Terrorists Abroad: खालिस्तानी आतंकियों की हत्याओं के पीछे कौन?
Terrorists Abroad: जुलाई 2022 में एक दिन अचानक रिपुदमन सिंह की हत्या का समाचार नजर आया। आम भारतीयों का ध्यान भले इस समाचार पर न गया हो, लेकिन कुछ वर्गों के लिए ये एक बड़ी खबर थी। रिपुदमन सिंह मलिक असल में 1985 में हुई एयर इंडिया फ्लाइट कनिष्क 182 को बम से उड़ा देने की घटना का सह आरोपी था। इस आतंकी हमले में 331 लोग मारे गए थे। हवाई जहाज पर आतंकी हमले की ये 9/11 होने से पहले तक की सबसे बड़ी घटना थी।
रिपुदमन सिंह की हत्या के बारे में बताया जाता है कि कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया स्थिति सर्रे में गोलीबारी की घटना हुई। गले पर गोली लगने से रिपुदमन सिंह मलिक घटनास्थल पर ही मारा गया। उसके हत्यारों ने भागने के लिए जिस गाड़ी का प्रयोग किया वो घटनास्थल से कुछ किलोमीटर दूर बुरी तरह जलती हुई पायी गयी। माना जाता है कि हमलावर हत्याकांड में प्रयुक्त गाड़ी को आग लगाकर, किसी और गाड़ी से निकल भागे थे।

वर्ष 2022 में भारत में रिपुदमन सिंह का नाम इसलिए सुनाई दिया था क्योंकि जनवरी 17, 2022 को उसने प्रधानमंत्री मोदी को पंजाब के चुनावों से ठीक पहले एक पत्र लिखा था। इसमें उन्होंने कुछ सिखों का नाम ब्लैकलिस्ट से हटाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी का धन्यवाद दिया था। ब्लैकलिस्ट से नाम हटने के बाद ये सिख भारत आ सकते थे। इसके अलावा उसने कुछ सिखों पर प्रधानमंत्री मोदी के विरुद्ध अभियान चलाने का आरोप भी लगाया था। इस चिट्ठी के मुश्किल से छह महीने के अन्दर ही 14 जुलाई 2022 को कनाडा में रिपुदमन सिंह की हत्या कर दी गयी।
इस एक घटना से विदेशों में बैठे खालिस्तानी आतंकियों में खून खराबे का जैसे सिलसिला ही चल पड़ा। जिस हरदीप सिंह निज्जर की हत्या का आरोप कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने भारत पर थोपने की असफल प्रयास किया, वो कोई पहली इस तरह की हत्या तो बिलकुल नहीं थी। खुद निज्जर जालंधर के भरसिंहपुरा गाँव का निवासी था और पिछले कुछ वर्षों से कनाडा में जा बसा था। एक अलगाववादी संगठन "सिख्स फॉर जस्टिस" के जरिए 2020 में उसने पंजाब को अलग करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मतदान करवाने की कोशिश की थी। इस मतदान के नतीजे संभवतः अलग खालिस्तान के पक्ष में नही आये, इसलिए कभी सार्वजनिक नहीं हुए।
आरएसएस की शाखाओं और हिन्दुओं के मंदिरों पर हमला करवा कर पुजारियों और कर्मचारियों की हत्या करवाने के आरोप भी हरदीप सिंह पर थे। इसके अलावा उस पर खालिस्तानी आतंकियों के लिए हथियार उपलब्ध करवाने और सिख युवाओं को आतंकी प्रशिक्षण देकर भारत पर हमला करवाने के आरोप भी थे।
रिपुदमन सिंह से लेकर हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के बीच भी कई खालिस्तान की मांग करने वाले अलगाववादियों की हत्या अलग-अलग देशों में इस बीच हो चुकी है। परमजीत सिंह पंजवार खालिस्तान कमांडो फ़ोर्स का प्रमुख बना बैठा था। ये पाकिस्तान से काम करने वाला अलगाववादी 6 मई की सुबह टहलने निकला। लाहौर में जिस सनफ्लावर सोसाइटी में ये रहता था, वहीं सुबह टहलते वक्त मोटरसाइकिल सवार हमलावरों ने इस पर गोलियां बरसा दी, जिसमें परमजीत सिंह मौके पर ही मारा गया।
अमृतपाल सिंह जिसे भारत में गिरफ्तार करने के लिए पंजाब पुलिस को खासी मशक्कत करनी पड़ी थी, उसका खालिस्तानी हैंडलर अवतार सिंह खंडा था। अवतार सिंह खंडा को पहले ही कैंसर था और वो अस्पताल में अपनी आखिरी सांसें गिन रहा था। उसकी मौत कैंसर से नहीं हो पाई। माना जा रहा है कि उसे पहले ही किसी ने जहर दे दिया। इन घटनाओं से पहले जनवरी में हरमीत सिंह उर्फ़ हैप्पी पीएचडी की लाहौर में एक गुरूद्वारे में हत्या कर दी गयी थी। हरमीत सिंह पर 2016-17 में पंजाब में आरएसएस कार्यकर्ताओं की हत्या करवाने का आरोप था। वो नशे की तस्करी और खालिस्तानी आतंकियों को प्रशिक्षण मुहैया करवाने के लिए जाना जाता था।
पाकिस्तान जो कि वर्षों से इस किस्म के अलगाववाद को प्रश्रय दे रहा है, उस पर ऐसी घटनाओं को अंजाम देने का शक जाता है। इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान की हाल की आर्थिक स्थिति किसी से छुपी हुई नहीं है। शुरूआती दौर में जिन आतंकियों को उसने प्रश्रय दिया था, उन पर गरीबी में पहले जैसा ही खर्च जारी रखना अब पाकिस्तान के लिए संभव नहीं रहा। ऐसे में जो बूढ़े हो चले, या जिनसे अब पाकिस्तान को कोई विशेष लाभ नहीं, उनकी एक एक करके मौत होती जा रही है। रिपुदमन सिंह मलिक ने जैसी चिट्ठी प्रधानमंत्री मोदी को लिखी थी, उसके बाद रिपुदमन सिंह की मौत होना इसी ओर इशारा था।
अवतार सिंह खंडा लन्दन (यूके) में मार्च में हुए भारतीय दूतावास पर हमले का आरोपी था और कई वीडियो में नजर आ गया था। उसके पास भारतीय पासपोर्ट था इसलिए उसका प्रत्यार्पण होना भी तय था। उसकी हत्या न होती तो भारत आकर वो पता नहीं कितने राज खोलता। कनाडा के एक स्वतंत्र पत्रकार गुरप्रीत सिंह ने निज्जर की मौत के बाद पहले रिकॉर्ड किया उसका एक टेलीफोन इंटरव्यू जारी किया। इस इंटरव्यू में हरदीप सिंह निज्जर कहता है कि उसे भारतीय सुरक्षा एजेंसियों से कोई खतरा नहीं। जब उससे पूछा गया कि नौ आतंकियों की लिस्ट में उसका भी नाम है तो भी वो निश्चिन्त होकर कहता है कि वो लिस्ट देखेगा।
यानी कम से कम इन तीन की हत्या में भारत का हित तो नहीं दिखता। इसके अलावा इन खालिस्तानी गुटों में आपस में भी खींचतान जारी रहती है क्योंकि एक समूह दूसरे गिरोह को उभरते नहीं देखना चाहता। नशे के व्यापार में लिप्त संगठनों में आपस में होने वाले गैंगवॉर भी कोई अनोखी बात नहीं। एक कुख्यात गायक सिद्धु मूसेवाला की हत्या में ऐसा ही होता दिखा था, जब बिश्नोई गैंग से दुश्मनी और नशे के कारोबार की खींचतान में हत्या हुई।
इस सारे प्रकरण के बीच जब जस्टिन ट्रूडो का कनाडाई संसद में दिया बयान देखा जाए तो उसे बचकाने और मूर्खतापूर्ण व्यवहार से अधिक कुछ नहीं कहा जा सकता। राजनैतिक विचारधारा कैसे चलती है, और पीढ़ी दर पीढ़ी अगर एक ही परिवार को सत्ता मिल रही हो तो उसके क्या परिणाम होते हैं, ये जरूर जस्टिन ट्रूडो के बयान से पता चलता है। 1985 के कनिष्क विमान हादसे से पहले भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने चेतावनी दी थी कि कनाडा का प्रयोग अलगाववादी अपनी आतंकी गतिविधियों के लिए कर रहे हैं। कनाडा सरकार और पिएर्रे ट्रूडो ने ऐसी चेतावनियों पर उस समय भी कोई ध्यान नहीं दिया था, जिसका नतीजा ये हुआ कि सैकड़ों कनाडा के नागरिकों को विस्फोट में अपनी जान गंवानी पड़ी।
भारत पर झूठे आरोप थोपकर बच निकलने की जस्टिन ट्रूडो की कोशिशों का इस बार भी वैसा ही परिणाम होता दिख रहा है। जब वो भारत पर आरोप मढ़ने, दूसरे देशों को भारत के खिलाफ उकसाने की असफल कोशिशों और भारतीय राजदूत को वापस भेजने में जुटे थे, उसी वक्त कनाडा में ऐसी ही घटना फिर से हो गयी है। इस बार बार सुखदूल सिंह जो कि 2017 में नकली दस्तावेजों के जरिये कनाडा चला गया था, उसे अज्ञात हमलावरों ने मार गिराया है। विनिपेग, कनाडा में जब ये घटना हुई, तबतक भारतीय पक्ष से भी जस्टिन ट्रूडो अपने सम्बन्ध बिगाड़ चुके हैं। भारतीय राजदूत को वापस भेजने पर भारत ने भी कनाडा के एक राजदूत को वापस भेज दिया और कई वीसा निरस्त करने की कार्रवाई भी शुरू हो चुकी है।
अपने देश में ट्रक चलाने वालों के आन्दोलन को सख्ती से कुचलने के लिए कुख्यात जस्टिन ट्रूडो भारत को आन्तरिक मामलों जैसे कि तथाकथित किसान आन्दोलन से निपटने पर भी सलाह देते रहे हैं। वैसे देखा जाए तो रंगभेद की बीमारी से ग्रस्त पश्चिमी देश कनाडा का ऐसा करना कोई अनोखी बात नहीं। गोरे लोग किसी दूसरे देश में जाकर अल जवाहिरी को मार गिराएं तो ट्रूडो जैसों के लिए वो एक अच्छी खबर है, लेकिन भूरे लोग अपने देश में क्या कर रहे हैं, इस पर सलाह देना उन्हें आवश्यक लगता है।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का विरोध ये तो बता ही देता है कि एक अंतरराष्ट्रीय शक्ति के रूप में भारत का उदय हो रहा है और पश्चिमी देशों को ये उदय हजम नहीं हो रहा। बाकी इसे सिर्फ एक शुरूआती हमले के रूप में देखा जाना चाहिए, निकट भविष्य में भारत को ऐसे कई दबाव झेलने तो पड़ेंगे।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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