Deepawali: राम की नीति से आज की राजनीति को सीख लेने का समय
भारतीय त्योहारों की एक विशेषता है, वे व्यक्तिगत होते हुए भी सामूहिकता का ना सिर्फ बोध कराते हैं, बल्कि वे व्यक्ति को समूह की सामाजिकता से बांध देते हैं। जब त्योहार आते हैं, तो भारतीय समाज का जातिबोध, जातीय श्रेष्ठता बोध अपने-आप जैसे कहीं तिरोहित हो जाता है।
लेकिन इस संदर्भ में राजनीति को देखिए, वह अपने हर कदम पर समाज को बांटती ही रहती है, कभी धर्म के नाम पर तो कभी जाति के नाम पर तो कभी आर्थिक हैसियत की बुनियाद पर। जैसे ही त्योहार की हमारी स्मृति धुंधली होती है, राजनीति हमारे मानस पर हावी हो जाती है और फिर हर दीप अकेला होता जाता है।

दीपावली राम के अयोध्या आगमन की स्मृति का त्योहार माना जाता है। राम की नीति से आज की राजनीति को सीख लेनी चाहिए। वे अयोध्या के राजकुमार थे, लेकिन वचन के पक्के थे, इसलिए वनवास चले गए। चाहते तो जंगल में भी वे आराम से रह सकते थे। अयोध्या नहीं तो जनकपुर उनके सुख का ध्यान रखता। लेकिन उन्होंने कठिन परिस्थितियों में चलते रहना चुना। उनका चलना क्या था? लोक और प्रकृति से जुड़ाव। वे अवतार थे, सीता हरण के बाद अपने या अपने ससुराल की राजकीय ताकतों से सीता को खोज सकते थे। लेकिन उन्होंने जंगल के जीवों और प्रकृति से सीता के बारे में पूछना जरूरी समझा, हे खग-मृग, हे मधुकर श्रेणी, तुम देखी सीता मृगनयनी। वे चाहते तो अपनी सेनाएं बुलाकर रावण के राज पर हमला कर सकते थे, लेकिन उन्होंने वानर, भालू, कील, किरात का साथ लेना जरूरी समझा।
एक तरह से कह सकते हैं कि मर्यादापुरुषोत्तम राम लोकतांत्रिक भागीदारी के साथ अपना लक्ष्य हासिल करना चाहते थे। रोशनी के त्योहार दीपावली के बीच आज की राजनीति को राम से सीखना चाहिए। लेकिन वह राजनीति ही क्या, जो इससे सीख ले और सचमुच सर्वसमभाव के पथ पर आगे बढ़ सके। दीपावली प्रकाश का पर्व है और जैसे हालात हैं उसे देखते हुए यह उम्मीद करना कठिन है कि आज की राजनीति इस पर्व पर राम के वैचारिक आलोक को ग्रहण करने की कोशिश करेगी। इसकी पड़ताल करना हो तो हाल की राजनीति की कुछ घटनाओं को देखिए।
वैसे तो देश के हर इलाके की अपनी विरासत है, उनकी अपनी संस्कृति है। लेकिन बिहार उनमें अलग है। वहां प्राचीन काल में नालंदा जैसा विश्वविद्यालय था, जहां ज्ञान की अलौकिक ज्योति जलती थी। उसी नालंदा से आते हैं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार। अव्वल तो उनसे उम्मीद रहती रही है कि वे बदजुबानी नहीं करेंगे। लेकिन बिहार विधानमंडल के मौजूदा शीतकालीन सत्र में जिस तरह दो दिनों में उन्होंने बदजुबानी की, उससे समूचा देश हैरत में रह गया। संसद में जनसंख्या नियंत्रण के संदर्भ में एक तरह से उन्होंने कोकशास्त्रीय भाषा का इस्तेमाल किया।
शब्द कर्म की दुनिया में कहा जाता है कि कोई भी विषय खराब नहीं होता, उसका ट्रीटमेंट उसे अच्छा या खराब बनाता है। रोशनी के त्योहार के ठीक पहले नीतीश कुमार ने गोपन अंधेरे वाले विषय का जैसा ट्रीटमेंट किया, उनकी जुबान उसमें सहभागी बनी, ऐसे में बवेला होना ही था। बात यहीं तक सीमित रहती तो एक पल के लिए उनके इस कृत्य को उनके अतीत की उपलब्धियों के चलते भुला दिया जाता।
लेकिन इसके अगले ही दिन उन्होंने अपने ही पूर्व साथी और वरिष्ठ नेता जीतन राम मांझी के साथ जिस तरह से तू-तड़ाक की भाषा का इस्तेमाल किया, उसने उनकी अशोभन छवि बनाई। नालंदा विश्वविद्यालय की माटी से आने वाले अनुभवी राजनेता से ऐसी उम्मीद नहीं थी। लेकिन उन्होंने किया और एक तरह समाज में नई खाई ही बना दी। उनके शराबबंदी कानून के चलते उनकी मुतमईन रही महिलाएं अब उनसे अपसेट हैं। पिछड़ों में अति पिछड़ा और दलितों में अति दलित की उन्होंने श्रेणियां बनाईं, उससे इस वर्ग में उनके प्रति जो आदरबोध था, जीतनराम मांझी के साथ तू-तड़ाक करने से वह जैसे चकनाचूर हो गया।
हमारे लोकतंत्र का प्रमुख हिस्सा चुनाव ऐसा बन गया है कि अगर चुनावी मैदान में पैंतरेबाजी ना हो तो जैसे सबकुछ सूना लगता है। अतीत में चुनाव ऐसे भी हुए हैं, जब प्रतिद्वंद्वी के पास पैसे नहीं होते थे वह अपने मजबूत प्रतिद्वंद्वी से मांग लेता था। 1980 के आम चुनाव में कमलापति त्रिपाठी के खिलाफ लोकदल की ओर से राजनारायण मैदान में थे। इसके तीन साल पहले उन्होंने इंदिरा गांधी को रायबरेली के मैदान में हराया था। उसके बाद देश के स्वास्थ्य मंत्री बने थे। लेकिन राजनारायण फक्कड़ थे। पैसे उनके पास नहीं रहते थे। एक बार चुनाव प्रचार के दौरान उनके काफिले का सामना पंडित कमलापति त्रिपाठी से हो गया। राजनारायण जी ने त्रिपाठी जी को घेर लिया, उनके पांव छुए और जीत का आशीर्वाद मांगा। कमलापति उनके प्रतिद्वंद्वी थे। लेकिन उन्होंने राजनारायण को जीत का आशीर्वाद दिया। फिर राजनारायण ने उनसे पैसे मांगे, क्योंकि उनके पास अपने साथियों को चाय पिलाने के लिए पैसे तक नहीं थे। पंडित जी ने उन्हें पैसे भी दिए।
1993 में दिल्ली विधानसभा का पहला चुनाव था। तब दिल्ली में जनता दल, कांग्रेस और भाजपा का दबदबा था। दिल्ली की नांगलोई विधानसभा सीट से जनता दल के प्रत्याशी थे डॉक्टर सतीश यादव, जबकि कांग्रेस प्रत्याशी थे राजकुमार चौहान और भाजपा के प्रत्याशी थे देवेंद्र शौकीन। तीनों ने एक-दूसरे के खिलाफ कुछ नहीं बोला। तब दिल्ली से छपने वाले अखबारों की सुर्खियां ये तीनों उम्मीदवार थे। लेकिन अब का चुनाव देखिए। छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में राज्य बीजेपी के कद्दावर नेता बृजमोहन अग्रवाल पर सरेआम हमला किया गया। यह तब हुआ, जब प्रकाश का पर्व दीपावली नजदीक है।
जाति को ही लीजिए, सामाजिक रूप से जातियों के बीच आपसी संबंध पहले जैसे कठोर नहीं रहे। कस्बायी स्तर तक अंतरजातीय विवाह होने लगे है। तीन-चार दशक पहले की तरह अब अंतरजातीय विवाहों पर नांक भौं नहीं सिकोड़े जाते। लेकिन राजनीति हर बार इस जातीय विलयन की राह में बाधा बनकर आ जाती है। कभी आरक्षण को लेकर तो कभी आर्थिक हैसियत को लेकर तो कभी वोट बैंक को लेकर। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और सबसे कमजोर एवं पिछड़ा माने जाने वाले तबके मुसहर समाज से आने वाले जीतनराम मांझी की समधन ज्योति देवी गया जिले की टेकारी से विधायक हैं। नीतीश कुमार की बदजुबानी से मचे बवंडर के बीच उन्होंने जो कहा, उस पर गौर किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि भगवान ने सिर्फ दो जाति बनाई है-औरत और मर्द। राजनीति को इसी हिसाब से सोचना चाहिए।
आज की भारतीय राजनीति मोटे तौर पर तीन वैचारिक आधारों के बीच बंटी है, समाजवादी धारा की राजनीति अपने को ज्यादा संतुलित होने का दावा करती है, तो मार्क्सवादी धारा की राजनीति वर्ग के हिसाब से चलती है, जबकि राष्ट्रवादी राजनीति भारतीय संस्कृति की वसुधैव कुटुंबकम् की अवधारणा की बात करती है। तीनों की वैचारिकी के मूल में जाति नहीं, आर्थिक और सामाजिक बराबरी का भाव है। लेकिन जब तीनों ही राजनीति हकीकत की जमीन पर उतरती हैं तो उनका रूप बदल जाता है। तीनों ही जाति, कोटरी और सामाजिक खींचतान की बुनियाद पर अपना समर्थक आधार बनाने की कोशिश करती है।
ऐसे में इस दीपावली पर राजनेताओं द्वारा सिर्फ बधाई संदेश देने की बजाय अपनी राजनीतिक सोच को लेकर आत्म निरीक्षण भी करना चाहिए कि मर्यादापुरुषोत्तम के देश की राजनीतिक विरासत संभाल रहे राजनेता अपने कर्म से वो कौन सा राजनीतिक आदर्श प्रस्तुत कर रहे हैं?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












Click it and Unblock the Notifications