Rahul Gandhi: राहुल के कटघरे में मोदी अडानी के साथ मीडिया भी

Rahul Gandhi: फाईनेंशियल टाईम्स की एक खबर के हवाले से राहुल गांधी ने एक बार फिर उद्योगपति गौतम अडानी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला बोला है| फाईनेंशियल टाईम्स में यह खबर 12 अक्टूबर को छपी थी, 18 अक्टूबर को सुबह एक विशेष प्रेस कांफ्रेंस करके राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि अडानी ने 2019 से 2021 के बीच इंडोनेशिया से ज्यादा कीमतों के बिल दिखा कर कोयला आयात किया| उनका आरोप है कि आयातित कोयले को महंगा दिखा कर अडानी की कंपनी महंगी बिजली बेच रही है, जबकि सच यह है कि अडानी ने दिखाई गई कीमत पर कोयला आयात नहीं किया था|

अडानी ग्रुप के गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और झारखंड राज्यों में 9 बिजली संयंत्र हैं| इन सात में से तीन कांग्रेस शासित राज्य हैं, एक कांग्रेस समर्थक राज्य है और जिस समय के आयात का हवाला इस रिपोर्ट में दिया गया है उस समय दो अन्य राज्य महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश भी कांग्रेस शासित राज्य थे| सिर्फ गुजरात ही एकमात्र ऐसा राज्य है, जो कांग्रेस शासित राज्य नहीं है|

congress rahul gandhi targeted media along with narendra modi and adani

राहुल गांधी ने फाईनेंशियल टाईम्स की रिपोर्ट को घरेलू बाजार में बिजली की कीमतों से जोड़ कर इसे राजनीतिक मुद्दा बनाया और अपनी प्रेस कांफ्रेंस में राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के मतदाताओं को संबोधित किया| अब सवाल पैदा होता है कि इन तीनों राज्यों में अडानी सीधे घरों में बिजली सप्लाई करते हैं, या वह राज्य सरकारों को बेचते हैं और राज्य सरकारें बिजली की कीमत तय करके सप्लाई करती हैं| राहुल गांधी ने कहा कि आम युवा या महिला जब बिजली का बटन दबाते हैं, तो उसका पैसा सीधे अडानी की जेब में चला जाता है|

राहुल गांधी का आरोप यह है कि अडानी ने कथित तौर पर आयातित कोयले की कीमत बढ़ा चढ़ा कर दिखाई और भारत में अडानी ग्रुप जहां जहां भी बिजली सप्लाई करता है, वहां बिजली की कीमतें बढ़ गईं| फाईनेंशियल टाईम्स ने अपनी रिपोर्ट में इस तरह के कई उदाहरण दिए हैं, जिनमें दिखाया गया है कि इंडोनेशिया से कोयला जहाज पर लादा गया तो रिकार्ड में उसकी कीमत क्या थी, और जब वह भारत पहुंचा तो उसकी कीमत क्या दिखाई गई थी|

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दिए गए कई उदाहरणों में से एक उदाहरण जनवरी 2019 का है, पनामा के झंडे तले डीएल अकेशिया जहाज 74,820 टन थर्मल कोल लेकर इंडोनेशिया से भारत के लिए रवाना हुआ था| निर्यात रिकार्ड में इस कोयले की कीमत 1.9 मिलियन डॉलर थी, लेकिन जब यह जहाज अडानी संचालित गुजरात के मुंद्रा बन्दरगाह पर पहुंचा, तो इसकी कीमत 4.3 मिलियन डालर दिखाई गई थी|

फाईनेंशियल टाईम्स का दावा है कि उसने 2019 से लेकर 2021 के बीच ऐसे 30 मामलों की पड़ताल की और हर मामले में पाया गया कि इंडोनेशिया से जब जहाज चला तो कीमत कुछ और थी, लेकिन जब वह भारत पहुंचा तो कीमत कई गुना बढ़ रही थी| इन तीस जहाजों में 3.1 मिलियन टन कोयला आयात हुआ, जिसकी कुल कीमत 139 मिलियन डालर थी, इस की शिपमेंट और बीमा लागत 3.1 मिलियन डालर थी, लेकिन भारत में सीमा शुल्क अधिकारियों के सामने कीमत 215 मिलियन डालर बताई गई| जिससे साबित होता है कि शिपमेंट के दौरान ही 73 मिलियन डालर का मुनाफ़ा हो गया|

अडानी ने इन सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि फाईनेंशियल टाईम्स की सारी कहानी पुराने और निराधार आरोपों पर आधारित है| असल में इससे पहले भी सात साल पहले 2016 में भारतीय वित्त मंत्रालय की आर्थिक अपराध की जांच करने वाली राजस्व खुफिया निदेशालय की जांच रिपोर्ट में भी कोयले की आयातित लागत बढाने का आरोप लगाया गया था| उस समय जिन 40 कंपनियों पर आयातित कोयले की ज्यादा कीमत दिखाने का आरोप था, उनमें से पांच अडानी की कंपनियां थी| जिसमें कहा गया था कि विदेशों में पैसा निकालने और बिजली कंपनियों से ज्यादा वसूली के लिए इंडोनेशियाई कोयले की कीमत बढ़ाकर दिखाई गई है|

राजस्व खुफिया निदेशालय ने अपने नोटिस में 50 से लेकर 100 प्रतिशत कीमत बढा कर दिखाने का आरोप लगाया था| नोटिस में यह भी कहा गया था कि जब कोयला सीधे इंडोनेशिया से भारत आता है, तो बिलिंग के चालान किसी तीसरे देश की कंपनी के क्यों होते हैं| इसका मतलब साफ़ है कि बिचौलियों को बीच में डाल कर मनी लांड्रिंग के लिए कीमत बढ़ाई जाती है| इस रिपोर्ट के बाद गुजरात प्रदेश कांग्रेस ने 2018 से बिजली के लिए अधिक शुल्क लेने का आरोप लगाया था|

अडानी ग्रुप ने फाईनेंशियल टाईम्स को भेजे अपने जवाब में कहा है कि डीआरआई ने जिन 40 कंपनियों पर ओवर बिलिंग के आरोप लगाए थे, उनमें से एक मामले में डीआरआई ने खुद सुप्रीमकोर्ट में दायर अपील वापस ले ली| जिससे साबित हुआ कि डीआरआई का ओवर बिलिंग का आरोप सही नहीं था| डीआरआई ने ओवर बिलिंग का आरोप लगाते समय जिन दस्तावेजों का सहारा लिया था, सीमा शुक्ल प्राधिकरण ने उन दस्तावेजों की प्रामाणिकता ही नकार दी थी| फर्क यह है कि अडानी ग्रुप ने अपने जवाब में 2016 की घटना का जिक्र किया है, जिसमें डीआरआई के ओवर बिलिंग के आरोपों को प्राधिकरण ने ही गलत पाया था, लेकिन फाईनेंशियल टाईम्स की नई रिपोर्ट 2019 से 2021 के बीच के 30 आयातों पर आधारित है|

राहुल गांधी ने फाईनेंशियल टाईम्स की रिपोर्ट को उम्दा किस्म की पत्रकारिता करार देते हुए, भारतीय मीडिया को कटघरे में खड़ा किया है| उन्होंने सवाल किया है कि भारतीय समाचार पत्रों और न्यूज चैनलों पर ऐसी खोजी खबरें क्यों नहीं आती| लेकिन सवाल यह है कि क्या यह भी उसी तरह का मामला है जब 2016 में डीआरआई ने ओवर बिलिंग का केस बनाया था, लेकिन प्राधिकरण के फैसले के बाद खुद ही अपील कोर्ट से वापस ले ली थी| अगर यह भी उसी तरह का मामला निकला, तो यह किस तरह की उम्दा रिपोर्टिंग का उदाहरण होगा| राहुल गांधी भारतीय मीडिया पर लगातार हमला कर रहे हैं, कुछ दिन पहले उन्होंने अपनी प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकारों की जाति पूछ ली थी, ठीक उसी तरह, जैसे एक जमाने में कांशीराम और मायावती पत्रकारों से उनकी जाति पूछ लिया करते थे|

फाईनेंशियल टाईम्स की रिपोर्ट को तब तक सही नहीं माना जा सकता, जब तक डीआईआर जांच के बाद उस पर अपनी राय न बनाए, हालांकि 2016 में डीआईआर की जांच भी प्राधिकरण ने गलत ठहरा दी थी| इसलिए फाईनेंशियल टाईम्स की किसी रिपोर्ट को अंतिम सत्य मान कर भारतीय मीडिया पर सवाल खड़े करना राहुल गांधी की राजनीतिक अपरिपक्वता का सबूत है| यह बात सही है कि फाईनेंशियल टाईम्स ने अपनी जांच को आगे बढ़ाने के लिए अडानी ग्रुप के जवाब को डीआरआई को उसकी टिप्पणी के लिए भेजा था, लेकिन फाईनेंशियल टाईम्स कहता है कि डीआरआई ने पूछे गए सवालों का कोई जवाब ही नहीं दिया|

भारत के लोग अच्छी तरह जानते हैं कि सरकारी विभागों में जवाब कितनी तेजी से दिए जाते हैं| लेकिन डीआरआई के जवाब नहीं आने को फाईनेंशियल टाईम्स ने कहा कि इससे साबित होता है कि अडानी और प्रधानमंत्री के प्रशासन में कितनी मिलीभगत है| फाईनेंशियल टाईम्स की यह टिप्पणी दर्शाती है कि पूरी रिपोर्ट किस इरादे से लिखी गई है| यह वही आरोप है जो जार्ज सोरोस लगाते रहे हैं, जिसे बाद में राहुल गांधी दोहराते रहे हैं कि मोदी अडानी की दोस्ती के चलते प्रशासन पंगु हो गया है|

हालांकि फाईनेंशियल टाईम्स की स्टोरी में कुछ भी नया नहीं है, नई बोतल में पुरानी शराब की तरह है, फर्क सिर्फ इतना है कि गुजरात की स्टोरी चल कर दिल्ली आ गई है| फाईनेंशियल टाईम्स की आगे की सारी स्टोरी अडानी ग्रुप के खिलाफ पुरानी खुन्नस पर आधारित है, जिसमें कहा गया है कि किस तरह मोदी अडानी के संरक्षक बने हुए हैं, और किस तरह मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद अडानी की कंपनी भारत की सबसे बड़ी निजी थर्मल पावर कंपनी और सबसे बड़ा निजी बंदरगाह ऑपरेटर बन गई है| इस साल की शुरुआत में अडानी को दुनिया का तीसरा सबसे अमीर आदमी माना गया था, लेकिन जब जनवरी में अमेरिकी लघु कंपनी हिंडनबर्ग रिसर्च उन पर "कॉर्पोरेट इतिहास में सबसे बड़ा घोटाला" करने का आरोप लगाया तो उनके समूह का मूल्य 288 बिलियन डॉलर की ऊंचाई के आधे से भी कम हो गया था|

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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