CAA: भाजपा का चुनावी दांव है नागरिकता संशोधन क़ानून
CAA: मोदी सरकार ने अपना वायदा निभाते हुए नागरिकता संशोधन क़ानून के नियम जारी कर दिए हैं| विपक्ष, खासकर तृणमूल कांग्रेस, ऐसा मानकर चल रहे थे कि 2020 के नागरिकता संशोधन क़ानून के खिलाफ हुए मुस्लिम आन्दोलन से डर कर जैसे मोदी सरकार ने पिछले चार साल में सीएए के नियम लागू नहीं किए, वैसे ही चुनावों तक उसे ठंडे बस्ते में डाले रखेगी|
इस क़ानून का मुस्लिमों की ओर से विरोध इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि वे चाहते हैं कि जैसे पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में धर्म के आधार पर सताए गए हिन्दुओं, सिखों, जैनियों, बोद्धों, पारसियों और ईसाईयों को क़ानून में ढील देकर भारत की नागरिकता दी जा रही है, वैसे ही बांग्लादेश और म्यांमार से आए मुस्लिमों को भी नागरिकता दी जाए| जबकि भारत सरकार की नजर में बांग्लादेश एक मुस्लिम देश है, वहां मुसलमानों को धार्मिक आधार पर सताए जाने का कोई कारण ही नहीं है|

जहां तक म्यांमार का सवाल है, तो वहां बांग्लादेशी मुसलमानों की हिंसक गतिविधियों के खिलाफ वहां के बोद्धों की प्रतिहिंसा के चलते उन्हें वहां से भागना पड़ा है, लेकिन क्योंकि वे मूल रूप से बांग्लादेशी हैं, इसलिए उन्हें वापस बांग्लादेश जाना चाहिए, न कि भारत में अवैध तरीके से घुसपैठ करनी चाहिए| भारत सरकार का तर्क है कि पडौसी मुस्लिम देशों से आए गैर मुस्लिम वैध पासपोर्ट से भारत में आए, लेकिन वीजा खत्म होने के बाद यहाँ से वापस नहीं गए, जबकि बाग्लादेश और म्यांमार से कोई भी मुस्लिम वैध तरीके से भारत में नहीं आया है|
पश्चिम बंगाल की पूर्ववर्ती कम्युनिस्ट सरकार और मौजूदा तृणमूल कांग्रेस सरकार ने अवैध घुसपैठियों के नाम वोटर लिस्ट में जुड़वा कर उन्हें चुनाव जीतने का औजार बना रखा है| इसी तरह असम और पूर्वोतर के अन्य सीमान्त राज्यों में पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों ने भी अवैध तरीके से उनके वोट बनवा दिए|
अब इन दोनों राज्यों की भाजपा विरोधी पार्टियां चाहती हैं कि नागरिकता संशोधन क़ानून में इन घुसपैठियों को भी नागरिकता दी जाए| इन अवैध घुसपैठयों के खिलाफ अस्सी के दशक में बहुत बड़ा आन्दोलन चला था, तबकी राजीव गांधी सरकार ने आंदोलनकारी छात्रों के साथ किए समझौते में घुसपैठियों की पहचान करके उन्हें वापस बांग्लादेश भेजने का वायदा भी किया था, लेकिन वह वायदा किसी सरकार ने निभाया नहीं| क्योंकि अवैध घुसपैठिए उनका वोट बैंक बन गए थे|

इसलिए नागरिकता संशोधन क़ानून का विरोध करने वाले मुसलमानों के साथ विपक्षी पार्टियां भी शामिल थीं| मोदी सरकार ने देश भर में हुए हिंसक आन्दोलन के चलते क़ानून के नियम लागू नहीं किए थे| लेकिन गृहमंत्री अमित शाह शुरू से कह रहे थे कि संसद से पारित क़ानून लागू किया ही जाएगा| अभी करीब एक महीना पहले से उन्होंने यह कहना शुरू कर दिया था कि लोकसभा चुनावों से पहले ही नागरिकता संशोधन क़ानून की नियमावली जारी कर दी जाएगी, और उसी के साथ ही क़ानून के दायरे में आने वाले लोगों को नागरिकता प्रदान करने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी|
पश्चिम बंगाल और असम में तो यह एक बड़ा राजनीतिक विषय है, क्योंकि वहां बड़ी तादाद में बांग्लादेशी हिन्दू रह रहे हैं, भारतीय जनता पार्टी उन्हें नागरिकता देकर अपने वोट बैंक में तब्दील करना चाहती है| जबकि कांग्रेस, कम्युनिस्ट और तृणमूल कांग्रेस अपने बांग्लादेशी मुस्लिम वोट बैंक को भरमाते रहे हैं कि वे भेदभाव वाला यह क़ानून लागू नहीं होने देंगे, अगर केंद्र सरकार बांग्लादेशी हिन्दू शरणार्थियों को नागरिकता देगी, तो वे उन्हें भी नागरिकता दिलाएंगे|
विपक्षी दलों और मुस्लिमों के विरोध के चलते प्रतिक्रिया में यह क़ानून भारत के हिन्दुओं के लिए भी बड़ा मुद्दा बन गया था| यहाँ तक कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सार्वजनिक मंचों से मोदी सरकार को चुनौती देती रही थीं कि वह नागरिकता संशोधन क़ानून और नागरिकता रजिस्टर लागू करवा कर दिखाएं|
इस चुनौती को अमित शाह सार्वजनिक मंचों से स्वीकार करते रहे हैं, लेकिन पिछले छह महीनों से संशय बना हुआ था कि सरकार चुनावों से ठीक पहले नागरिकता संशोधन क़ानून को लागू करके रिस्क लेना चाहेगी या नहीं| हालांकि भारत के नागरिकों का इस क़ानून से कुछ लेना देना नहीं है, लेकिन भाजपा समर्थकों ने इस क़ानून को प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया था| इसलिए लोकसभा चुनावों से पहले नियमावली लागू नहीं होती, तो इसे भाजपा सरकार की कमजोरी माना जाता|
चुनावों की घोषणा से करीब दस दिन पहले मोदी सरकार ने नियमावली लागू करके अपने काडर का मनोबल बढ़ाने के साथ साथ पश्चिम बंगाल, असम, महाराष्ट्र, दिल्ली और पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में बड़ा दांव खेल दिया हैं| इन सभी राज्यों में जहां बांग्लादेशी और म्यांमारी घुसपैठिए भरे पड़े हैं, वहीं पश्चिम बंगाल और असम में तो विपक्ष का बहुत ही महत्वपूर्ण वोट बैंक है, तो इन्हीं दोनों देशों से आए हिन्दू, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन भाजपा का वोट बैंक हैं, जिन्हें भाजपा ने नागरिकता का तोहफा देकर अपने वोट को और मजबूत किया है|
चुनावों में विपक्षी पार्टियों को अब यह वायदा करना पड़ सकता है कि सत्ता में आने पर वे नागरिकता संशोधन क़ानून में फिर संशोधन करेंगे और इस क़ानून को सेक्यूलर क़ानून बनाएंगे, जिसमें धर्म के आधार पर नागरिकता का प्रावधान खत्म किया जाएगा| विपक्ष के इस वायदे से चुनावों में धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण तेज होगा, जिसका विपक्ष को फायदा होने की बजाए नुकसान ही होगा, क्योंकि 2020 के नागरिकता संशोधन क़ानून के खिलाफ चले हिंसक आन्दोलन के घाव फिर हरे हो जाएंगे|
वैसे मोदी सरकार ने क़ानून की नियमावली लागू करके विपक्ष को एकजुट होने का सुअवसर प्रदान कर दिया है| मोदी सरकार चुनावों की घोषणा से पहले अपने बचे हुए काम निपटा देना चाहती है| चुनावों की घोषणा 19 मार्च के बाद कभी भी हो सकती है| 2019 में 10 मार्च को लोकसभा के चुनाव की घोषणा हुई थी, दस मार्च जा चुकी है और चुनावों का ऐलान नहीं हुआ है|
अब लोकसभा चुनावों की घोषणा 19-20 मार्च को संभावित है| तब तक चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति भी हो चुकी होगी| हालांकि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में कांग्रेस के बायकाट करने या अडंगा डालने की प्रबल आशंका है| राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा भी 17 मार्च को समाप्त हो जाएगी| राहुल गांधी अपनी यात्रा के माध्यम से और नरेंद्र मोदी अपनी रैलियों के माध्यम चुनावी माहौल बना ही चुके हैं|
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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