नकलची फिल्मकारों के रहते भारतीय फिल्मों को ऑस्कर कैसे मिलेगा?
भारत में ये हाइड एंड सीक जैसा गेम है, इंटरनेशनल फीचर फिल्मों की श्रेणी में ऑस्कर अवॉर्ड पाने के लिए एक सामान्य सा नियम है, वो ये कि मूवी का आइडिया या प्लॉट थोड़ा अलग होना चाहिए, कहीं से कॉपी किया हुआ ना हो। अब सोचिए दुनियाभर में हजारों मूवीज साल भर में ही बनती हैं, अब तक लाखों मूवीज बन चुकी होंगी। आपकी जानकारी में कौन ऐसा व्यक्ति है, जिसने ये सारी मूवीज देखी हो? फिल्मी ज्यूरी में सदस्य बनने वाले विशेषज्ञ भी विदेशों की मशहूर मूवीज ही देख पाते हैं। अब ऐसे में ये कैसे पता चले कि जो मूवी ऑस्कर भेजे जाने के लिए ज्यूरी के पास आई है, उसमें से किसका आइडिया कॉपी का है?

'छेल्लो शो' का ऑस्कर के लिए नामांकन और विवाद
लेकिन जनता के बीच बहुत सारे मूवी लवर्स होते हैं, जो अक्सर ऐसी मूवीज के बारे में पड़ताल करके ये पता कर लेते हैं कि ये आइडिया तो फलां विदेशी फिल्म से कॉपी किया हुआ है। ताजा मामला 2023 ऑस्कर एकेडमी अवॉर्ड्स के लिए भारतीय एंट्री के तौर पर चुनी गुई फ्रेंच इंडिया को-प्रोडक्शन की गुजराती फिल्मी 'छेल्लो शो (यानी आखिरी शो)' का है। इस मूवी पर आरोप लगे हैं कि ये मूवी 1988 में रिलीज हुई इटेलियन मूवी 'सिनेमा पेराडिसो' की कॉपी है।
दरअसल दोनों मूवीज की कहानी काफी मिलती जुलती है कि कैसे एक छोटा बच्चा मूवीज का शौकीन बन जाता है। उसकी दोस्ती प्रोजेक्टर पर सिनेमा दिखाने वाले प्रोजेक्शनिस्ट से हो जाती है। जो उसको ना केवल प्रोजेक्टर रूम में बैठाकर मुफ्त में मूवी दिखाता रहता है बल्कि उसे प्रोजेक्टर चलाना भी सिखाता है। बाद में वही लड़का बड़ा होकर एक दिन बड़ा डायरेक्टर बनता है और एक दिन जब उस प्रोजेक्शनिस्ट की मौत होती है तो एक आखिरी शो उसके नाम रखता है। अब फिल्म डायरेक्टर से लेकर ऑस्कर के लिए चुनने वाली संस्था फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया (एफएफआई) के प्रमुख कह रहे हैं कि मूवी प्रेरित तो है उस इटेलियन मूवी से लेकिन पूरी कॉपी नहीं है।
चुराये हुए आइडिया पर चलता बॉलीवुड
ये कोई पहली बार नहीं है कि हम भारतीय अपनी ही भेजी मूवी पर शर्मिंदा हुए हों। मूल आइडिया ढूंढ नहीं पाते तो इतने बेशर्म होकर चुराए हुए आइडिया वाली मूवी के लिए क्यों ऑस्कर में आवेदन करते हैं? और चयन प्रक्रिया में भी कैसे ये सब पहचान या पड़ताल नहीं कर पाते? और जब बार बार यही सब होता है, तो ऐसे लोगों का ज्यूरी में काम ही क्या है? उन फिल्ममेकर्स के लिए सजा का प्रावधान क्यों नहीं होता, जो भारत की ऑफीशियल एंट्री के लिए आइडिया चुराकर बनाई मूवी का आवेदन करते हैं? सजा का प्रावधान होते ही, ऐसे सभी लोग अपनी मूवीज भेजने से ही कतराएंगे। ऐसे मामलों में मूवी मेकर से ज्यादा देश और सरकार की फजीहत होती है।
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पिछले साल जो तमिल मूवी 'कोझंगल (पेबल्स)' ऑस्कर के लिए भेजी गई थी, उस पर आइडिया कॉपी करने के भले आरोप ना लगे हों, लेकिन मूवी का क्लाइमेक्स उस सीन पर खत्म होता है, जहां एक बड़े से गड्ढ़े में उतरकर हीरो की पत्नी पानी निकाल रही है। ये उस दौर में फिल्माया गया, जब जलजीवन मिशन में पांच करोड़ से अधिक टैप वॉटर कनेक्शन देश में दिए गए थे।
ऑस्कर के लिए भेजी जाती हैं कॉपी पेस्ट फिल्में
हाल के वर्षों में रणवीर सिंह की 'गली बॉय' से लेकर राजकुमार राव की मूवी 'न्यूटन' तक ऑस्कर में भेजी गई हैं और सब पर आइडिया कॉपी करने का आरोप लगा। 'गली बॉय' 2002 में आई हॉलीवुड की '8 माइल्स' की कॉपी थी, बस इसको भारतीय अंदाज में फिल्माया गया था, सो इसकी आलोचना होनी ही थी। 'न्यूटन' के मेकर्स तो दो कदम आगे निकल गए थे। ईरानी फिल्म 'सीक्रेट बैलट' से ये मूवी काफी हद तक मिलती जुलती है। इतना ही नहीं लोगों ने ये तक खोज निकाला कि इस मूवी का पोस्टर भी सत्यजीत रे की मूवी 'गणशत्रु' का एकदम कॉपी निकला। बीच में चेहरा और चारों तरफ से गोलाई में उस चेहरे पर तनीं उंगलियां। सोचिए, ये दोनों बड़े स्टार्स की मूवीज हैं और दोनों को भारत की तरफ से ऑस्कर के लिए भेजा गया था। यानी उस जगह जहां मूल आइडिया ना हो तो फिल्में भेजना ही बेमानी है।
इस तरह हम अपनी लड़ाई फिल्म चुनने में ही हार जाते हैं। क्योंकि मूवी मेकर सच छुपा रहा है और ज्यूरी में बैठा कोई व्यक्ति उसकी मदद कर रहा है। ऐसे में मूल आइडिया पर बनी बाकी मूवीज के लिए ये नाइंसाफी जैसा है। इसी तरह का नुकसान गली बॉय के चलते 'तुम्बाड़' को उठाना पड़ा था। 'द गुड रोड' के चलते इरफान खान की 'लंच बॉक्स' को उठाना पड़ा था। जो इस बार 'आरआरआर' और 'कश्मीर फाइल्स' जैसी मूल आइडियाज वाली मूवीज को उठाना पड़ रहा है।
ऑस्कर के लिए मूवी का चयन और फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया की भूमिका
ऑस्कर के लिए जो मूवी भारत से चुनी जाती है, उसकी चयन प्रक्रिया समझिए। इसको चुनने की जिम्मेदारी फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया (FFI) नाम की संस्था की है। एफएफआई हर साल जितनी भी प्रोडयूसर्स की संस्था हैं, उनसे आवेदन मंगाती है। वो संस्थाएं अपने सदस्य प्रोडयूसर्स को खबर करके आवेदन के लिए बोलते हैं। उसके बाद सभी प्रोडयूसर्स से जो एंट्रीज आती है। उन्हें एक 17 सदस्यीय ज्यूरी देखती है औऱ वोटिंग के जरिए एक नाम तय करती है। जाहिर है फिल्म निर्माण और वितरण से जुड़े लोग ही इस ज्यूरी में होते हैं, तो विषय विशेषज्ञ तो वो लोग होते ही हैं। सालों से टीपी अग्रवाल फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया के प्रेसीडेंट की भूमिका में हैं। आप इसकी ताकत इस बात से समझ सकते हैं कि देश भर के 18000 प्रोडयूसर्स, 20,000 डिस्ट्रीब्यूटर्स और करीब 12000 सिनेमा मालिक फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया से जुड़े हुए हैं।
ऐसे में एफएफआई पर भी सवाल उठने शुरू हो गए हैं। द फेडरेशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया सिने एम्पलॉयीज (FWICE) ने कड़ा विरोध जताते हुए कहा है कि एफएफआई इस पर फिर से विचार करे और नई मूवी ऑस्कर के लिए भेजने की कोशिश करे। उनका कहना है कि ये मूवी तो इंडिया की भी नहीं है बल्कि फ्रांस की है। उसके डायरेक्टर पैन नलिन ने हालांकि बचाव की कोशिश की है, लेकिन आरआरआर और कश्मीर फाइल्स के फैन सोशल मीडिया पर अब इस मामले में खुलकर माहौल बना रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि सबसे बड़ा जिम्मेदार कौन?
जाहिर है ऑस्कर के लिए ज्यूरी चुनी जा रही है और मूल आइडिया होना पहली शर्त है तो ज्यूरी में साउंड रिकॉर्डिस्ट, ड्रेस डिजाइनर और यहां तक कि म्यूजिक कम्पोजर की जरुरत ही क्यों है? जैसा कि इस ज्यूरी में लोग इन क्षेत्रों के रखे गए हैं। दूसरे उस फिल्ममेकर के लिए सजा का प्रावधान क्यों नहीं, जो किसी भी स्टेज पर आइडिया कॉपी करने का दोषी पाया जाता हो?
जब मूवी रिलीज होने के बाद ही भेजना शर्त है तो क्यों नहीं पब्लिक से ही पूछ लिया जाता कि ये मूवीज पर हम विचार कर रहे हैं, आपको लगता है कि इनका आइडिया मूल नहीं हैं तो हमें बताएं? जब पीएम मोदी पब्लिक से राय मांग सकते हैं तो एफएफआई को समस्या क्या है? इससे ना संस्था की जगहंसाई होगी, ना ज्यूरी की और देश की भी इज्जत बचेगी। उम्मीद करिए कि 'छेल्लो शो' का ये विवाद 'छेल्लो' (आखिरी) ही साबित हो।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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