कैप्टन अमरिन्दर के भरोसे भाजपा का "मिशन पंजाब"
पंजाब के दिग्गज नेता और पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने आज अपनी पार्टी "पंजाब लोक कांग्रेस" का विलय भाजपा में कर विधिवत रूप से भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली। अमरिंदर के साथ उनके बेटे रण इंदर सिंह, बेटी जय इंदर कौर, मुक्तसर की पूर्व विधायक करण कौर और भदौड़ से पूर्व विधायक निर्मल सिंह ने भी भाजपा का दामन थाम लिया हैं।

गौरतलब है कि कैप्टन अमरिंदर सिंह ने पिछले साल कांग्रेस हाईकमान से मतभेद के चलते पंजाब के मुख्यमंत्री पद के साथ ही कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद उन्होंने "पंजाब लोक कांग्रेस" का गठन कर भाजपा के साथ मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा था। अकाली दल के अलग होने के बाद भाजपा को उम्मीद थी कि पंजाब में अमरिंदर के सहारे भाजपा कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर अपनी सरकार बना सकती है, लेकिन आम आदमी पार्टी की आंधी में पंजाब में सबका सूपड़ा साफ हो गया।
पंजाब में पैर जमाने की कोशिश
बिहार में नीतिश के अलग होने के बाद और विपक्ष एकता की चल रही कोशिशों के बीच भाजपा ने पंजाब में अपनी जड़े मजबूत करने और 2024 का लोकसभा चुनाव पंजाब में अकेले लड़ने की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है। नई रणनीति के तहत भाजपा अब पंजाब में सहयोगी दल पर निर्भर रहने के बजाय अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश करेगी। भाजपा अब इस बात को महसूस कर रही है कि अकाली दल के साथ वर्षो के उसके गठबंधन ने पंजाब में भाजपा के विस्तार को रोक दिया था।
पंजाब उन राज्यों में प्रमुखता से आता है जहां भाजपा 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले अपने को मजबूत करने की तैयारी में जुटी है। पंजाब में भाजपा 1997 से 23 विधानसभा सीटों पर और शिअद 94 सीटों पर तथा शिअद लोकसभा की 10 सीटों पर और भाजपा 3 सीटों पर चुनाव लड़ता रहा है। शिरोमणि अकाली दल ने केन्द्रीय कृषि कानूनों के विरोध में सितंबर 2020 में भाजपा से नाता तोड़ लिया था।
पंजाब को भाजपा कितने गंभीरता से ले रही है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि भाजपा ने अपने सर्वोच्च नीति निर्धारक संस्था संसदीय बोर्ड में पूर्व पुलिस अधिकारी और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन इकबाल सिंह लालपुरा को शामिल कर लिया है। लालपुरा भाजपा में इतने महत्व के नेता कभी नहीं थे कि उन्हें सीधे संसदीय बोर्ड का सदस्य बनाया जाए।
शिरोमणि अकाली दल के साथ होने के कारण जट्ट सिख समुदाय अकाली दल को वोट दे देता था जो अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा को ही मिलता था। लेकिन, जब से शिरोमणि अकाली दल और भाजपा का गठबंधन टूटा है भाजपा इस वोट बैक का एक बड़ा हिस्सा अपने पाले में लाने की कोशिश में है। लालपुरा का चेहरा इसमें भाजपा की मदद कर सकता है। इकबाल सिंह लालपुरा पिछड़ा वर्ग से आते हैं। पार्टी नेताओं का मानना है कि यदि पिछड़ा वर्ग और अनुसूचित जाति वर्ग एकजुट होकर भाजपा के साथ खड़ा हो जाता है तो वह 2024 के लोकसभा चुनाव में पंजाब में 5 सीटें जीतने की स्थिति में आ सकती है।
शिरोमणि अकाली दल के कारण भाजपा सिख समुदाय में अपनी खुद की पैठ नहीं जमा पाई। पार्टी के पास अपने बड़े सिख चेहरे नहीं हैं। ऐसे में लालपुरा के संसदीय बोर्ड और अब अमरिंदर सिंह के भाजपा में आने के बाद भाजपा सिख समुदाय को अपने साथ जोड़कर अपना आधार मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है।
भाजपा का विजन पंजाब
शिरोमणि अकाली दल की परछाई से निकल कर और कैप्टन अमरिंदर जैसे पंजाब के दिग्गज नेताओं को भाजपा में शामिल कर भाजपा ने 2024 के लोकसभा चुनाव पर अपना ध्यान केन्द्रित कर दिया है। भाजपा ने अपने मास्टर प्लान "पंजाब मिशन" को "विजन पंजाब" का नाम दिया है। वह सिखों और पंजाबियों के दिल जीतने से लेकर बूथ जीतने की रणनीति पर चल रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, राष्ट्रीय अध्यक्ष नड्डा और संगठन महामंत्री बीएल संतोष लगातार पंजाब के शीर्ष 22 पार्टी नेताओं के साथ बैठक कर संगठन को मजबूत कर रहे है और इन नेताओं को पंजाब भर में जन संपर्क, यात्राओं और बैठकों को भी तेज करने के निर्देश दिए है।
मोदी सरकार के केन्द्रीय मंत्री भी पंजाब की 13 लोकसभा सीटों पर लगातार 3-3 दिन का प्रवास कर रहे हैं। पार्टी ने पूरे प्रदेश में लोगों में बांटने के लिए एक पुस्तिका प्रकाशित की है। "प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार का सिखों के साथ विशेष संबंध" शीर्षक वाली पंजाबी और हिंदी में प्रकाशित 88 पन्ने की पुस्तिका में प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार द्वारा सिखों और पंजाबियों के लिए कार्यों का पूरा ब्यौरा दिया गया है।
पंजाब में भाजपा ने अपना चेहरा भी बदलने का फैसला किया है। हो सकता है अमरिंदर को पंजाब भाजपा का अध्यक्ष बना दिया जाए। इसके साथ ही भाजपा ने सेकेंड लाइन के नेताओं को भी आगे लाने की रणनीति तय की है। शिरोमणि अकाली दल के साथ गठबंधन टूटने के बाद भारतीय जनता पार्टी अब केवल शहरों तक ही सीमित नहीं रहने वाली है। इसके लिए पार्टी गांवों का रुख कर रही है।
संगरूर लोकसभा के उप चुनाव में जब भाजपा ने केवल ढिल्लों को लड़वाने का फैसला किया तो पार्टी के अंदर खासी खींचतान हुई, लेकिन ढिल्लों के चुनाव मैदान में आने से संगरूर के गांव-गांव में भाजपा के झंडे व बैनर लगे। गांवों में पैठ बढ़ाने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने दूसरी पार्टी से आए नेताओं को संगठन में स्थान देने का फैसला किया है। यह पहला मौका होगा जब भाजपा दूसरी पार्टी से आने वाले नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपेगी।
सिख प्रचारकों और डेरा प्रमुखों से संपर्क
भाजपा ने पंजाब में अपना जनाधार बनाने के लिए सिख प्रचारकों और स्थानीय डेरा प्रमुखों के साथ संपर्क कार्यक्रम शुरू कर दिया है। जबकि अब तक अधिकांश पंथिक उपदेशक और धार्मिक नेता भाजपा से दूर रहे हैं। भाजपा उदारवादी सिख नेताओं और सनातनी सिख संत समाज जैसे संगठनों की मदद से सिख धार्मिक राजनीति में प्रवेश करने की ओर झुकाव दिखा रही गठबंधन में रहते हुए यह क्षेत्र है। शिअद के लिए छोड़ दिया गया था।
भाजपा ने दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (डीएसजीएमसी) के पूर्व प्रमुख मनजिंदर सिंह सिरसा, शिअद के पूर्व विधायक दीदार सिंह भट्टी, एसजीपीसी सदस्य सुरजीत सिंह गढ़ी और दिवंगत अकाली नेता गुरचरण सिंह तोहड़ा के पोते कंवरवीर सिंह सहित कई पंथिक नेताओं को पार्टी में शामिल कर यह बताने की कोशिश की है कि भाजपा के दरवाजे सभी के लिए खुले है।
भाजपा इस बात को समझ रही है कि पंजाब में हिन्दुत्व की राजनीति को रोकने के लिए पंजाबी सिख भाजपा के साथ जुडने से बचते रहे है और इस कारण पंजाब में पंथिक मतदाताओं ने हमेशा भाजपा को आशंका से देखा है। भाजपा पंथिक मतदाताओं के मन से यही डर निकालने के लिए कैप्टन अमरिंदर सिंह उपयोगी हो सकते हैं।
भाजपा अपनी सफाई में कह रही हैं कि वाजपेयी सरकार ने तरलोचन सिंह को राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का प्रमुख नियुक्त किया था और बाद में 2021 में मोदी सरकार ने इकबाल सिंह लालपुरा को राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का प्रमुख नियुक्त किया। सिख समुदाय को जोड़ने के लिए 1980 के दशक के अंत में आरएसएस ने राष्ट्रीय सिख संगत का गठन किया था ताकि भाजपा को सिख मतदाताओं के बीच की खाई को पाटने में मदद मिल सके। 2008 में सिख संगत के प्रमुख रुलदा सिंह को लुधियाना में सिख आतंकवादियों ने मार डाला था।
सिखों के लिए काम तो किया पर समर्थन नहीं मिला
भाजपा का मानना है कि करतारपुर कॉरिडोर, गुरुद्वारों के लिए विदेशी अनुदान और लंगर व्यवस्था को यथावत रखने, अफगानिस्तान के तालिबान अधिग्रहण के दौरान सिख परिवारों को निकालने और गुरु ग्रंथ साहिब की प्रतियां प्राप्त करने जैसे काम का श्रेय भाजपा लेने में असफल रही। इसलिए अपने दम पर पंजाब में स्थापित होने के लिए भाजपा नेताओं ने पंजाब के एक बड़े राजनीतिक चेहरे कैप्टन अमरिन्दर को अपने साथ ले लिया है। वो न सिर्फ बड़े राजनीतिज्ञ हैं, बल्कि राष्ट्रवादी हैं और राजपरिवार से भी आते हैं।
कैप्टन अमरिंदर को साथ लेकर भाजपा ने साफ कर दिया है कि पंजाब में वह आम आदमी पार्टी को चुनौती देने की तैयारी कर रही है और आगामी लोकसभा चुनाव में वह आम आदमी पार्टी के सामने कड़ी चुनौती पेश करेंगी। हालांकि कैप्टन अमरिंदर से हाथ मिलाकर भाजपा को विधानसभा चुनाव में कोई फायदा नहीं हुआ था, अब देखते है कैप्टन अमरिंदर को भाजपा में शामिल करने के बाद पंजाब में भाजपा का खूंटा कितना गहरा गड़ता है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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