Congress Leaders in BJP: क्या 2024 का चुनाव राहुल कांग्रेस बनाम मोदी कांग्रेस बन गया है?
शुरू शुरू में भाजपा के नेता और कार्यकर्ता गिनती करते थे कि चुनावों में कितने पूर्व कांग्रेसियों को भाजपा का टिकट मिला, लेकिन अब यह गिनती करना उन्होंने बंद कर दिया है। कांग्रेस के पूर्व नेता संजय झा की एक्स पर की गई टिप्पणी भारतीय जनता पार्टी की वर्तमान दशा का बाखूबी बयान करती है।
उन्होंने लिखा है कि 2024 का लोकसभा चुनाव राहुल गांधी की कांग्रेस और मोदी की कांग्रेस के बीच होगा। कांग्रेस मुक्त भारत का मतलब यह तो नहीं था कि सारे कांग्रेसी भाजपा में शामिल कर लिए जाएं, और उन्हीं को राज्यसभा, लोकसभा और विधानसभाओं की टिकट देकर भाजपा को ही कांग्रेस बना दिया जाए।

सत्ता की इस अंधी चाह में डाक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी और दीनदयाल उपाध्याय के आदर्शों वाली भाजपा कहीं खो गई है। कांग्रेस मुक्त भारत की जगह पर भाजपा मुक्त भारत हो गया है। जनसंघ के परिवारों से निकले भाजपा के कार्यकर्ता डा. मुखर्जी, दीन दयाल उपाध्याय, डा. रघुबीर, बलराज मधोक, अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी के सिद्धांतों और आदर्शों वाली भाजपा खोज रहे हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने जनता पार्टी से टूट कर बनी भाजपा को उसी तरह अपने प्रचारक भेजना जारी रखा था, जैसे जनसंघ में संघ के प्रचारक पार्टी की रीढ़ की हड्डी हुआ करते थे। वे पार्टी में विचारधारा का संचालन करते थे। वे अब भी पार्टी में संगठन महामंत्रियों के पद पर विराजमान हैं, लेकिन जिस काम के लिए उन्हें पार्टी में लाया गया था, वह काम अब गैर जरूरी सा हो गया है। क्योंकि पार्टी का लक्ष्य अपने एजेंडे को लागू करने के लिए चुनावी राजनीति में नेहरू परिवार की कांग्रेस पर विजय को बरकरार रखना है।
जनसंघ परिवारों से आए भाजपा कार्यकर्ताओं की सोच कुछ भी हो, नरेंद्र मोदी ने साम दाम दंड भेद का इस्तेमाल करके वह हासिल कर लिया, जो पहले के सभी नेता नहीं कर पाए थे। जनसंघ के संस्थापक डाक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जम्मू कश्मीर में दो निशान (जम्मू कश्मीर का अलग झंडा), दो विधान (जम्मू कश्मीर का अलग संविधान) दो प्रधान (जम्मू कश्मीर का अलग प्रधानमंत्री) के खिलाफ अपने प्राणों की बाजी लगाई।

अनुच्छेद 370 हटा कर जम्मू कश्मीर को भारत का अभिन्न बनाने का वह लक्ष्य अटल आडवाणी की भाजपा छह साल सत्ता में रहने के बावजूद हासिल नहीं कर सकी थी। लेकिन दुबारा सत्ता में आने के बाद मोदी ने सबसे पहला काम यही किया, अब न वहां दो संविधान हैं, न दो निशान। वजीर-ए-आला का पद तो पहले ही खत्म हो गया था।
नरेंद्र मोदी पर आरोप लगता है कि उन्होंने भाजपा को कांग्रेस बना दिया। लेकिन इसे दूसरे नजरिए से देखिए, उन्होंने बड़ी तादाद में कांग्रेसियों को भाजपा में लाकर यह साबित कर दिया कि कांग्रेस के अनेक जमीनी नेता नीतियों के कारण कांग्रेस के साथ नहीं थे, वे सिर्फ सत्ता की मलाई खाने के लिए कांग्रेस के साथ थे।
भाजपा के विस्तार की कोशिश तो अटल और आडवाणी ने भी की थी, याद कीजिए 1980 में भाजपा का गठन करते समय अटल बिहारी वाजपेयी ने गांधीवादी समाजवाद को पार्टी की विचारधारा बनाया था। वह जवाहर लाल नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी तक सभी कांग्रेसी प्रधानमंत्रियों की सरकारों में मंत्री रहे मोहम्मदिल करीम छागला और नामी वकील राम जेठमलानी को मुम्बई में पार्टी के स्थापना मंच पर लेकर आए थे।
लाल कृष्ण आडवाणी ने मुसलमानों का दिल जीतने के लिए पाकिस्तान जाकर जिन्ना की तारीफ़ की थी। लेकिन वे दोनों ही सफल नहीं हुए, क्योंकि हिन्दू ऐसी भाजपा की कल्पना नहीं करते थे, जो सत्ता के लिए सिद्धांतों के साथ समझौता करे। भाजपा के श्रीराम जन्मभूमि आदोलन में कूदने के बाद हिन्दू फिर से भाजपा से जुड़ने लगे थे। लेकिन वाजपेयी और आडवाणी ने सत्ता के लिए एनडीए बनाकर भाजपा के तीनों प्रमुख मुद्दों से समझौता किया।
नरेंद्र मोदी संघ की भट्टी में तपे हुए विचारधारा के पक्के भाजपाई हैं, वह भाजपा को इसलिए सत्ता दिला पाए क्योंकि गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने देश भर के हिन्दुओं का विश्वास जीता था। लेकिन 2014 में मोदी के नेतृत्व में आई हिन्दू क्रान्ति तब तक अधूरी थी, जब तक जम्मू कश्मीर से 370 नहीं हटाया गया।
2014 से 2019 तक मोदी कुछ ज्यादा नहीं कर पाए, भाजपा के तीनों ही मुद्दों पर उन्होंने कोई काम नहीं किया, लेकिन तीन तलाक जैसे मुद्दे पर बिल पास करवा कर उन्होंने एक प्रतिबद्धता दिखा दी कि वह कट्टरपंथी मुस्लिमों के आगे कतई नहीं झुकेंगे। यह एक संकेत था कि जैसे ही दोनों सदनों में बहुमत मिलेगा, वह भाजपा के तीनों एजेंडों श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर, जम्मू कश्मीर से 370 हटाने और समान नागरिक संहिता का काम पूरा करेंगे।
इसके बावजूद 2019 के चुनाव से पहले भारी तादाद में कांग्रेसी भाजपा से जुड़े, क्योंकि उनकी विचारधारा कुछ नहीं थी, उनकी विचारधारा सिर्फ सत्ता थी। दुबारा सत्ता में आते ही मोदी ने तीन महीने के भीतर जम्मू कश्मीर से 370 को हटाकर जनसंघ के संस्थापक डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को राष्ट्र की सच्ची श्रद्धांजली दे दी।
2024 के चुनाव से पहले कांग्रेस में एक बार फिर भगदड़ मची है। भाजपा के सामने पहले से भी बड़ा जनादेश हासिल करके समान नागरिक संहिता का एजेंडा पूरा करना और फिर मथुरा काशी के मंदिर मुक्त करवाना है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक कांग्रेस और अन्य दलों के नेता अपनी अपनी पार्टियां छोड़कर भाजपा में शामिल हो रहे हैं।
1996 और 1998 में सत्ता हासिल करने के लिए भाजपा ने अपने तीनों मुद्दों से समझौता किया था। अब भाजपा अपने तीनों मुद्दों पर कायम रहते हुए राजनीतिक दलों और राजनीतिक दलों के नेताओं को भाजपा में आने और भाजपा के साथ आने को मजबूर कर रही है।
जम्मू कश्मीर की नेशनल कांफ्रेंस की एमएलसी शहनाज़ गनई, पंजाब के कांग्रेसी नेता अमरिंदर सिंह और सुनील जाखड़, हरियाणा के अशोक तंवर, हिमाचल में हर्ष महाजन, उत्तराखंड के विजय बहुगुणा और किशोर उपाध्याय, उत्तर प्रदेश के जगदम्बिका पाल और रीता बहुगुणा, मध्यप्रदेश के ज्योतिरादित्य सिंधिया, महाराष्ट्र के अशोक चव्हाण और मिलिंद देवड़ा, आंध्र प्रदेश के किरण कुमार रेड्डी, कर्नाटक के एसएम कृष्णा, इनमें कई कांग्रेस नेता अपने अपने प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष या कांग्रेस के मुख्यमंत्री रहे हैं।
पूर्व प्रधानमंत्री और पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष नरसिम्हा राव का पोता एन.वी. सुभाष, पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का पोता विभाकर शास्त्री, कांग्रेस के महासचिव रहे ए.के. एंटनी का बेटा अनिल एंटनी, पूर्व कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी का बेटा समीर द्विवेदी, कांग्रेस के उपाध्यक्ष और दो दो प्रधानमंत्रियों राजीव गांधी और नरसिंह राव के राजनीतिक सलाहकार रहे जितेन्द्र प्रसाद का बेटा जितिन प्रसाद जब भाजपा का दामन थाम लेते हैं, तो क्या यह नहीं दर्शाता कि वे और उनका परिवार विचारधारा के कारण कांग्रेस के साथ जुड़ा हुआ था, या सत्ता के कारण। जब तक नेहरू परिवार उन्हें सत्ता दिला सकता था, तब तक वे कांग्रेस के साथ थे, जैसे ही उन्हें लगा कि अब नरेंद्र मोदी उन्हें सत्ता दिला सकते हैं, तो वे भाजपा में शामिल हो गए।
मिलिंद देवड़ा और अशोक चव्हाण का अगर लोकसभा का टिकट फाईनल हो जाता तो वे कांग्रेस में रहते, कमलनाथ को अगर राज्यसभा का टिकट मिल जाता, तो वह भाजपा में जाने के बारे में सोचते ही नहीं। दलबदल करके भाजपा में शामिल होने वालों का कोई दीन, ईमान और विचारधारा नहीं है। सत्ता में हिस्सेदारी ही उनका लक्ष्य है।
मोदी समर्थकों को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कांग्रेस से कौन भाजपा में शामिल हो रहा है, उनका मकसद मोदी की विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता है। नरेंद्र मोदी हिंदुत्व की विचारधारा से कोई समझौता नहीं कर रहे, हिन्दुओं के लिए यही काफी है। हाँ भाजपा के पुराने कार्यकर्ताओं को तब जरुर तकलीफ होती है, जब नरेंद्र मोदी भाजपा में शामिल होते ही नारायण राणे, अशोक चव्हाण, आरपीएन सिंह, और ज्योतिरादित्य सिंधिया को राज्यसभा में लाकर मंत्री बना देते हैं, जिनके परिवारों के साथ उन्होंने दशकों तक संघर्ष किया, उन्हें रातों रात उनका नेता बना देते हैं।
समाज में यह आम धारणा है कि कांग्रेस या अन्य दलों से भाजपा में शामिल होने वालों को उच्च सदन का सदस्य नहीं बनाना चाहिए, वे चुनाव जीत कर आएं, तभी उन्हें सरकार में शामिल किया जाना चाहिए। वरना लगता है कि मोदी भाजपा को कांग्रेस ही बना रहे हैं, आज वे नेता सत्ता के लिए भाजपा में आए है, कल वे सत्ता के लिए भाजपा छोड़ कर किसी अन्य दल में चले जाएंगे।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












Click it and Unblock the Notifications