Caste Census: जातिवादी राजनीति को जिन्दा करने की जद्दोजहद

बिहार में जाति जनगणना की स्वीकृति के बाद दूसरे कई राज्यों में जातीय जनगणना की मांग उठने लगी है। भाजपा के कुछ पिछड़े वर्ग के नेता भी इसके समर्थन में है। फिलहाल, भाजपा का शीर्ष नेतृत्व इस पर अनिर्णय की स्थिति में है।

demand for caste census in other states after bihar acceptance for this

Caste Census: मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार ने बिहार में जाति गणना की कवायद शुरू करने के साथ ही अब भाजपा शासित राज्यों में भी जाति गणना की मांग विपक्ष ने शुरू कर दी है। भाजपा में जाति की राजनीति करने वाले नेता भी जाति जनगणना का समर्थन कर रहे है और केन्द्रीय नेताओं पर दबाव बना रहे है कि भाजपा शासित राज्यों में भी जाति जनगणना की जाए। महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे भाजपा शासित राज्यो में भी ऐसी ही कवायद करने की लंबे वक्त से चली आ रही मांग को फिर से जिंदा किया गया है और भाजपा के पिछड़े जाति के नेताओं का इनको भरपूर समर्थन मिल रहा है।

2005 में जब नीतीश कुमार पहली बार सत्ता में आए थे, तो अक्सर कहा करते थे कि वह जमात (आम जनता) की राजनीति में विश्वास करते है, जात की नहीं। लेकिन उनके वोट बैक में भाजपा के सेंध लगाने के कारण पिछले साल तीन सीटों कुढ़नी, गोपालगंज और मोकामा पर हुई हार से नीतीश कुमार को समझ आ गया कि अत्यंत पिछड़ी, कुर्मी और कुशवाह जातियों ने उनका साथ छोड़ना शुरू कर दिया है। इस कारण नीतीश जाति पर जोर देकर मंडल की राजनीति को फिर से जिंदा करना चाहते हैं ताकि उनके वोटबैंक के भगवाकरण को रोका जा सके।

बिहार में जाति जनगणना का मुद्दा हर चुनाव के पहले उभरता रहा है। इसी कड़ी में वर्ष 2021 में नीतीश के नेतृत्व में एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल ने देश भर में जाति जनगणना करवाने की मांग को लेकर प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात की थी। लेकिन केंद्र की असहमति के बाद बिहार सरकार ने अपने स्तर पर राज्य में जाति गणना करवाने की घोषणा की। लोकसभा चुनाव में 400 दिनों से भी कम का वक्त बचा है ऐसे में इसे पूरे देश में लागू करने की मांग जोर पकड़ रही है।

महाराष्ट्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस के दिग्गज नेता छगन भुजबल ने मुख्यमंत्री शिंदे को पत्र लिखकर बिहार की तर्ज पर राज्य में ओबीसी की गिनती के लिए जाति जनगणना करवाने की मांग की है। महाराष्ट्र में शरद पवार, कांग्रेस अध्यक्ष नाना पटोले और बाबा साहेब अंबेडकर के पड़पोते तथा वंचित बहुजन अघाडी के प्रमुख प्रकाश अंबेडकर ने भी जाति गणना की मांग का समर्थन किया है। महाराष्ट्र की राजनीति पर हालांकि मराठों का दबदबा है, पर तमाम धर्मों, वर्गों, और जातियों में फैले ओबीसी को सबसे बड़ा सामाजिक धड़ा माना जाता है जो कुल आबादी का करीब 53 प्रतिशत है।

इस वक्त बिहार सरकार के अलावा महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिशा, झारखंड, केरल और तमिलनाडु आदि राज्यों में जाति जनगणना की मांग की जा रही है। महाराष्ट्र की तरफ से पिछले साल सुप्रीम कोर्ट में जाति जनगणना को लेकर याचिका भी दायर की गई थी। इसके जवाब में हलफनामा दायर करते हुए केंद्र ने कहा था कि पिछड़ों की जातिगत जनगणना कराना प्रशासनिक रूप से काफी जटिल काम है और पहले भी जब जातियों की गिनती हुई तो उसकी सत्यता को लेकर कई सवाल उठे हैं। केंद्र सरकार की तरफ से यह तर्क भी दिया जाता है कि 2011 के सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण में देश में जातियों-उपजातियों, कुलनामों आदि की संख्या 46 लाख के पार चली गई थी, ऐसे में जनगणना में इतनी जातियों को शामिल करना तकनीकी तौर पर मुश्किल होगा।

समाजशास्त्रियों का मानना है कि जाति गणना के माध्यम से समाज के वंचित तबकों की वास्तविक संख्या पता लगने से सरकार और नीति-निर्धारकों को उनके लिए कल्याणकारी योजनाएं बनाने में अवश्य मदद मिलती है, बशर्ते इसे सिर्फ राजनीतिक गोलबंदी के लिए न किया जा रहा हो।

बहरहाल, केन्द्र सरकार जाति जनगणना को लंबे समय तक रोक नहीं सकती। केन्द्र सरकार जानती है कि यह एक ऐसी आग है जिसके लगने पर बुझाना आसान नहीं होगा। इस कारण केन्द्र सरकार इस पर संभल कर चल रही है लेकिन 2024 के आम चुनाव मेें जाति गणना एक प्रमुख मुद्दा रहेगा यह तय है।

देश में जाति जनगणना का लेखा जोखा

1931 में देश में आखिरी बार जाति जनगणना के आंकड़े जारी किए गए।

1941 में जनगणना से जुड़े जाति के आंकड़े सार्वजनिक नहीं हुए। आजादी के बाद जनगणना में जाति के सवालों को शामिल नहीं किया गया।
1999 में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होेने के बाद जनगणना के रजिस्ट्रार ने जाति के आंकड़े जुटाने की सिफारिश की।
2010 में संसद के दोनों सदनों ने जनगणना में जाति के सवालों को शामिल करने का प्रस्ताव पारित किया।
2011 में केन्द्र ने सामाजिक आर्थिक सर्वेक्षण कराया, जिसमें जाति से जुड़े सवाल शामिल थे। स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा कराए गए इस सर्वेक्षण में आंकड़ों में भारी गड़बड़िया थीं, इस कारण इन्हें जारी नहीं किया गया।
2018 में तत्कालीन केन्द्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि अगली जनगणना में ओबीसी को अलग से गिना जाएगा।
2019 बिहार विधानसभा में पहली बार जातिगत जनगणना कराने का प्रस्ताव पारित हुआ।
2020 बिहार विधानसभा में जातिगत जनगणना का प्रस्ताव दूसरी बार पारित हुआ।
23 अगस्त 2021 बिहार मे सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल ने नीतीश कुमार के नेतृत्व में पीएम मोदी से मुलाकात कर जातिगत जनगणना कराने की मांग की। तब पीएम ने कहा था कि वे तकनीकी मुश्किलों के चलते देशभर में जाति जनगणना तो नहीं करा सकते, मगर राज्य चाहें तो ऐसे सर्वे करा सकते हैं।

1 जून 2022 नीतीश कुमार ने जातिगत जनगणना पर सर्वदलीय बैठक बुलाई और सर्वसम्मति से राज्य में अपने स्तर से जाति आधारित गणना कराने का फैसला किया।

बहरहाल, बिहार सरकार ने जब से राज्य में अपने स्तर पर जाति आधारित गणना कराने का फैसला किया है और अन्य राज्यों में भी ऐसे मांग हो रही है तो ऐसे में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मानना है कि 21वीं सदी में जाति के मसले पर बात करना पहले से ही पिछड़े राज्यों को और पीछे ढकेलना है। संघ का मानना है कि इससे देश में जातीय ध्रुवीकरण तेज होगा जिससे बचना चाहिए। संघ का कहना है कि कि 'जेपी, लोहिया, दीनदयाल उपाध्याय और विनोबा भावे और संघ के संस्थापक हेडगेवार ने जाति विहीन समाज का सपना देखा था। ऐसे में जाति जनगणना सिर्फ समाज में विभाजन पैदा करेगा।

संघ के विचारों के विपरीत स्वराज अभियान के संस्थापक योगेन्द्र यादव का कहना है कि "समाज जातिविहीन हो जाए यह निश्चित तौर पर एक आदर्शवादी परिकल्पना है, मगर दुर्भाग्यवश आज जितने भी लोग जातिविहीन समाज की बात कर रहे हैं, उनमें से 99 फीसदी वे हैं जिन्होंने अपनी जाति के विशेषाधिकार से भरपूर लाभ उठा लिया है। अब वे चाहते हैं कि दूसरे लोग इसका फायदा उठाकर उनकी बराबरी तक न पहुंच सकें। गैर-बराबरी की यह यथास्थिति यूं ही बरकरार रहे।"

जाति के सवाल का यही राजनीतिक द्वंद्व है, जो बिहार सरकार द्वारा राज्य में जाति आधारित जनगणना कराने का फैसला लेने के बाद से धीरे-धीरे सुलग रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि धीमी आंच पर सुलगता यह द्वंद्व धीरे-धीरे तेज हो सकता है और 2024 के लोकसभा चुनाव तक बड़े मुद्दे का रूप ले सकता है। ऐसा मानने वालों में उनकी संख्या अधिक है, जिन्हें लगता है कि भाजपा की हिंदुत्ववादी राजनीति की काट जातिवाद के राजनीतिक उभार में छिपी है।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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