Crimes in Bihar: कानून व्यवस्था खस्ताहाल, क्या फिर बिहार हो रहा है बदहाल?
Crimes in Bihar: आज ही यह भयावह खबर लोगों के सामने आयी है कि बिहार में एक परिवार ने सामूहिक रूप से आत्महत्या कर ली। नवादा के रहने वाले केदार लाल गुप्ता, पत्नी अनिता कुमारी और तीन बच्चे प्रिंस कुमार, शबनम कुमारी और गुड़िया कुमारी अब इस दुनिया में नहीं हैं।

परिवार पर 10 लाख रुपए का कर्ज था। कर्ज देनेवाले लोग उन पर कर्ज वापसी का दबाव बना रहे थे लेकिन वो कर्ज वापस करने की स्थिति में नहीं थे। इसी दबाव में आकर पूरे परिवार ने जहर खा लिया। फल व्यापारी गुप्ता का पूरा परिवार खत्म हो गया। परिवार की एक बच्ची अस्पताल में है। उसकी हालत भी गंभीर बताई जा रही है।
बिहार में आए दिन ऐसी घटनाएं हो रहीं हैं, जिसे राष्ट्रीय महत्व की खबर कहना चाहिए लेकिन उसकी पर्याप्त चर्चा तक नहीं होती है। लिंचिस्तान जैसे शीर्षक के साथ पिछले दिनों खूब सारी खबर छपती रही।
यह संयोग था कि जिन प्रदेशों की खबर चुन चुन कर भारत को लिंचिस्तान बताने का प्रयास किया जा रहा था, उन सभी प्रदेशों में भाजपा की सरकार थी। जबकि गैर भाजपा शासित राज्यों में ऐसी घटनाओं पर न मीडिया में चर्चा होती है न सोशल मीडिया पर हंगामा मचता है।
अभी कुछ दिनों पहले बिहार के कांटी (मुजफ्फरपुर) में 19 वर्षिय मोहम्मद अयान जिसे लोग निहाल नाम से जानते थे, उसकी बसतपुर गांव के छठ घाट पर पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। इस लिंचिंग की खबर पर कोई राष्ट्रीय विमर्श खड़ा नहीं हुआ। मोहम्मद अयान छठ घाट पर अपने दोस्त मोहम्मद फैजान के साथ आया था। गांव वालों ने मार-मार कर दोस्त की हालत भी गंभीर कर दी।
मामला लव जिहाद का बताया गया। बिहार की सेकुलर सरकार ने सरकारी फाइल में इसे प्रेम प्रसंग ही दर्ज किया होगा लेकिन मोहम्मद अयान और फैजान की लिंचिंग से तो वह भी इंकार नहीं कर सकती। वर्तमान में बिहार में भाजपा की सरकार होती तो पूरे देश में इस लिंचिंग पर विमर्श हो रहा होता।
दो दिन पहले की बात है, जब मधुबनी से मुख्यमंत्री के जनता दरबार में आकर एक आवेदक ने बताया कि उसके अंचल के सीओ (अंचल अधिकारी) ने कहा है कि काम कराने के लिए पचास हजार रुपए देने होंगे। इस पचास हजार में डीएम से लेकर सीएम तक पैसा जाता है।
मुख्यमंत्री के जनता दरबार में एक आवेदक ने आकर इतना गंभीर आरोप लगाया है। इस पर तो बिहार के मुख्यमंत्री को उच्च स्तरीय जांच बिठानी चाहिए थी। यदि आवेदक की बात झूठी होती और लेन देन का पैसा ऊपर तक नहीं जाता तो अधिकांश सीओ और थाना प्रभारी इतने ढीठ और मुंहजोर क्यों होते?
बिहार के मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार के लिए जीरो टॉलरेंश की बात कहते रहे हैं। इसलिए उनसे यह अपेक्षा रखी जा सकती है कि पदस्थापन व तबादले से लेकर, विकास कार्यों में कमीशन लेने तक, कमीशन के पैसे को ऊपर तक पहुंचाने तथा मंत्री, डीएम और एसपी को माहवारी रकम पहुंचाने के मामलों की जांच वे सीबाआई से कराने की अनुशंसा केन्द्र सरकार को भेजे।
बिहार के एक समाचार पत्र ने स्थानीय संपादकों को एक दिशा निर्देश भेजा है, जिसमें स्पष्ट तौर पर लिखा गया है कि जिले में सिर्फ वही खबर छापी जाए जिसका एफआईआर पुलिस दर्ज करे। लेकिन समाचार पत्र के स्थानीय संपादक इस सवाल का जवाब नहीं दे पाते कि मामला यदि एफआईआर दर्ज करने से ना जुड़ा हो तो फिर वह खबर कैसे छपेगी?
बिहार के पश्चिम चंपारण के गौनाहा थाना ने एफआईआर दर्ज ना करने के एक मामले में एक साल के बाद लिख कर दिया है कि एफआईआर दर्ज किया जाना चाहिए या नहीं, इस दिशा में उनका अनुसंधान जारी है। जबकि एफआईआर पीड़ित का अधिकार है। यदि इस अधिकार की भी जांच एक साल तक बिहार का एक थाना कर रहा है फिर पीड़ित के न्याय की लड़ाई कितनी लंबी चलनी है, इसका अनुमान लगाया जा सकता है।
दरभंगा शहर में एक गर्भवती महिला को जलाकर मार दिया गया। बिहार में हर तरफ चुप्पी छाई रही। मिथिला जिसे राजनीतिक रूप से सबसे जागरूक क्षेत्र माना जाता है। उसकी जागरूकता पर गर्भवती महिला हत्याकांड कालिख पोत गया। इस मामले में परिवार स्थानीय थाने में फोन करता रहा लेकिन पुलिस ने इस पूरे मामले को अनसुना किया। परिवार की जान खतरे में है, यह बात स्थानीय थाने को पता थी लेकिन उसने सुरक्षा की समुचित व्यवस्था नहीं की। फिर होना क्या था?
कानून व्यवस्था को धत्ता बताते हुए भू-माफियाओं ने जबरन बुलडोजर से पीड़ित के घर को ढहाने की कोशिश की। जब पीड़ित परिवार ने विरोध किया तो भू माफिया के गुर्गो ने बीच शहर में घर में आग लगा दी। गर्भवती महिला को जिंदा जला दिया। घर में मौजूद सभी सदस्य आग में झुलसा दिए गए। जब छोटी से छोटी खबर आज के समय में वायरल हो रही है। इसी साल हुई इस नृशंस घटना की जानकारी बिहार के अधिकांश लोगों को भी नहीं है।
जेपी आंदोलन से जुड़े रहे आंदोलनकर्मी पंकज इन दिनों ओडिशा यात्रा पर हैं। उन्होंने बताया कि बिहार की स्थिति ओडिशा से भी खराब है। पंकज के अनुसार ओडिशा में लगभग तीन लाख परिवारों को वनाधिकार कानून के अन्तर्गत जोत की भूमि का पट्टा मिला है और जयप्रकाश-लोहिया का नाम लेकर चल रही बिहार सरकार में एक भी परिवार को जोत की भूमि का पट्टा नहीं मिला है।
यदि बिहार की नीतीश सरकार वास्तव में बिहार में परिवर्तन को लेकर गंभीर है तो उसे समाचार को दबाकर नहीं बल्कि अपने काम को दिखाकर समाज में वाहवाही लूटनी चाहिए।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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