Tobacco Warning: सिगरेट सेहत के लिए हानिकारक है, लेकिन इसका कारोबार क्यों बढ़ रहा है?
दुनिया के अधिकतर देशों में सिगरेट के इस्तेमाल के विरुद्ध बहुत सारे जागरुकता कार्यक्रम चलाए गए हैं। सख्त कदम भी उठाए गए हैं। लेकिन, इसकी बिक्री और इस्तेमाल का ग्राफ बढ़ता ही गया है।

Tobacco Warning: इस हफ्ते धूम्रपान निषेध दिवस (31 मई) के मौके पर सिगरेट को लेकर कुछ अच्छी खबरें आई हैं। तीनों अपने-अपने स्तर पर पहली हैं। जैसे कि ओटीटी पर दिखाए जाने वाले कार्यक्रमों में 'धूम्रपान स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है' चेतावनी देना अनिवार्य करने वाला भारत दुनिया का पहला देश बन गया है। स्वीडन 'यूरोप का पहला धूम्रपान मुक्त देश' बनने की ओर अग्रसर है। कनाडा ने तो एक नई ही पहल की है। इसके अंतर्गत हर सिगरेट के बट पर इंग्लिश और फ्रेंच में ये चेतावनी छापी जाएगी कि प्रत्येक कश में जहर है और सिगरेट की वजह से नपुंसकता होती है।
पहले हम धूम्रपानमुक्त देश की बात करें। यूरोपीय संघ में 27 देश हैं। उनमें 15 से अधिक उम्र वाली आबादी का औसतन 18.5% हिस्सा धूम्रपान करता है। स्वीडन का स्थान इनमें सबसे नीचे है, जहॉं रोजाना सिगरेट पीने वाली आबादी सिर्फ 5.6% ही है। एक धूम्रपानमुक्त देश का दर्जा हासिल करने के लिए जरूरी है कि यह आबादी के 5% से ज्यादा न हो। इस लिहाज से वह इसके बहुत करीब आ पहुँचा है। फ्रांस इस मामले में शीर्ष पर है, जहॉं करीब 18-75 साल आयु वर्ग वाली एक चौथाई आबादी धूम्रपान करती है। पिछले साल न्यूजीलैंड ने 1 जनवरी 2009 के बाद पैदा हुए बच्चों को तंबाकू उत्पाद बेचने पर आजीवन बैन लगाया था। ताकि, 2025 तक सिगरेट पीने वालों की तादाद को 5% तक लाया जा सके।
अब हम कनाडा चलते हैं। कम ही लोगों को पता होगा कि कनाडा में सिगरेट के विज्ञापन, प्रमोशन और स्पॉन्सरशिप पर पचास सालों से प्रतिबंध लागू है और 1972 से ही सिगरेट के पैकेटों पर वार्निंग छापी जा रही है। 2001 में विश्व में पहली बार, चित्रयुक्त चेतावनी छापना अनिवार्य करने वाला भी कनाडा ही था। इसके बावजूद कनाडा में हर साल 48 हजार लोग तंबाकू की वजह से जान गंवाते हैं। शायद इसीलिए वह चरणबद्ध तरीके से सिगरेट को प्रतिबंधित करने की तैयारी में है और उसने अप्रैल 2025 तक सभी प्रकार की सिगरेट की बिक्री पर रोक लगाने की योजना बनाई है।
भारत है दूसरे नंबर पर
आप सोच रहे होंगे कि सिगरेट का धुंआ उड़ाने के मामले में हम हिंदुस्तानी कहॉं ठहरते हैं। फाउंडेशन फॉर ए स्मोक फ्री वर्ल्ड की जुलाई 2022 की रिपोर्ट के मुताबिक सिगरेट पीने वाली आबादी के मामले में चीन के बाद दूसरे नंबर पर हम ही हैं। देश में 15 साल और इससे ज्यादा उम्र वाली कुल 10.7% आबादी, लगभग दस करोड़ लोग, धूम्रपान करती है। मजेदार बात यह है कि इसमें बीड़ी पीने वालों की तादाद, सिगरेट पीने वालों से लगभग दोगुनी है। इस धूम्रपान के दुष्परिणाम भी हमारे सामने हैं। हर साल करीब 8.5 लाख मौतें होती हैं और तंबाकूजनित बीमारियों व मौतों की वजह से अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला 27.5 अरब डॉलर का भार (वर्ष 2018-19 के दौरान) अलग है, जिसमें धूम्रपान की हिस्सेदारी 74% है।
सिनेमा ने बढ़ाया क्रेज
भारत में सिगरेट को लेकर दशकों तक एक बहुत रोमांटिसिज्म रहा है। एक दौर था, जब स्मोकिंग एक स्टाइल स्टेटमेंट माना जाता था। सिनेमा और सिने कलाकारों ने इसे बढ़ावा देने में एक बहुत बड़ी भूमिका अदा की। चालीस से ज्यादा उम्र वाले बहुत सारे लोगों को याद होगा कैसे सिगरेट के विज्ञापनों में राज बब्बर, जैकी श्रॉफ, अक्षय कुमार जैसे सितारे इसे मर्दों की शक्ति और ऊर्जा के अनंत स्रोत के रूप में प्रमोट करते नजर आया करते थे। उस दौर में शायद ही कोई ऐसा कलाकार रहा होगा, जिसने स्क्रीन पर सिगरेट के धुंए के छल्ले न उड़ाये हों। यह अभी भी होता है, लेकिन पहले के मुकाबले बहुत कम। अलबत्ता, इसकी कसर ओटीटी प्लेटफार्मों ने पूरी कर दी है। इसीलिए, सरकार को ये नई गाइडलाइंस लानी पड़ी हैं। इसमें कार्यक्रम के शुरू व बीच में और तंबाकू उत्पाद दर्शा रहे दृश्य के दौरान स्क्रीन पर 30 सेकेंड तक 'एंटी टोबाको डिस्क्लेमर' डिस्प्ले करना अनिवार्य कर दिया गया है।
ऐसी ही गाइडलाइंस वर्ष 2005 में भी लाई गई थीं। जब तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री अंबुमणि रामदास ने फिल्मों में धूम्रपान के दृश्यों को दिखाया जाना प्रतिबंधित कर दिया था और कहानी की जरूरत के हिसाब से बहुत आवश्यक होने पर ही दृश्य विशेष के लिए इसकी अनुमति थी, वह भी सशर्त। शर्त के मुताबिक ऐसे दृश्यों के दौरान पर्दे पर धूम्रपान विरोधी चेतावनी देना अनिवार्य किया गया था। यह शर्त प्रतिबंध से पहले बनी फिल्मों पर भी लागू होती थी। क्रिएटिव फ्रीडम के झंडाबरदारों ने इसका बहुत विरोध किया, लेकिन सरकार नहीं झुकी। सरकार के इस सख्त कदम का प्रभाव जानने के लिए कुछ अध्ययन हुए, जिनमें पाया गया कि इससे युवाओं में सिगरेट के प्रति झुकाव कम हुआ है। इसी साल फरवरी में नियमों को और सख्त बनाते हुए सरकार की ओर से यह प्रस्ताव रखा गया है कि फिल्मों में धूम्रपान का दृश्य दिखाते समय सेंसर को कन्विंस करना जरूरी होगा कि यह वाकई कहानी की जरूरत है।
कानून हैं, पर असर कम
12 जुलाई 1999 को, सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान प्रतिबंधित करने वाला केरल देश का पहला राज्य बना। 2 अक्टूबर 2008 से यह प्रतिबंध पूरे देश में लागू हो गया। हालांकि इससे पहले 1 मई 2004 से देश में सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद (विज्ञापन का निषेध और व्यापार और विनियमन का विनियमन) वाणिज्य, उत्पादन, आपूर्ति और वितरण) अधिनियम, 2003 को लागू कर दिया गया था। और इससे भी पहले भारत में सिगरेट से संबंधित पहला कानून सिगरेट (उत्पादन, आपूर्ति और वितरण का विनियमन) अधिनियम, 1975 मौजूद था , जिसके अंतर्गत सिगरेट पैक पर वैधानिक स्वास्थ्य चेतावनी का प्रकाशन अनिवार्य किया गया था।
8 सितंबर 2000 से देश में केबल टेलीविजन नेटवर्क (विनियमन) संशोधन विधेयक लागू है, जो सिगरेट और शराब के विज्ञापनों को पूरी तरह से प्रतिबंधित करता है। भारत ने विश्व स्वास्थ्य संगठन का फ्रेम वर्क कन्वेंशन ऑन टोबाको यूज, 2004 भी साइन किया हुआ है। इसके तहत वह तंबाकू उत्पादों के उपभोग को रोकने को लेकर प्रतिबद्धता प्रदर्शित करता है। इतने सारे कानूनों की मौजूदगी और तमाम सख्ती के बावजूद अगर धूम्रपान हर साल साढ़े आठ लाख जिंदगियॉं लील रहा है, तो यह चिंता का विषय है कि आखिर हम कहॉं चूक रहे हैं।
अक्सर एक सवाल उठाया जाता है कि सरकार सिगरेट की सार्वजनिक स्थानों पर बिक्री पर प्रतिबंध लगा चुकी है, सिगरेट पीने पर भारी जुर्माने का प्रावधान है तो वह सीधे सिगरेट का उत्पादन ही बंद क्यों नहीं कर देती। अमूमन इसका एक ही जवाब होता है- सिगरेट से मिलने वाला भारी राजस्व।
राजस्व भी बढ़ा और खपत भी
सिगरेट को प्रतिबंधित करने के लिए किए गए अनेक उपायों में एक टैक्स बढ़ाना भी रहा है। इससे सरकार का राजस्व जरूर बढ़ा, लेकिन सिगरेट का उत्पादन और उपभोग शायद ही कम हुआ हो। वर्ष 2020 में देश में बीस सबसे ज्यादा बिकने वाले सिगरेट पैकेट की टैक्स सहित खुदरा कीमत 190 रुपए थी। इसमें 57.6% हिस्सा विभिन्न प्रकार के करों का था। सरकार को सिगरेट से कितनी आमदनी होती है, इसका अंदाजा स्टेटिस्टा डॉट कॉम की रिपोर्ट से लगाया जा सकता है, जिसके मुताबिक सरकार को वर्ष 2011 में 152.86 अरब रुपए राजस्व के रूप में प्राप्त हुए थे। वर्ष 2020 में यह राशि बढ़कर दोगुने से भी अधिक, 356 अरब रुपए हो गई।
सोचने की बात यह है कि राजस्व में मिलने वाले 356 अरब रुपए ज्यादा हैं या धूम्रपान से होने वाली बीमारियों व मौतों की वजह से अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला करीब 1400 अरब रुपए का बोझ। फिर भी सिगरेट का उत्पादन जारी है। उत्पादन जारी रहेगा तो न उपभोग रुकेगा और न ही इसकी वजह से होने वाली जान-माल की हानि।
ग्लोबल सिगरेट मार्केट का साइज पिछले साल 1,077 अरब डॉलर का था। दुनिया में दूसरे सबसे बड़े सिगरेट उपभोक्ता देश होने के बावजूद हमारा हिस्सा इसमें महज 21.5 अरब डॉलर ही है। लेकिन, हमारी सालाना वृद्धि दर है 11.94%, जो वैश्विक वृद्धि दर 3.55% की लगभग तीन गुनी है। अनुमान है कि वर्ष 2028 में, जब सिगरेट का वैश्विक बाजार 1,328.8 अरब डॉलर का होगा, हमारा बाजार आज के मुकाबले करीब दोगुना, 42.7 अरब डॉलर, हो चुका होगा। यानि जिस अवधि में ग्लोबल बाजार तीस प्रतिशत बढ़ेगा, हम सौ प्रतिशत बढ़ जाएंगे।
अब सवाल यह है कि अगर सिगरेट सेहत के लिए इतनी हानिकारक है तो फिर इसका कारोबार इस तरह से क्यों बढ़ रहा है? असल में सिगरेट एक आकर्षण से शुरु होता है जो बाद में एक लत बन जाती है। एक बार कोई निकोटिन की लत में फंस गया तो इससे बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है। इसीलिए तंबाकू और सिगरेट के डिब्बों पर छपी चेतावनियां भी उन्हें इसके सेवन से नहीं रोक पाती। इसके लिए सरकार के साथ साथ समाज के स्तर पर भी जागरुकता पैदा करने की जरुरत है ताकि लोग निकोटीन के नशे से मुक्त हो सकें।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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