रेगिस्तान के बढ़ते दायरे को रोकने के लिए जमीन क्षरण से निपटने के प्रयासों में खेती एक महत्वपूर्ण उपाय है। रेत में खेती को लेकर संयुक्त राष्ट्र मदद कर रहा है। भारत को समझना होगा कि समाज की सहभागिता से बड़े स्तर पर देशभर में पौधारोपण करने की तैयारी का समय आ गया है। अभी यह एक रास्ता है मरू होती भूमि को बचाने का। इससे न केवल वन क्षेत्र संरक्षित होगा, बल्कि नए वन क्षेत्र भी तैयार होंगे। पानी के कम इस्तेमाल वाली कृषि के आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल को भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, क्योंकि जब जैविक उर्वरकों का उपयोग होगा और कम जल से खेती होगी, तो मिट्टी की उर्वरता भी बढ़ेगी। धरती पर बढ़ रहे रेगिस्तान की बड़ी वजह यह रही कि समय के साथ जलवायु में बदलाव की वजह से बारिश कम होनी शुरू हुई और पानी की कमी से वनस्पति तथा जीव लुप्त होने लगे। जिन क्षेत्रों ऐसी परिस्थितियां बनी, वहां की जमीन मरुस्थल में तब्दील हो गई।
भारत जैसे देश के लिए तो यह जरूरी है कि ग्रामीण क्षेत्रों में सुनियोजित रोजगार के अवसर विकसित हों तथा सरकारी भूमि में खनन पर रोक लगाई जाए। इसकी बड़ी वजह है अवैध खनन। जो वर्षा का पानी हमारे प्राकृतिक व परंपरागत जल स्रोतों को भरा करता था, वह गैरकानूनी खनन से जल स्रोतों के केचमेंट एरिया को समाप्त कर देता है। भूमिगत जल का स्तर लगातार कम होने का बड़ा कारण भी यही है।
उम्मीद कायम है
संयुक्त राष्ट्र कन्वेन्शन टू कॉम्बैट डेजर्टिफिकेशन (यूएनसीसीडी) के 'कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज़' (COP) के पंद्रहवें सत्र को संबोधित करते हुए पिछले साल केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेन्द्र यादव ने 'कोट डी आइवर' (अफ्रीका) में कहा- भारत ने 2030 तक 26 मिलियन हेक्टेयर खराब भूमि को बहाल करने की अपनी प्रतिबद्धता में महत्वपूर्ण प्रगति की है। पूरे देश में लागू किए गए मृदा स्वास्थ्य कार्ड कार्यक्रम के माध्यम से अपनी मिट्टी के स्वास्थ्य की निगरानी में वृद्धि की है। 2015 और 2019 के बीच किसानों को 229 मिलियन से अधिक मृदा स्वास्थ्य कार्ड जारी किए गए हैं और इस कार्यक्रम से रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में 8-10% की गिरावट आई है और उत्पादकता में 5-6% की वृद्धि हुई है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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