Special Session: विशेष सत्र की पहेली से विपक्ष में बेचैनी
Special Session: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इंडी एलायंस की हर मीटिंग से पहले कुछ ऐसा कर देते हैं कि ध्यान उसी बात पर केन्द्रित हो जाता है| जैसे इस बार उन्होंने संसदीय मामलों की केबिनेट कमेटी की बैठक बुलवा कर संसद का विशेष सत्र बुलवाने का एलान करवा दिया| यह कोई अचानक हुआ फैसला नहीं है, मोदी के दिमाग में यह रणनीति लंबे समय से चल रही होगी| मोदी क्या करना चाहते हैं, इसकी भनक किसी को नहीं रहती| इसलिए 31 अगस्त की शाम को जब संसदीय कार्य राज्य मंत्री ने विशेष सत्र की सूचना दी, तो मुम्बई में खलबली मच गई| सबसे पहले उद्धव शिवसेना की प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी की टिप्पणी आई कि गुपचुप तरीके से विशेष सत्र बुला लिया गया, और वह भी गणेश चतुर्थी के मौके पर| वैसे, किसी भी राजनीतिक दल को संसद का सत्र बुलाने पर क्यों आपत्ति होनी चाहिए, बल्कि विपक्ष को तो खुश होना चाहिए कि उन्हें सरकार पर हमला करने का एक और मौक़ा मिल रहा है|
हर किसी के मन में कौतूहल होना स्वाभाविक है कि मोदी सरकार विशेष सत्र में क्या करना चाहती है| तरह तरह की अटकलें लग रही हैं कि समान नागरिक सहिंता का बिल आ सकता है, या एक देश एक चुनाव का बिल आ सकता है, या जनसंख्या नियन्त्रण का बिल आ सकता है, या फिर मोदी संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण का बिल ला सकते हैं, और पांच दिनों में वह बिल पास करवा लेंगे, जो वह पास करवाना चाहते होंगे| क्योंकि सत्र 18 से 22 सितंबर पांच दिन का है, जो सोमवार से शुक्रवार बनता है, लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि इस विशेष सत्र में प्रश्नकाल, शून्य काल और प्राईवेट मेंबर का समय नहीं होगा| यानि मोदी सरकार एक से ज्यादा बिल पास करवाने का इरादा रखती है|

विपक्ष की आशंका इससे कहीं ज्यादा है| 31 अगस्त की पहली रात्रिभोज बैठक में वैसे तो सिर्फ औपचारिक मुलाक़ात ही होनी थी, लेकिन संसद का विशेष सत्र बैठक में चर्चा और चिंता का विषय बन गया| कम से कम पांच दलों के शीर्ष नेताओं ने मध्यावधि चुनाव की आशंका जताई है| जिनमें सबसे पहले उद्धव ठाकरे बोले, जिन्होंने कहा कि 19 सितंबर को गणेश चतुर्थी है, जो सारी दुनिया में मनाई जाती है, इसलिए कोई कारण नहीं था कि हिन्दुओं के सबसे बड़े त्यौहार के समय संसद का विशेष सत्र बुलाया जाता| उद्धव ठाकरे यहीं पर नहीं रुके, उन्होंने कहा कि पता नहीं क्या खिचड़ी पका रहे हैं|
उद्धव ठाकरे की चिंता यह थी कि जब इंडी एलायंस की मीटिंग हो रही थी, ठीक उसी समय महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के घर भी एक रात्रिभोज बैठक चल रही थी, जिसमें अजीत पवार, प्रफुल्ल पटेल, देवेन्द्र फड़नवीस, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष चन्द्रशेखर बावनकुले, आरपीआई से केन्द्रीय मंत्री रामदास अठावले, आरपीआई के महादेव जानकर और जोगेंद्र कावडे भी मौजूद थे| इसीलिए उद्धव ठाकरे ने कहा कि पता नहीं क्या खिचड़ी पक रही है|

उद्धव ठाकरे के बाद ममता बनर्जी, अरविन्द केजरीवाल, नीतीश कुमार और अखिलेश यादव ने भी लोकसभा के चुनाव जल्द होने की आशंका जताई और कहा कि ज्यादा समय नहीं बचा है इसलिए गठबंधन की रूपरेखा, सीटों के बंटवारे का फार्मूला और बुलेट प्वाईंट में चुनाव का घोषणा पत्र जल्द से जल्द तैयार कर लेना चाहिए| ममता बनर्जी, जो पिछले कुछ दिनों से कह रहीं थीं कि मोदी दिसंबर में लोकसभा चुनाव करवा सकते हैं, उन्होंने कहा कि गठबंधन को अपने सारे काम 30 सितंबर तक पूरे कर लेने चाहिए|
दिसंबर में लोकसभा चुनाव संबंधी विपक्ष की आशंकाओं का कोई ठोस आधार नहीं है| प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हिन्दू वोट बैंक को टारगेट करने के लिए जनवरी 2024 में रामजन्मभूमि मन्दिर का शिलान्यास करने के बाद ही लोकसभा चुनाव करवाएंगे, इसका मतलब साफ़ है कि लोकसभा चुनाव अपने तय समय पर अप्रेल मई में ही होंगे| श्रीरामजन्मभूमि मन्दिर के शिलान्यास की भव्य तैयारियां की जा रही हैं| दुनिया भर की नदियों का जल लाया जाएगा| दुनिया भर से हिन्दू भारत आएंगे, भारत के हर राज्य से भी लाखों लोग अयोध्या पहुंचेंगे| हिन्दू वोट बैंक को संबोधित करने के लिए मोदी इस मौके का बेसब्री से इन्तजार कर रहे हैं| इसलिए दिसंबर में मध्यावधि चुनाव का कोई कारण नहीं| मोदी अपने पांच साल का एक एक दिन इस्तेमाल करेंगे, यहां तक कि पहली फरवरी को पेश होने वाले अंतरिम बजट का भी इस्तेमाल करेंगे, याद रखना चाहिए कि मोदी सरकार ने पिछले चुनाव से ठीक पहले एक फरवरी 2019 के बजट में किसान निधि की घोषणा की थी|
हालांकि यह तय नहीं है कि मोदी सरकार कौन से बिल पेश करना चाहती है और कौन कौन से बिल तुरंत पास करवाना चाहती है, लेकिन विपक्ष में खलबली दो बिलों को लेकर ज्यादा है, एक है वन नेशन वन इलेक्शन और दूसरा है महिला आरक्षण बिल| विपक्ष के नेताओं को लगता है कि मोदी सरकार समान नागरिक सहिंता और जनसंख्या नियन्त्रण का बिल अभी नहीं लाएगी| लाएगी, तो सिर्फ पेश करेगी, लेकिन संसद और विधानसभाओं में महिला आरक्षण का बिल अभी ला सकती है|
वन नेशन वन इलेक्शन इतना आसान नहीं है, क्योंकि इस क़ानून को लागू करने के लिए कई संविधान संशोधन करने पड़ेंगे| जिनमें से सबसे बड़ा तो यह होगा कि लोकसभा और विधानसभाओं का कार्यकाल पांच साल फिक्स करना पड़ेगा| पांच साल तक उसी सदन से काम चलाना पड़ेगा, अगर ऐसा होगा तो राज्यपालों की शक्तियां खत्म हो जाएँगी| अगर किन्ही परिस्थितियों में कोई विधानसभा भंग होती है, और मध्यावधि चुनाव होता है, तो मध्यावधि से निर्वाचित सदन का कार्यकाल बाकी बचा कार्यकाल होगा, उसका कार्यकाल पांच साल नहीं हो सकता| इसलिए वन नेशन वन इलेक्शन में कई पेंच है, जिनका पहले हल निकाला जाना जरूरी है|
देश के पहले चार इलेक्शन एक साथ ही हुए थे, लेकिन 1969 में मध्यावधि चुनावों के कारण वह परंपरा खत्म हुई| वन नेशन वन इलेक्शन में आने वाली कई बाधाओं का समाधान निकालने के लिए लंबे मंथन की जरूरत है, जिसमें काफी लंबा वक्त लगेगा| वैसे विपक्ष वन नेशन वन इलेक्शन के लिए तैयार नहीं है| हालांकि सरकार की तरफ से वन नेशन वन इलेक्शन के बिल की कोई मंशा नहीं जताई गई है, लेकिन अखिलेश यादव ने सवाल दाग दिया है कि क्या उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव भी लोकसभा चुनावों के साथ करवाए जाएंगे| विपक्ष की आशंकाओं के बीच छत्तीसगढ़ के कांग्रेसी उप मुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव ने वन नेशन वन इलेक्शन के समर्थन में बयान देकर विपक्ष की शान्ति भंग कर दी है|
वन नेशन वन इलेक्शन के बिल की संभावना न के बराबर है, लेकिन महिला आरक्षण बिल पास करवाने की संभावना सबसे ज्यादा लगती है| महिला वोटरों को ध्यान में रख कर मोदी एक एक कदम आगे बढ़ रहे हैं| उज्ज्वला योजना, हर घर नल, दो करोड़ लखपति दीदी, ये सब योजनाएं महिलाओं के विकास को ध्यान में रख कर बनाई गई हैं| इसलिए अगर कोई बात समझ में आती है, तो वह यह है विशेष सत्र का एजेंडा महिलाओं से जुड़ा हुआ हो सकता है|
मोदी भाजपा की अंदरुनी बैठकों में कई बार कह चुके हैं कि महिलाएं भाजपा का साइलेंट वोटर है| इसलिए महिलाओं के लिए मोदी कुछ बड़ा करना चाहते हैं, जिसके लिए वह दिसंबर में होने वाले शीत सत्र तक इन्तजार नहीं करना चाहते| संभवत वह नवंबर में होने वाले पांच विधानसभाओं के चुनावों से ही महिला आरक्षण क़ानून को लागू करवाना चाहते हैं, इसलिए विशेष सत्र का आईडिया आया होगा|
महिला आरक्षण बिल से मोदी के दो मकसद पूरे होंगे, एक महिला सशक्तिकरण का वादा पूरा होगा, और दूसरे महिला आरक्षण बिल आता है, तो यह विपक्ष में फूट का कारण बन सकता है, क्योंकि विपक्ष में ज्यादातर दल ऐसे हैं, जो संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण के खिलाफ रहे हैं| जेडीयू, आरजेडी और समाजवादी पार्टी के कारण ही पिछले 25 साल से संसद और विधानसभाओं में महिला आरक्षण बिल पास नहीं हो सका था| वे तीनों पार्टियां अब इंडिया गठबंधन का हिस्सा हैं| 2010 में यूपीए राज में जब महिला आरक्षण बिल राज्यसभा में पेश किया गया था, तो समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल ने हंगामा खड़ा कर दिया था| इन दोनों दलों के सात सांसदों को निलंबित किए जाने के बाद बिल पास हो सका था| लेकिन बाद में मनमोहन सरकार ने लोकसभा में बिल पास करवाने की हिम्मत नहीं दिखाई थी|
2014 में मोदी सरकार बनने के बाद 2017 में जब महिला आरक्षण का मुद्दा फिर से उछला था तो सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिठ्ठी लिख कर कहा था कि हमारे पास स्पष्ट बहुमत नहीं था इसलिए हम लोकसभा में बिल पास नहीं कर पाए थे, अब आपके पास बहुमत है, आप लोकसभा में बिल लाईए हम समर्थन करेंगे| ऐसा ही बयान राहुल गांधी ने भी दिया था| वैसे 2010 में राज्यसभा में भी भाजपा की मदद से ही बिल पास हुआ था|
भाजपा ने 1998 में भी बिल पास करने की कोशिश की थी| वाजपेयी सरकार के गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवानी जब बिल पेश करने के लिए खड़े हुए थे, तो आरजेडी के सांसद सुरेन्द्र प्रसाद यादव ने उनके हाथ से छीन कर बिल फाड़ दिया था| अब महिला बिल का जिक्र आते ही इंडिया गठबंधन में खलबली मची है| हालांकि संसद में अब लालू, नीतीश और अखिलेश के पल्ले भी कुछ नही बचा| इन तीनों दलों के कुल मिला कर लोकसभा में 19 और राज्यसभा में 14 सांसद ही हैं|
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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