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Vasundhara Raje: रथ पर राजे को साजे या बिना वसुंधरा के बढ़े आगे?

राजस्थान में वसुंधरा राजे सबसे बड़ी नेता हैं। उनसे बड़ा कोई नहीं, खासकर बीजेपी में। लेकिन यही ताकत बीजेपी के लिए संकट बन रही है कि उनके बिना आगे बढ़े तो कैसे, और उनको आगे रखे, तो किस शर्त पर?

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Vasundhara Raje: गुजरात की जीत से अत्यंत प्रसन्न बीजेपी ने संभवत: राजस्थान के लिए अघोषित रूप से निर्णय ले लिया है कि विधानसभा का अगला चुनाव नरेंद्र मोदी के चेहरे पर ही लड़ा जाएगा। तर्क यह है कि विधानसभा चुनाव के तत्काल बाद ही लोकसभा चुनाव होंगे, जिसके लिए जरूरी है कि चेहरा तो मोदी का ही हो। माना कि मोदी के चहरे पर चुनाव हो भी जाएगा, तो क्या वसुंधरा राजे को दरकिनार करने में बीजेपी सफल हो जाएगी?

फिलहाल यह कहना मुश्किल है। राजस्थान की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जैसे अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री पद से हटाकर सचिन पायलट को बनाने की कांग्रेस आलाकमान की कोशिश गहलोत की ताकत के सामने असफल रही, बीजेपी में भी राजे को दरकिनार करना वैसे ही फेल हो सकता है।

राजस्थान की राजनीति में बीजेपी के अगले मुख्यमंत्री की तस्वीर जितनी साफ, सरल और आसान तरीकों से देखने की कोशिश हो रही है, उतनी आसान असल में है नहीं। राजस्थान बीजेपी की ताजा तस्वीर बहुत उलझन, असमंजस और अनिर्णयों से भरी है। मोदी के चेहरे की चमक के बहाने जिन वसुंधरा राजे को मुख्य किरदार से दरकिनार करने की कोशिश हो रही है, उनको राजस्थान में नजरंदाज करना बीजेपी के लिए इतना आसान खेल भी नहीं है।

वसुंधरा राजे बीजेपी की प्रदेश अध्यक्ष, दो बार मुख्यमंत्री रही हैं और बीजेपी के वर्तमान 71 विधायकों में से 40 पर उनकी गजब पकड़ होने के साथ साथ प्रदेश की जनता, खासकर महिलाओं और युवा वर्ग में तो उनकी वो जबरदस्त अपील है, जो किसी और की है नहीं। फिर हर जिले में उनके अपने लोग हैं और जिलों में मजबूत नेता सबसे ज्यादा उन्हीं के साथ हैं। लोकप्रियता के मामले में भी प्रदेश का कोई और नेता राजे के मुकाबले कहीं नहीं ठहरता।

बीजेपी और उसके नेता वसुंधरा राजे की ताकत के तेवर तब से जानते हैं, जब वह पहली बार राजस्थान की मुख्यमंत्री थीं। उन्होंने साफ शब्दों में संदेश दे दिया था कि होंगे राजनाथ सिंह पार्टी के अध्यक्ष, लेकिन वे किसी और के कहने पर अपनी राजनीति नहीं चलाती। खासकर राजस्थान के मामलों में तो निर्णय उनकी इच्छा से ही होंगे। बात तब की है, जब बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर राजनाथ सिंह ने राजस्थान बीजेपी में राजे की सहमति के बगैर अकारण और अप्रत्याशित हस्तक्षेप करके वसुंधरा समर्थक नेता महेश चंद्र शर्मा को हटा कर ओमप्रकाश माथुर को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बना दिया था। वसुंधरा ने इसे लगभग व्यक्तिगत राजनीतिक हमला माना था और इतनी नाराज हुई थी कि राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ का फोन आया तो उनको कहलवा दिया था कि वे उनसे बात नहीं करना चाहती।

सन 2018 में भी राजस्थान में विधानसभा चुनाव से ऐन पहले बीजेपी के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह चाहते थे कि केंद्र में राज्यमंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर जयपुर भेजा जाए, लेकिन वसुंधरा सरकार के 20 से ज्यादा मंत्रियों और 20 विधायकों ने केंद्रीय नेतृत्व पर दवाब बनाने के लिए दिल्ली के दरवाजे खटखटाए और शेखावत को प्रदेश बनाए जाने से राजस्थान में जाटों की नाराजगी बढ़ने का हवाला देकर निर्णय रुकवा दिया।

मगर, उन दिनों न तो नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री के तौर पर बीजेपी व संघ परिवार की आभा पर सवार थे, और न ही अमित शाह आज जितने ताकतवर। अब बीजेपी बहुत बदल गई है और फिर वसुंधरा राजे भी पहले जितनी ताकतवर नहीं रहीं। फिर भी, जून 2020 में सचिन पायलट द्वारा अपनी ही कांग्रेस पार्टी की सरकार व अपने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के तख्तापलट की कोशिश हुई, तो उसे गहलोत के हक में असफल करने में वसुंधरा ने जो महत्वपूर्ण भूमिका निभाकर अपनी बची खुची ताकत का अहसास कराया, बीजेपी उसी को लेकर चिंतित है। वसुंधरा के मामले में पार्टी इसीलिए बेहद सावधानी बरत रही है।

दिग्गज नेता भैरोंसिंह शेखावत अब इस लोक में नहीं है, फिर भी राजस्थान की राजनीति में उनके नाम और सम्मान की हैसियत किसी भी जीवित नेता के मुकाबले बहुत ज्यादा मानी जाती है। लेकिन शेखावत के निधन के बाद सतीश पूनिया, ओम बिड़ला, राजेंद्र राठोड़, गुलाबचंद कटारिया, गजेंद्रसिंह शेखावत, अर्जुन मेघवाल, राज्यवर्द्धन राठोड़, ओम माथुर व ऐसे ही कुछ और दिग्गज नेताओं की लंबी चौड़ी फौज होने के बावजूद बीजेपी के नेता के रूप में पूरे प्रदेश में समान रूप से स्वीकारोक्ति वसुंधरा राजे की ही सबसे ज्यादा है।

राजस्थान की खास बात यह है कि यहां की राजनीतिक तासीर जातियों की जकड़न में कैद है, और जिनमें जाट, राजपूत, ब्राह्मण, गुर्जर और मीणा सबसे ताकतवर जातियां हैं। प्रदेश की राजनीति इन्हीं जातियों के इर्द गिर्द चक्कर काटने को मजबूर है। राजस्थान की जनता जानती और मानती है कि जातियों की इस जकड़न में सबसे लोकप्रिय नेता के तौर पर, बीजेपी में वसुंधरा राजे का कोई तोड़ नहीं है। प्रदेश में समान रूप से सभी इलाकों व मजबूत जातियों में जनाधार राजे की सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी है। लेकिन यह अलग मुसीबत है कि बीजेपी की अगली पीढ़ी के नेता वसुंधरा के बजाय खुद को बड़ा नेता मानने लग गए हैं।

बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व मानता है और यह जानता भी है कि राजस्थान कोई ऐसा प्रदेश नहीं है, जहां उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड या उड़ीसा की तरह गरीबी व भुखमरी को आसानी से वोटों में भुनाया जा सके। मोदी जानते हैं कि यहां की प्रजा को उज्जवला योजना, जनधन खातों और प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी सरकारी योजनाओं के लाभार्थी के रूप में फायदे गिनाकर चुनाव नहीं जीता जा सकता है।

फिर, वसुंधरा की मोदी और शाह से कितनी जमती है या बनती है, यह किसी को बताने की जरूरत नहीं है। तीनों की अपनी - अपनी ठसक है। लेकिन राजस्थान में बीजेपी की असली परीक्षा कुछ वक्त बाद होगी, जब विधानसभा चुनाव सिर पर होंगे और वर्तमान गहलोत सरकार के प्रति लोगों की नाराजगी भुनाने के लिए कोई सर्वमान्य चेहरा चाहिए होगा।

वैसे, तो वसुंधरा राजे को आगे रखे बिना यह इतना आसान नहीं होगा और आगे किया तो मुश्किलें क्या क्या होंगी, इसका आंकलन भी किया जा रहा है। फिर भी राजे को दरकिनार करके मोदी के चेहरे पर ही चुनाव लड़ना होगा, तो बाकी राज्यों के चुनाव की चिंता छोड़कर अमित शाह को यहां छह महीने पहले से आकर डेरा डालना होगा और मोदी को हफ्ते के हिसाब से हर सात दिन में दौरे करने होंगे। फिर भी गहलोत सरकार से पार पा ही लेंगे, कहना मुश्किल है।

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    गहलोत और वसुंधरा की परस्पर राजनीतिक समझ जगजाहिर है ही, लेकिन राजस्थान की राजनीति में वसुंधरा राजे होने के मायने कुछ और ही हैं, जिन्हें सबसे पहले समझना होगा।

    यह भी पढ़ें: राजस्‍थान विधानसभा चुनाव 2023 : 'मैं जहां खूंटा गाड़ दूंगा, वहां मोदी भी कुछ नहीं हिला सकेंगे'- ओम माथुर

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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