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कर्तव्य पथ तो बन गया परंतु जनता का अधिकार पथ कहां है?

आठ सितंबर 2022 को दो वजहों से याद किया जाएगा। एक तो इस दिन ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय का परलोक गमन हुआ। दूसरा, उनके पिता जार्ज पंचम के दिनों में बनी नई दिल्ली के राजपथ का नाम यह कहते हुए कर्तव्य पथ में बदल दिया गया कि गुलामी के प्रतीकों को इतिहास के गर्भ में लौटाया जा रहा है।

delhi kartavya path is done but what about janta ka adhikar

जिस वक्त प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राजधानी को तेजी से बदलने की मिसाल पेश करते हुए सेंट्रल विस्टा का उद्घाटन कर रहे थे, उसके चंद घंटों के अंदर ही ब्रिटेन की महारानी के दिवंगत होने की घोषणा हो गयी। तत्काल उनके सम्मान में भारत सरकार को राष्ट्रीय शोक की घोषणा करनी पड़ी। जाहिर तौर पर यह व्यवहार राष्ट्रमंडलीय देशों में शामिल भारत के लिए कोई विवशता का नहीं बल्कि राजनयिक लोकाचार का हिस्सा है।

नाम बदलने की परिपाटी

नाम बदलने की परिपाटी

केंद्र सरकार ने नाम बदलने की कड़ी को विस्तार देते हुए एक और नया नाम जोड़ा है: कर्तव्य पथ। गणतंत्र दिवस की कमेंट्री में हमारे शौर्य बोध को प्रतिध्वनित करने वाला राज पथ अब शाब्दिक तौर पर "कर्तव्य पथ" के नाम से जाना जाएगा। नए नामकरण की घोषणा करते हुए उत्साह से भरे प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, "गुलामी का प्रतीक किंग्सवे यानी राजपथ आज से इतिहास की बात हो गया है, ये हमेशा के लिए मिट गया है। आज कर्तव्य पथ के रुप में नए इतिहास का सृजन हुआ है।"

नाम बदल देने की परिपाटी पर चलते हुए 2016 में प्रधानमंत्री आवास पथ का नाम बदल दिया गया था। पड़ोस में घुडदौड़ के लिए बना शानदार रेसकोर्स मैदान एक लैंडमार्क था। उसके नाम पर उस रोड का नाम रेसकोर्स रोड हुआ करता था। संक्षिप्त में उसे आरसीआर कहा जाता। अब एलकेएम यानी लोक कल्याण मार्ग है। जिह्वा के ध्वनि योग में रेसकोर्स या आरसीआर की जगह लोक कल्याण मार्ग को बसा लेना आसान नहीं। दिल्ली के ऑटो-टैक्सी वाले छह साल बाद भी लोक कल्याण मार्ग मेट्रो स्टेशन को पुराने नाम रेसकोर्स मेट्रो स्टेशन से ही पुकारते हैं।

नाम बदल देना कोई नई बात नहीं है। पहले मद्रास को चेन्नई, बंबई को मुंबई, कलकत्ता को कोलकता, इलाहाबाद को प्रयागराज, मुगलसराय को दीनदयाल नगर, फैजाबाद को अयोध्या किया जा चुका है। हालांकि कार्यपालिका के इस फैसले को न्यायपालिका से अब तक मंजूरी नहीं मिली है। मसलन चेन्नई में स्थित उच्च न्यायालय आज भी मद्रास हाईकोर्ट, मुंबई का बांबे हाइकोर्ट और कोलकाता का कलकत्ता हाईकोर्ट ही कहा जाता है। आगे दिल्ली को इंद्रप्रस्थ और पटना को पाटलिपुत्र करने की मांग उठ सकती है। उड़ीसा को ओडिशा करने करने के बाद आगे उत्कल प्रदेश करने की मांग भी उठ सकती है।

क्या है सेन्ट्रल विस्टा प्रोजेक्ट?

क्या है सेन्ट्रल विस्टा प्रोजेक्ट?

राष्ट्रपति भवन को इंडिया गेट से जोड़ने वाली तीन किलोमीटर लंबी सड़क को अब "कर्तव्य पथ" कहा जाएगा। यह सेंट्रल विस्टा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। राजधानी दिल्ली को नया अंदाज देने के लिए केंद्र सरकार 20,000 करोड़ रुपए की लागत से सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट पर तेजी से काम कर रही है। 2019 में आरंभ सेंट्रल विस्टा परियोजना को 2026 तक पूरी तरह से मूर्तरुप ले लेना है। आगे इसी साल अक्टूबर में प्रधानमंत्री परियोजना के महत्वपूर्ण घटक नए संसद भवन का उद्घाटन करने वाले हैं। तब मौजूदा संसद भवन ऐतिहासिक धरोहर में परिवर्तित हो जाएगा। संसद का अगला शीतकालीन सत्र इसी त्रिकोणीय संसद भवन में होना वाला है।

सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट में राजधानी को आधुनिक भव्यता प्रदान की जा रही है। इसके लिए सांसदों के लिए कक्ष, सेंट्रल विस्टा एवेन्यू, केंद्रीय सचिवालय के दस मंत्रालयों के प्रमुख भवन, केंद्रीय सम्मेलन केंद्र, राष्ट्रीय अभिलेखागार भवन, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कलाकेंद्र, सुरक्षा अधिकारियों, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री का आधिकारिक आवास, प्रधानमंत्री कार्यालय एन्क्लेव, कैबिनेट सचिवालय, राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् सचिवालय और राष्ट्रीय संग्रहालय का स्थानांतरण शामिल है।

राजनीति को करिए कर्तव्य नीति

राजनीति को करिए कर्तव्य नीति

भारत की राजधानी के नई दिल्ली में स्थानांतरित होकर आने के 91 साल पूरे हो गए। 1931 में ब्रिटिश इंडिया में देश की राजधानी कोलकाता से हटाकर नई दिल्ली लाई गई। गुलामी के दिनों में वायसराय हाउस से इंडिया गेट को जोड़ने वाले हरियाली से लकदक भरे पथ को "किंग्स वे" कहा गया। स्वतंत्रता के बाद किंग्स वे का अनुवाद राजपथ कर दिया गया। अब अनुवाद वाले तद्भव शब्द पर भी आपत्ति जताते हुए राजपथ को कर्तव्य पथ में बदल दिया गया।

लोगों का कहना है कि अगर "राज" शब्द इतना ही अनुचित है, तो इसके बदलाव की कई गुंजाईश है। मसलन राजनीति से राज शब्द को बदलकर कर्तव्य लगाना चाहिए। पॉलिटिक्स का अनुवाद राजनीति की बजाय अब कर्तव्य नीति हो जाए, तो सुचिता की और भी कई बात बने। कर्तव्य नीति का पालन करने वाले राजनीतिक दल को कर्तव्य नीतिक दल की संज्ञा दी जाए। नाम बदलने से अगर व्यवहार बदल जाता है, तो कर्तव्य नीति का पालन करनेवाले दल उन दुराचारों से गुरेज करने लगेंगे, जो राजनीतिक दलों के नाम पर होते रहे हैं। लोकतंत्र के लिए इससे आदर्श स्थिति बनेगी।

लोकतंत्र में कर्तव्य और अधिकार

लोकतंत्र में कर्तव्य और अधिकार

लोकतंत्र में कर्तव्य और अधिकार एक दूसरे के पूरक हैं। शासन से उस कर्तव्य की अपेक्षा की जाती है जिससे जनता का अधिकार संरक्षित रहता है। भारत का संविधान जनोन्मुखी है। इसमें जनता के अधिकारों को बेहतर तरीके से उकेरा गया है। जनता की बजाय शासनतंत्र से कर्तव्य की उम्मीद ज्यादा रखी गई है। "कर्तव्य पथ" की घोषणा के बाद स्वस्थ लोकतंत्र की मिसाल पेश करने के लिए सत्तातंत्र क्या कोई "अधिकार पथ" के नामकरण की सोच रहा है या फिर महज जनता से ही कर्तव्य की अपेक्षा की जाती रहेगी?

नए नामकरण वाले "कर्तव्य पथ" से मात्र दो किलोमीटर के फासले पर नई दिल्ली का जंतर मंतर है। यह धरना प्रदर्शनों के लिए मशहूर है। बीते तीस सालों से लोग यहां जन अधिकार की मांग को लेकर अनवरत जुटा करते हैं। उससे पहले इंडिया गेट से लगे वोट कल्ब पर धरना प्रदर्शन हुआ करता था। महेन्द्र सिंह टिकैत के कहने पर जमा हुए लाखों किसानों के धरना प्रदर्शन में इंडिया गेट के आसपास बोट क्लब के इलाके को काफी नुकसान हुआ था। तब से बोट क्लब के बजाय जंतर मंतर को शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के लिए खोला गया।

लेकिन छह अक्टूबर 2017 को राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के आदेश और स्थानीय आवासीय आबादी के एतराज पर जंतर मंतर पर धरना प्रदर्शन पर पूर्ण पाबंदी लगा दी गई थी। इससे जनाधिकार वादियों को नई मुसीबत का सामना करना पड़ा। सरकार ने भी जनाधिकार के लिए धरना प्रदर्शन की सीमित होती जमीन को विस्तार देने से मुंह मोड़े रखा। बल्कि अधिकार की मांग करने वालों को तिरोहित करते हुए आंदोलनजीवी बताया जाने लगा।

जंतर मंतर से हटाए गए लोगों को रामलीला मैदान जाने को कहा गया था। पुरानी दिल्ली से लगा रामलीला मैदान नई दिल्ली में संसद से पांच किलोमीटर दूर है। यहां होने वाले किसी प्रदर्शन की गूंज संसद तक पहुंच पाना आसान नहीं रहा। लिहाजा, जुलाई 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने लंबी सुनवाई के बाद शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए जंतर मंतर और बोट क्लब पर प्रदर्शन की सीमित छूट दे दी।

विकास के नाम पर जनाधिकार को चुनौती

विकास के नाम पर जनाधिकार को चुनौती

उल्लेखनीय है कि राजपथ से नाम बदलकर "कर्तव्य पथ" को आमजन की चहलकदमी के लिए फिलहाल हफ्ते भर के लिए ही खोला गया है। यहां पर सजने वाले आइसक्रीम के ढेलों और खोमचे वालों की ब्रिकी पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी गयी है। आगे सेंट्रल विस्टा के निर्माण कार्य को गति देने के लिए आमजन के लिए भी बंद रखने की बात कही गयी है।

ऐसे में आशंका है कि सेंट्रल विस्टा के निर्माण पूरा होने के बाद कर्तव्य पथ के ज्यादातर हिस्सों को सुरक्षा के नाम पर आमजन की आवाजाही के लिए स्थायी तौर पर बंद कर दिया जाए। अगर खोला भी जाए तो बनारस के नमो घाट की तर्ज पर "कर्तव्य पथ" पर चहलकदमी के लिए टिकट के नाम पर शुल्क अदायगी की अनिवार्यता हो। इन्हीं शंकाओं के मद्देनजर लोकतंत्र में जनता के "अधिकार पथ" के सुदृढीकरण की बात जरूरी है कि कहीं लोकतंत्र के सेन्ट्रल विस्टा में विकास के नाम पर उसका नि:शुल्क प्रवेश निषेध तो नहीं किया जा रहा है?

क्या अब हमारी सरकारें भी लाभ हानि के कॉरपोरेट सिद्धांत पर काम करने लगी हैं जो कुछ भी मुफ्त नहीं होता के आदर्श वाक्य को अपना रही हैं? अगर कोई इसमें लोकतांत्रिक प्रतीकों पर जनाधिकार को सीमित करने का षड्यंत्र देखे तो इसमें गलत क्या है?

यह भी पढ़ेंः कांग्रेस में समाहित होता लोहिया और जयप्रकाश का गैर-कांग्रेसवादी समाजवाद

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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