Govinda: फिल्मी सितारों ने भी किया कांग्रेस से किनारा
Govinda: फिल्म अभिनेता गोविन्दा ने जब अपना राजनीतिक वनवास खत्म करना जरूरी समझा तो इस बार उन्होंने कांग्रेस की बजाय शिवसेना (शिन्दे) को चुना। लेकिन अकेले गोविन्दा ही नहीं है जिन्होंने कांग्रेस से दूरी बना ली है। बदलते समय के साथ अब फिल्मी सितारे कांग्रेस से दूर हो गये हैं।
ये चुनाव शायद कांग्रेस के लिए इसलिए भी सबसे बुरा चुनाव है कि अभी तक फिल्मी दुनिया का कोई ऐसा बड़ा चेहरा सामने नहीं आया है जो कांग्रेस के लिए टिकट मांगना तो दूर, प्रचार करने के लिए भी तैयार हो। बल्कि जहां जहां कंगना, अरुण गोविल और हेमा जैसे फिल्मी दुनिया के सितारे बीजेपी के प्रत्याशी हैं, वहां भी कांग्रेस या उसकी सहयोगी पार्टियां असमंजस में हैं।

आलम ये हो गया है कि स्वरा भास्कर तक का नाम कांग्रेस से उछाला जाने लगा, जबकि मुंबई से ही उर्मिला मातोंडकर कांग्रेस की टिकट लेकर अपने हाथ जला चुकी हैं। हालांकि बीजेपी के जो पक्के विरोधी फिल्मी दुनिया में हैं, वो कांग्रेस से सुहानूभूति जरूर रखते हैं, जैसे राजेश खन्ना की बेटी ट्विंकल खन्ना, स्वरा भास्कर, अनुराग कश्यप, नसीरुद्दीन शाह, जावेद अख्तर, फरहान अख्तर, विक्रांत मैसी, महेश भट्ट, रजा मुराद, दिया मिर्जा आदि। लेकिन वो भी कांग्रेस के प्रचार में नहीं उतरना चाहते।
इसलिए कांग्रेस का यह शायद पहला दौर है, जब उसके पास ना बलराज साहनी जैसा बड़ा चेहरा है, ना दिलीप कुमार जैसा करिश्माई प्रचारक, ना केवल चेहरे के दम पर लाखों की भीड़ खींच लेने वाला राजेश खन्ना जैसा सुपर स्टार और ना महानायक अमिताभ बच्चन। सुनील दत्त, नरगिस जैसी लोकप्रिय जोड़ी भी अब नहीं है और ना ही शाहरुख खान अब अपनी फिल्मों के स्पेशल शो राहुल और प्रियंका के लिए आयोजित करते हैं।
नेहरूजी के दौर में शिक्षा, इतिहास और फिल्मी दुनिया में वामपंथी बुद्धिजीवियों ने अपनी गहरी पैठ बनायी। ऐसे में कमला नेहरू के दूर के रिश्तेदार ए के हंगल जो दो साल एक वामपंथी आंदोलन के चलते पाकिस्तान की जेल में रहकर आए थे, उनको मुंबई फिल्म इंडस्ट्री ने हाथों हाथ लिया। नेहरूजी ने भी सिनेमा की ताकत को पहचाना और पृथ्वीराज कपूर को ना केवल कांग्रेस के नेताओं के लिए नाटक आयोजित करने के लिए आमंत्रित किया बल्कि उन्हें दो-दो बार राज्यसभा भी भेजा।
उसके बाद भारत के सिनेमा पर जो सोवियत संघ ने असर डासा वो आप हालिया रिलीज वेब सीरीज 'जुबली' से समझ सकते हैं कि कैसे राजकपूर की फिल्मों में सोवियत संघ का निवेश हुआ। कई देशों में नेहरूजी के पसंदीदा कलाकारों को भेजा जाने लगा। किसकी फिल्में ऑस्कर के लिए जानी हैं और किसको पदमश्री मिलना है, इससे राजनीतिक लाभ भी खूब मिला। जैसे पदमश्री पाने वाली पहली महिला अभिनेत्री नरगिस थीं, उन्हीं की फिल्म को पहली बार ऑस्कर में भेजा गया। जबकि उनकी मां जद्दनबाई से नेहरूजी का पुराना रिश्ता जगजाहिर था। इसका लाभ सुनील दत्त को भी मिला और इस जोड़ी की लोकप्रियता का लाभ कांग्रेस को भी मिला।
कई तरह के चैरिटी कार्यक्रम ये जोड़ी कांग्रेस के लिए आयोजित करती थी। इंदिरा गांधी ने भी इमरजेंसी के दौरान नरगिस की अमेरिका में शॉपलिफ्टिंग करने की खबर भारतीय मीडिया में छापने पर रोक लगा दी थी। अगर आप जर्मनी से इमरजेंसी के समर्थन में सुनील दत्त का बयान पढ़ेंगे तो हंसी आ जाएगी। वो लिखते हैं कि ना केवल यहां रहने वाले भारतीय इस कदम की सराहना कर रहे हैं बल्कि जर्मनी की जनता भी आपके समर्थन में है।
इमरजेंसी में ही कैसे हरिवंश राय बच्चन को इस्तेमाल किया गया, उन्होंने खुद अपनी आत्मकथा में लिखा है। उन्हें इमरजेंसी के समर्थन में बयान देने का पुरस्कार भी मिला। उनको 1976 में पदमभूषण से सम्मानित किया गया। हालांकि अमिताभ बच्चन को इसका नुकसान हुआ और फिल्मी पत्रिकाओं ने उन पर 15 साल तक प्रतिबंध लगाए रखा।
सुनील दत्त को बाद में कांग्रेस ने सांसद बनाया, मंत्री भी और कई चुनावों में उनका इस्तेमाल किया, खासतौर पर सौहार्द यात्राओं में। उनकी छवि काफी अच्छी थी, जो विवादों में घिरी कांग्रेस के प्रति गुस्सा कम करती रही। दिलीप कुमार की फिल्म 'गंगा जमुना' पर सेंसर बोर्ड से एक विवाद हुआ तो उन्होंने नेहरूजी से मदद मांगी। उसके बाद नेहरूजी ने दिलीप कुमार को कांग्रेस पार्टी के इलेक्शन प्रचार में कई बार उपयोग किया।
स्वयं दिलीप कुमार ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि मुझे मुंबई के नेता रजनी पाटिल से मिलने को कहा गया, फिर रजनी जहां कहते मैं वहां जाता। कांग्रेस के उम्मीदवारों के लिए प्रचार की शुरुआत दिलीप कुमार ने प्रधानमंत्री नेहरू के आग्रह पर उनके खास कृष्ण मेनन के समर्थन में बॉम्बे (अब मुंबई) में एक रैली से की थी। उस समय कृष्ण मेनन के सामने आचार्य कृपलानी खड़े हो गए थे और नेहरू की प्रतिष्ठा दांव पर लगी थी।
एक बार तो हद हो गई, जब संजय गांधी के प्रचार के लिए दिलीप कुमार सुल्तानपुर हवाई पट्टी पर उतरे और उन्हें कोई लेने नहीं पहुंचा। वहां वीराने में दो घंटे इंतजार के बाद रैली स्थल पर किसी से लिफ्ट लेकर पहुंचे तो पता चला कि रैली तो अगले दिन है। पिछले चुनावों में फिल्म एक्ट्रेस नगमा के साथ मंच से जिस तरह की बदतमीजी हुई, राहुल गांधी तक ने उन्हें नहीं भाव नहीं दिया, उससे ये भी पता चलता है कि कांग्रेस के सुनहरे दिन चले गए थे, बड़े सितारे साथ नहीं आ रहे थे, लेकिन उनके नेताओं का अहंकार बरकरार था।
जब सुनहरे दिन थे, तब नेहरूजी ने अटलजी जैसे प्रखर वक्ता को रोकने के लिए बलरामपुर के चुनावों में बलराज साहनी जैसे बड़े स्टार को प्रचार करके वहीं रुके रहने का आदेश दिया। राजीव गांधी की दोस्ती में जिस अमिताभ बच्चन को इतने सम्मान के साथ कांग्रेस लाई, बोफोर्स में एक फर्जी स्विस रेडियो स्टोरी से उनको ही फंसा दिया। कई सालों तक अमिताभ लंदन कोर्ट के चक्कर लगाते रहे।
अमिताभ नाराज हुए तो जवाब में उनसे पहले के सुपरस्टार राजेश खन्ना को ले आए। उनका जमकर इस्तेमाल किया, फिर छोटी छोटी बातों के लिए तरसा भी दिया। काका भी आखिरी दिनों में कांग्रेस से खूब नाराज रहे। रेखा को राज्यसभा में लाया गया, लेकिन कोई काम नहीं आईं।
ऐसे में जब गांधी परिवार का पीएम बनना बंद हुआ तो फिल्मी दुनिया वालों ने सबक लेकर राजनीति से थोड़ी दूरी बरतनी शुरू कर दी। लेकिन मनमोहन सिंह की सरकारों के दौरान शाहरुख खान आदि ने अपनी फिल्म के शो राहुल और प्रियंका के लिए रखने शुरू किए तो माहौल फिर गरम हुआ। फिर भाजपा में आकर उपराष्ट्रपति बनीं आमिर की रिश्तेदार नजमा हेपतुल्लाह व फिल्म समीक्षक रहे आडवाणीजी के लिए भी आमिर ने फिल्म शो रखा। कई फिल्मी सितारे बीजेपी के राज में भी राजनीति में आए।
लेकिन अब मामला बराबर का कतई नहीं रह गया है। बीजेपी विरोध में विक्रांत मैसी जैसे कलाकारों के ट्वीट कभी कभी आ जाते हैं, लेकिन कंगना या अनुपम खेर जैसे खुलकर बोलने वाले समर्थक कांग्रेस के साथ नहीं हैं। हां लेफ्ट आइडियोलॉजी वाले बीजेपी या संघ विरोधी जरूर हैं, जैसे प्रकाश राज, सुशांत सिंह, कमल हासन, स्वरा भास्कर आदि। सो ऐसा लगता है कि जब तक कांग्रेस के पास सत्ता नहीं आएगी, तब तक फिल्मी सितारे भी लौटकर उसके पास नहीं आएंगे।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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