Caste of Communists: कौन जात हो कॉमरेड?
केरल के एक कम्युनिस्ट नेता ए. राजा का चुनाव केरल उच्च न्यायालय द्वारा रद्द कर दिया गया है। यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 341 और 342 की चर्चा के लिए तो महत्वपूर्ण है ही, मगर साथ ही यह फैसला कुछ बड़े सवाल भी उठाता है।

Caste of Communists: अगर व्यक्ति कम्युनिस्ट हो तो जीवन कितनी विडम्बनाओं से भरा हो सकता है? इसे समझने के लिए केरल की देवीकुलम सीट से विधायक रहे ए. राजा को देखा ही जाना चाहिए। सर्वहारा की बातें करने वाले, सामंतवाद के तथाकथित विरोधी का नाम ही यदि "राजा" हो, तो पहली विडम्बना तो यही हो जाती है। बात सिर्फ वहीं समाप्त नहीं होती। इसके आगे ये जुमला भी सुना होगा कि कम्युनिस्ट धर्म को मानते नहीं। वो जात-पांत भी नहीं मानेंगे ऐसा आपको लग सकता है। लेकिन कॉमरेड ए. राजा के जीवन की एक विडंबना यह भी है कि वो धर्म को कथित रूप से नहीं मानते थे, मगर जाति मानते थे। स्वयं को अनुसूचित जाति का बताकर वो चुनाव लड़े, और जीत भी गए। उनके विरुद्ध जो कांग्रेसी उम्मीदवार (डी. कुमार) थे, उन्हें 7848 मतों से हुई हार बर्दाश्त नहीं हुई।
डी. कुमार मामले को अदालत में ले गए। देवीकुलम के चुनावों के नतीजों को 2021 में ही जब चुनौती दी गयी तो बताया गया कि केरल में तो ए. राजा "हिन्दू पारायण" जाति के हैं ही नहीं। ये "हिन्दू पारायण" जाति तमिलनाडु में अनुसूचित जातियों में आती है, केरल में नहीं आती। इस हिसाब से ए. राजा ने "रिप्रजेंटेशन ऑफ पीपल एक्ट, 1951" की धारा 5 का उल्लंघन किया था। डी. कुमार का कहना था कि ए. राजा ईसाई हैं, इसलिए जातियां उन पर लागू ही नहीं होतीं। ईसाईयत तो जाति व्यवस्था को नहीं मानती ना? इसलिए इसकी शिकायत उन्होंने चुनावों में रिटर्निंग ऑफिसर से भी की थी, मगर बिना कोई उचित कारण बताये डी. कुमार की शिकायत निरस्त कर दी गयी थी। इसके बाद मामला अदालत में पहुंचा था। जब मुकदमा शुरू हुआ तो एक-एक करके प्रमाण सामने आते गए और कॉमरेड ए. राजा की पोल खुलती गई।
सबसे पहले तो यह सामने आया कि ए. राजा जिस "हिन्दू पारायण" समुदाय का स्वयं को बता रहे थे, वो तमिलनाडु राज्य के लिए लागू है। संवैधानिक (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के अनुच्छेद के भाग 16 में "हिन्दू पारायण" को तमिलनाडु में अनुसूचित जातियों में रखा गया है। इसलिए केरल में आकर उसके आधार पर स्वयं को अनुसूचित जाति का बताया ही नहीं जा सकता। ए. राजा के दादा-दादी जो कि तमिलनाडु के मूल निवासी थे, वो 1951 में केरल आ गए थे। केरल की सीएसआई चर्च में 1992 में ही ए. राजा के माता-पिता का बप्तिस्मा हो चुका था। खुद ए. राजा का भी बप्तिस्मा हुआ था और इसाई रीति-रिवाजों से ही ए. राजा ने शादी भी की थी। धर्म को अफीम बताने वाले कॉमरेड का एक धर्म छोड़कर दूसरे रिलिजन में जाना, नशा बदलना कहा जाये या नहीं, पता नहीं। हां, विवाह को संस्थानिक बलात्कार मानने वाले कम्युनिस्ट का विवाह करना एक और विडंबना अवश्य कहा जा सकता है।
मामले की सुनवाई में उच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि एक राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में जो अनुसूचित जाति अथवा जनजाति है, वो दूसरे राज्य में अनुसूचित जाति/जनजाति नहीं भी हो सकती है। इसलिए ए. राजा का स्वयं को अनुसूचित जाति का बताना ही गलत था। इससे सम्बंधित एक और तथ्य भी उठता है। ए. राजा का परिवार चूंकि प्रवासी की तरह दूसरे राज्य में आ गया था, इसलिए संविधान के अनुच्छेद 341 और 342 के अंतर्गत उन्हें लाभ मिले या नहीं, यह प्रश्न उठता था। इस पर निर्णय देने के लिए उच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के "मर्री चंद्रशेखर राव बनाम डीन, सेठ जी.एस. मेडिकल कॉलेज एवं अन्य (1990)" में आये फैसले का सहारा लिया। इस फैसले में कहा गया था कि अगर अनुच्छेद 341 एवं 342 को पूरे देश पर लागू किया गया तो अनुच्छेद 341 को अनुच्छेद 15(4) के साथ पढ़ने पर जो अर्थ आता है, वो जाता रहेगा। इसलिए ए. राजा को अनुच्छेद 341 एवं 342 का लाभ भी नहीं मिल पाया।
कॉमरेड ए. राजा ने अपने ईसाई होने को भी छुपाने का भरपूर यत्न किया था। कॉमरेड का कहना था कि उनकी मां का नाम "ईस्थर" नहीं बल्कि "ईश्वरी" है। काफी समय तक उनके दादा-दादी को कोई बच्चा नहीं हुआ तो उन्होंने एक चर्च में प्रार्थना की थी। इसलिए जब उनके पिता का जन्म हुआ तो दादा-दादी ने उनके पिता का नाम सीएसआई चर्च की सलाह से ईसाइयों वाला रखा था। इसकी जांच के लिए अदालत में कुंडला के सीएसआई चर्च का परिवार रजिस्टर, बप्तिस्मा रजिस्टर और दफन का रजिस्टर मंगवाया गया। उच्च न्यायालय ने पाया कि इन दस्तावेजों से छेड़-छाड़ की गयी है। कहीं ओवरराइटिंग थी, कहीं सुधार किये गए थे, बदलाव और जानकारी भी मिटाई गयी थी। इन सबके बाद भी कॉमरेड ए. राजा के विवाह की तस्वीरों से साफ पता चल रहा था कि शादी ईसाई रीति-रिवाज से हो रही है।
सारे सबूतों के सामने आने पर कम्युनिस्ट नेता (सीपीआईएम) कॉमरेड ए. राजा का चुनाव रद्द कर दिया गया। चुनाव बड़ा मामला होता है। इनमें एक विपक्षी भी होता है जो आसानी से किसी ईसाई को स्वयं को हिंदू अनुसूचित जाति-जनजाति का बताकर आरक्षित सीटों से चुनाव नहीं लड़ने देता। मगर जब उनमें भी ये धांधली हो रही है तो निःसंदेह नौकरियों के आरक्षण में भी अनुसूचित जातियों-जनजातियों की जगह छीनी ही जा रही होगी। शायद हमारे कानूनों को और तेज होने की जरुरत है, ताकि इस तरह के फर्जीवाड़े से कतार में अंतिम स्थान पर खड़े व्यक्ति को उसका अधिकार दिलाया जा सके।
यह इसलिए जरूरी है क्योंकि जैसे चुनावों में जाति गलत बताकर आरक्षित सीटों को हथियाने का प्रयास होता है, वैसे ही अनुसूचित जाति-जनजाति के लोगों को धकियाकर राजनीतिक 'अल्पसंख्यकों' द्वारा नौकरियां हड़पने का प्रयास नहीं होता होगा, इसकी गारंटी कौन देगा?
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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