CWC Meeting: कांग्रेस कार्यसमिति का फोकस राहुल गांधी पर ही
कांग्रेस के इतिहास में पहली बार दिल्ली से बाहर हुई कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में यह भी पहली बार हुआ कि बैठक का केंद्र बिन्दु पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे नहीं, बल्कि सोनिया, राहुल और प्रियंका गाधी बने रहे। ये तीनों ही नई कार्यसमिति के सदस्य हैं। बैठक में पहला मुख्य मुद्दा भी राहुल गांधी की पार्ट-टू और पार्ट-थ्री भारत जोड़ो यात्रा रहा।
कार्यसमिति में कांग्रेस अधिवेशन की तरह तीन प्रस्ताव भी पास किए गए। प्रस्तावों का एक हिस्सा देश की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा से जुड़ा है, दूसरा देश की आर्थिक स्थिति पर और तीसरा देश की राजनीतिक दशा और दिशा पर। जहां तक राजनीतिक प्रस्ताव का सवाल है, तो उसमें सबसे बड़ी बात यह है कि आरक्षण के संबंध में नीतीश, लालू और अखिलेश यादव की लाईन अपनाई गई है।

कांग्रेस ने आरक्षण की सीमा बढ़ाने की मांग की है, ताकि दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों को उनकी आबादी के हिसाब से आरक्षण दिया जा सके। प्रस्ताव में याद दिलाया गया है कि राहुल गांधी ने इसी साल कोलार में कहा था कि जिसकी जितनी संख्या उतना आरक्षण। प्रस्ताव में राहुल गांधी का जिक्र इस बात की ओर संकेत करता है कि कांग्रेस राहुल गांधी को विपक्षी गठबंधन का केंद्रबिन्दु बनाने की रणनीति को सामने रख कर ही आगे बढ़ रही है। हालाकि सुप्रीमकोर्ट ने 1993 में इंदिरा साहनी केस में आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत तय की हुई है।
कांग्रेस ने जाति आधारित जनगणना का भी समर्थन किया है। लालू यादव और नीतीश कुमार ने इंडी एलायंस की मुम्बई बैठक में यह मांग उठाई थी, लेकिन ममता बनर्जी, अरविन्द केजरीवाल और उद्धव ठाकरे ने जाति आधारित जनगणना का विरोध किया था, इस कारण यह मांग एजेंडे में शामिल नहीं हुई थी। जबकि 13 सितंबर को दिल्ली में हुई को-आर्डिनेशन कमेटी की बैठक में इस मांग को एजेंडे में शामिल कर लिया गया, इस बैठक में ममता बनर्जी का प्रतिनिधि शामिल नहीं हुआ था। खबर आई थी कि ममता इस फैसले से नाराज है।
मोदी सरकार बनने के बाद से कांग्रेस का आरोप रहा है कि संविधान और देश का संघीय ढांचा खतरे में है। उसे भी राजनीतिक प्रस्ताव में दोहराया गया है कि मोदी सरकार ने सिलसिलेवार राज्य सरकारों को कमजोर किया है, राज्य सरकारों को राजस्व का हिस्सा देने में आनाकानी की गई है, या उन्हें घटा दिया गया है। इस तरह राज्य सरकारों को उनका कर्तव्य निभाने में रुकावटें खड़ी की गई हैं।

मोदी सरकार की ओर से एक देश, एक चुनाव की मुहिम को भी कांग्रेस ने संविधान के संघीय स्वरूप पर प्रहार के रूप में प्रदर्शित किया है। कांग्रेस ने एक देश एक चुनाव का विरोध पहली बार नहीं किया है, इससे पहले संसदीय समिति में भी कांग्रेस और अन्य कई क्षेत्रीय दल विरोध कर चुके हैं।
यह सबको पता है कि एक देश एक चुनाव के लिए कम से कम पांच संविधान संशोधनों की जरूरत पड़ेगी, और मोदी सरकार भी अच्छी तरह जानती है कि उसके पास संविधान संशोधनों के लिए दो तिहाई बहुमत नहीं है। इसलिए कांग्रेस का मानना है कि मोदी सरकार लोकसभा चुनावों से पहले सिर्फ एक नेरेटिव बनाने की कोशिश कर रही है कि वह एक देश एक चुनाव करवाना चाहती है, लेकिन विपक्ष विरोध कर रहा है।
हैरानी वाली बात यह है कि सनातन धर्म पर उठे विवाद के कारण भोपाल की रैली रद्द कर दी गई। दरअसल, मध्यप्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष कमलनाथ ने रैली करवाने से इंकार कर दिया था। लेकिन सनातन धर्म पर बैठक में कोई आधिकारिक चर्चा नहीं होने दी गई, क्योंकि बात बाहर लीक होती और इंडी एलायंस में फूट का संदेश जाता। इसलिए कांग्रेस ने चुपके से भोपाल की रैली रद्द होने का एलान कर दिया।
भोपाल रैली का फैसला राहुल गांधी की सिफारिश पर ही 13 सितंबर को इंडी एलायंस की को-आर्डिनेशन कमेटी की बैठक में लिया गया था। लेकिन उसी दिन शाम को कमलनाथ ने मल्लिकार्जुन खड़गे को फोन करके कहा कि रैली मध्यप्रदेश में न रखी जाए। उन्होंने इसका कारण सनातन धर्म पर हुई उदयनिधि स्टालिन की टिप्पणी से मध्यप्रदेश में हवा खराब होना बताया था। मल्लिकार्जुन खड़गे ने 15 सितंबर को ही एक अखबार में दिए इंटरव्यू में संकेत दे दिया था कि भोपाल की रैली रद्द हो सकती है। अगले दिन हैदराबाद में कमलनाथ रैली नहीं करवाने पर अड़ गए, तो रैली रद्द कर दी गई।
कमलनाथ खुद पक्के सनातनी हिन्दू हैं, उन्होंने हिन्दू राष्ट्र के समर्थक बागेश्वर धाम के धीरेन्द्र शास्त्री को हाल ही में अपने निर्वाचन क्षेत्र में बुलाकर उनकी कथा करवाई थी। जब धीरेन्द्र शास्त्री के हिन्दू राष्ट्र बनाने के संकल्प पर कमलनाथ से सवाल पूछा गया था तो कमलनाथ ने कहा था कि जिस देश की 80 फीसदी जनता हिन्दू है, वह हिन्दू राष्ट्र ही है। अब वह उस इंडी एलायंस की रैली वहां कैसे करवा सकते हैं, जिसका एक घटक सनातन धर्म का समूल नाश करने की बात कह रहा हो, और यह भी कह रहा हो कि इंडी एलायंस सनातन धर्म विरोध के आधार पर ही बना है।
कांग्रेस से जब सनातन धर्म पर उसका स्टैंड पूछा गया तो कांग्रेस ने टालते हुए कहा कि यह असली मुद्दे से ध्यान हटाने की भाजपाई चाल है। साफ़ है कि कांग्रेस डीएमके को किसी भी हालत में अपने साथ रखने के लिए इस मुद्दे से बचना चाहती है। डीएमके की वजह से तमिलनाडु में कांग्रेस का कुछ आधार बचा हुआ है। 2019 में कांग्रेस को देश भर से मिली 53 लोकसभा सीटों में आठ डीएमके से गठबंधन की वजह से तमिलनाडु से मिली थीं।
जातीय जनगणना और आरक्षण की सीमा बढ़ाने की तरह कांग्रेस का दूसरा मुद्दा भी राहुल गांधी ने तय किया है। कांग्रेस ने अपना दूसरा मुद्दा लद्दाख में चीनी कब्जे को चुना है। सरकार और सेना की तरफ से बार बार के खंडन के बावजूद कांग्रेस ने कहा है कि गलवान की घटना भारत की धरती पर हुई थी, इसलिए नरेंद्र मोदी यह कह कर देश को गुमराह कर रहे हैं कि भारत की एक ईंच जमीन पर भी चीन का कब्जा नहीं हुआ है।
कांग्रेस का मुख्य तर्क यह है कि पुलिस अधिकारियों की कांफ्रेंस में लद्दाख के पुलिस अधिकारी ने एक रिपोर्ट पेश की थी, जिसमें कहा गया था कि भारतीय सेना पहले जहां तक पेट्रोलिंग करती थी, अब वहां चीन का कब्जा है। राहुल गांधी ने अपनी ब्रिटेन, अमेरिका और यूरोप यात्राओं में भी लद्दाख में चीन के कब्जे की बात कही थी, और इस बीच अपनी लद्दाख यात्रा के दौरान भी स्थानीय चरवाहों के हवाले से कहा था कि जहां वे 2020 तक अपनी भेड़ बकरियां चराने जाया करते थे, अब उन्हें वहां जाने से रोक दिया गया है और अब वहां चीन की सेना बैठी है।
कांग्रेस ने राहुल के इस चीन एजेंडे को मुख्य चुनावी मुद्दा बनाने के भी संकेत दी हैं। राहुल गांधी की अगली भारत जोड़ो यात्राओं का मुख्य मुद्दा भी चीन ही रहने वाला है। राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा का पार्ट टू करने का फैसला अगस्त में ही हो चुका था। अगस्त के पहले हफ्ते में दिग्विजय सिंह को यात्रा का संयोजक बना कर रूट तय करने की कमेटी भी बना दी गई थी।
कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में राहुल गांधी की पार्ट टू भारत यात्रा के लिए बाकायदा प्रस्ताव पास कर दिया गया है। हालांकि कांग्रेस प्रवक्ता ने यात्रा शुरू होने और उसके मार्ग के बारे में अभी कुछ भी बताने से इंकार किया है। लेकिन इस बार राहुल गांधी की यात्रा के समय देश भर के कांग्रेसी भी अपने अपने राज्य में पदयात्राएं निकालेंगे। इस संबंध में सभी राज्यों को संदेश भेजा जा चुका है और राज्यों में तैयारियां शुरू हो गई हैं, जैसे महाराष्ट्र में चार बड़े नेता अलग अलग दिशाओं से यात्रा निकालेंगे।
राहुल गांधी संगठन की जिम्मेदारी से मुक्त हो कांग्रेस को जमीन पर खड़ा करने की कोशिशों में लोकसभा चुनाव से पहले भारत जोड़ो यात्रा का पार्ट थ्री भी करेंगे, जो उत्तर प्रदेश पर ज्यादा केन्द्रित हो सकती है। पहले फेज में उन्होंने यूपी के सिर्फ तीन जिले गाजियाबाद, बुलन्दशहर और शामली का 130 किलोमीटर कवर किया था।
राहुल गांधी ने अपनी पहली भारत जोड़ो यात्रा 7 सितंबर 2022 को कन्याकुमारी से शुरू करके श्रीनगर में उसका समापन किया था, लेकिन असल समापन उसी दिन 30 जनवरी को महात्मा गांधी की समाधि पर दिल्ली लौट कर हुआ, क्योंकि उस दिन गांधी की पुण्यतिथि थी।
अगस्त के पहले हफ्ते में लगभग यह तय हो गया था कि राहुल गांधी की पार्ट-टू भारत जोड़ो यात्रा 2 अक्टूबर से महात्मा गांधी के जन्मदिन पर उनकी जन्मस्थली पोरबन्दर से यात्रा शुरू होगी और समापन त्रिपुरा, मेघालय या अरुणाचल प्रदेश में परशुराम कुंड पर होगा। लेकिन कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में इसे उलटा करके पूर्व से पश्चिम की दिशा में करने की रणनीति बनी है, इसका मतलब यह है कि करीब सौ दिन की यह यात्रा अरुणाचल प्रदेश से शुरू हो कर पोरबन्दर तक हो सकती है, जिसमें पश्चिम बंगाल, झारखंड, बिहार, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ कवर होगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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