Dalit PM: मायावती और खड़गे का नाम बन सकता है भाजपा की मुश्किल
Dalit PM: वे तीन नेता जो कभी प्रधानमंत्री बनने का सपना लेते थे, उन तीनों का जनाधार इतना सिकुड़ गया है कि वे मुख्यमंत्री बनने के लिए तरस रहे हैं| ये तीन नेता हैं, शरद पवार, लालू यादव और मायावती| इनके अलावा मुलायम सिंह भी पीएम बनने का सपना लिए इस दुनिया से विदा हो गए|
मुलायम सिंह यादव दो बार प्रधानमंत्री बनते बनते रह गए थे| पहली बार 1996 में जब वीपी सिंह ने प्रधानमंत्री बनने से इंकार कर दिया, और सीपीएम ने ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनने की इजाजत नहीं दी थी, तो मुलायम सिंह का प्रधानमंत्री बनना तय था, लेकिन लालू यादव और शरद यादव ने उनके नाम का विरोध कर दिया| दूसरी बार 1999 में एक वोट से वाजपेयी सरकार गिरने के बाद सोनिया गांधी ने उन्हें समर्थन देने से इंकार कर दिया और खुद प्रधानमंत्री बनने की कोशिश में लग गई|

अब फिर से उन तीन पुराने नेताओं की चर्चा करते हैं। उनमें पहला नाम है शरद पवार का, कभी उन्हें भविष्य का प्रधानमंत्री कहा जाता था| वैसे कहा तो यह जाता है कि शरद पवार ने 1999 में विदेशी मूल के मुद्दे पर कांग्रेस छोड़ी थी, लेकिन सच यह है कि एक वोट से वाजपेयी सरकार गिराने के बाद अगर सोनिया गांधी खुद प्रधानमंत्री बनने की जल्दबाजी करने के बजाए, शरद पवार या मुलायम सिंह को प्रधानमंत्री बनवाने का प्रस्ताव रखती, तो न शरद पवार कांग्रेस छोड़ कर जाते, न मुलायम सिंह यादव सोनिया का विरोध करते| न देश को 1999 का मध्यावधि चुनाव देखना पड़ता| बल्कि गैर भाजपा सरकार बन जाती| वह शरद पवार और मुलायम सिंह का अंतिम चांस था|
शरद पवार के बाद दूसरा नाम है लालू यादव, वह भी कभी प्रधानमंत्री बनने का सपना ले रहे थे| 22 जुलाई 2008 को मनमोहन सरकार के विश्वास मत पर बहस में हिस्सा लेते हुए उन्होंने खुद कहा था कि मायावती की प्रधानमंत्री बनने की इच्छा है, और उनकी खुद की भी प्रधानमंत्री बनने की इच्छा है| लेकिन उसके बाद न वह कभी केंद्र में मंत्री बन सके, न मुख्यमंत्री|
तीसरा नाम है मायावती, जिनका जिक्र लालू यादव ने अपने भाषण में किया था, लेकिन आज मायावती की हालत यह है कि उन्हें अपनी पार्टी को बचाना मुश्किल हो गया है| उत्तर प्रदेश के पिछले विधानसभा चुनाव में बसपा को सिर्फ एक सीट मिली| उत्तर प्रदेश में उनका वोट प्रतिशत भी 20 से घट कर 13 प्रतिशत से कम रह गया है| हालांकि 2019 में समाजवादी पार्टी के साथ चुनावी गठबंधन के चलते वह लोकसभा की दस सीटें जीत गई थी|

आश्चर्य यह है बसपा 2014 में एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत पाई थी, फिर भी 2019 में सपा से गठबंधन के कारण 10 लोकसभा सीटें जीतने के बाद उन्होंने यह कहते हुए गठबंधन तोड़ दिया कि सपा अपने वोट बसपा को ट्रांसफर नहीं कर सकी| जबकि बसपा को ही इस गठबंधन का फायदा हुआ था, सपा तो 2014 में भी पांच सीटें जीती थीं, 2019 में भी पांच सीटें जीती| अलबत्ता सपा को नुकसान हुआ, क्योंकि 2014 में मुलायम परिवार के चार सदस्य जीते थे, लेकिन 2014 में सिर्फ दो जीत पाए थे|
मायावती ने अब एकला चलो का स्टैंड लिया हुआ है| जबकि सपा और कांग्रेस उन्हें अपने साथ जोड़ने का भरसक प्रयास कर रहे हैं| मायावती को साथ लाने के लिए कांग्रेस अखिलेश यादव को बाहर रखने को भी तैयार है, क्योंकि उत्तर प्रदेश कांग्रेस से हाईकमान पर दबाव बना है कि अगर तीनों दलों का गठबंधन नहीं बनता, तो अखिलेश की बजाए मायावती से गठबंधन का ज्यादा फायदा होगा| इसका कारण कांग्रेस और बसपा दोनों का वोट बैंक दलित-मुस्लिम वोट ही है| अगर वह मजबूरीवश ही जुड़ गया तो यूपी में भाजपा का रथ रूक जाएगा| अगर यह गठबंधन बनता है, तो "अगला प्रधानमंत्री दलित" का नारा लगाया जा सकता है, क्योंकि मल्लिकार्जुन खड़गे और मायावती दोनों ही दलित हैं|
हालांकि अब तक जो राजनीति देखने को मिल रही है, उसमें इंडिया गठबंधन के नीतीश कुमार, ममता बनर्जी और केजरीवाल प्रधानमंत्री पद की रेस में हैं, और अपने पक्ष में सर्वे करवा रहे हैं| लेकिन सर्वे की रेस में विपक्ष की तरफ सबसे आगे चल रहे हैं, राहुल गांधी| ममता, नीतीश और केजरीवाल का हश्र भी पवार, मुलायम, लालू और मायावती जैसा होने जा रहा है| राहुल गांधी को सर्वे रेस में आगे देख इन तीनों ने हथियार डाल दिए हैं| तृणमूल कांग्रेस ने तो कहा ही है कि अगर कांग्रेस से कोई रेस में नहीं होगा, तो ममता बनर्जी रेस में होंगी| यानि ममता बनर्जी की ओर से बात कांग्रेस पर छोड़ दी गई है, और नीतीश कुमार तथा केजरीवाल को खारिज कर दिया गया है| चुनावों में तो अभी आठ महीने पड़े हैं, चुनावी बिगुल बजने से पहले ही ये तीनों रेस से लगभग बाहर हो गए हैं|
कांग्रेस अंतिम समय में नया तुरुप का पत्ता चलने की तैयारी कर रही है| कांग्रेस का तुरुप का पत्ता प्रियंका गांधी नहीं होगी, हालांकि ऐसे संकेत मिलने शुरू हो चुके हैं कि प्रियंका गांधी अमेठी से लोकसभा चुनाव लड़ेंगी| लेकिन कांग्रेस का तुरुप का पत्ता दक्षिण भारत के दलित समुदाय के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे होंगे, जो 2019 का लोकसभा चुनाव हार गए थे|
उत्तर भारत में मल्लिकार्जुन खड़गे की लोकप्रियता नाममात्र की है, उनका नाम तो तभी सामने आया, जब 2014 में सोनिया गांधी ने उन्हें लोकसभा का नेता बनाया| फिर जब वह 2019 का लोकसभा चुनाव हार गए, तो उन्हें राज्यसभा में लाकर राज्यसभा में विपक्ष का नेता बनाया गया| सोनिया गांधी इस लाईन पर लंबे समय से काम कर रहीं थी| इसीलिए मल्लिकार्जुन खड़गे को पिछले दस साल से उभारा जा रहा है| कांग्रेस अध्यक्ष भी उन्हें इसी रणनीति के साथ बनाया गया था|
भाजपा के नेता भी इस बात से डरे हुए हैं कि अगर कांग्रेस ने मल्लिकार्जुन खड़गे का दांव चल दिया और मायावती भी खड़गे के कारण इंडिया गठबंधन में शामिल हो गई, तो सिर्फ यूपी नहीं, बल्कि देश भर की आरक्षित सीटों पर मुकाबला कड़ा हो जाएगा| 1996 से 2019 तक के सात लोकसभा चुनावों में सिर्फ 2009 का चुनाव छोड़कर बाकी छह चुनावों में भाजपा ने कांग्रेस से ज्यादा आरक्षित सीटें जीती हैं| 2014 में भाजपा कुल 161 में 66 आरक्षित सीटें जीती थी, जबकि 2019 में 74 आरक्षित लोकसभा सीटें जीती थीं|
कांग्रेस इसीलिए उत्तर प्रदेश के दलितों की सबसे बड़ी नेता मायावती के साथ चुनावी गठबंधन करना चाहती है, ताकि दक्षिण के साथ साथ उत्तर भारत के दलितों का भी समर्थन हासिल किया जा सके| मायावती भी अपनी बदली रणनीति के तहत इस समझौते में आगे बढ़ सकती है| उसकी बदली रणनीति यह है कि ज्यादा से ज्यादा राज्यों में विधायक जीता कर उन्हें राज्य सरकारों में शामिल करवाया जाए|
अब तक मायावती के अड़ियल रवैये के कारण बसपा के विधायक पार्टी छोड़कर सत्ताधारी पार्टी में शामिल हो जाते हैं, तो पार्टी ही सत्ता में भागीदार क्यों न बने| इसलिए मायावती पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद कोई बड़ा फैसला लेंगी, जो उनके पहले के फैसले से अलग होगा| अगर मध्यप्रदेश और राजस्थान में 2018 की तरह सत्ता का संतुलन बसपा के हाथ में आया, तो मायावती दोनों राज्यों में सत्ता की हिस्सेदारी के आधार पर कांग्रेस की सरकारें बना कर इंडिया गठबंधन में शामिल हो सकती हैं| यह गठबंधन बना तो भाजपा को 2019 में जीती 74 आरक्षित सीटों पर मुश्किल का सामना करना पड़ेगा|
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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